शुक्रवार, 5 मार्च 2010

लिपस्टिक की लेडीफिंगर समझने की मुश्किल!

आम आदमी और आम बजट की शायद यही नियति है। हमेशा उम्मीद की जाती है कि शायद अब ये संघर्ष कर खुद को ख़ास बना लें, लेकिन नहीं। बजट और आदमी ने खुद के आम होने को स्वीकार कर लिया है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है। इतनी बार छले जाने के बावजूद आम आदमी ने बजट से फिर उम्मीद लगा खुद को आम साबित किया, और बजट ने फिर से आम आदमी को कुछ न दे, खुद को ख़ास होने से बचा लिया। वहीं, आम आदमी के नाते बजट की इस बेरूखी पर मैं भारी गुस्से में हूं। समझ नहीं पा रहा हूं क्या करूं? फिर सोचा क्यों न सीधे वित्त मंत्री से मुलाकात कर उनसे अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करूं। लिहाज़ा वक्त लेकर मैं उनसे मिलने पहुंचा...उनसे जो बातचीत हुई उसका ब्यौरा नीचे दे रहा हूं। गौर फरमाएं-

मैं- सर,जो बजट आपने दिया है उससे आम आदमी की हालत पहले से कहीं ज्यादा ख़राब हो गई है...वो मरणासन्न हालत में पहुंच गया है। वित मंत्री-देखिए, मुझे पता था ऐसा होने वाला है तभी हमने दवाओं के दाम कम कर दिए हैं, चिकित्सा उपकरण सस्ते कर दिए हैं इसलिए आम आदमी बेफिक्र हो अपना इलाज करवाए और इलाज के बाद अगर उसे कमज़ोरी महसूस हो तो वो घर बैठे जितना चाहे उतना जूस पीए, हमने जूसर भी सस्ते कर दिए हैं।

मैं-वो क्या जूस पीएगा सर, जूस तो आपने उसका निकाल दिया है पैट्रोल महंगा कर के? वित्त मंत्री-देखिए, भारत की सत्तर फीसदी आबादी आज भी गांवों में रहती है और जहां तक मेरी जानकारी है खेत तक जाने के लिए किसान कार या मोटसाइकिल का इस्तेमाल तो करते नहीं, लान्ग ड्राइव पर जाने का उन्हें कोई शौक है नहीं, और रही बेकारी और भूखमरी से परेशान होकर आत्महत्या करने की बात, तो गांवों में आज भी पेड़ से लटक कर मरने का रिवाज़ है। पैट्रोल छिड़क कर प्राण देना तो निहायत ही सामंती और शहरी तरीका है!


मैं- और एक इल्ज़ाम आप पर ये भी है कि राहत देना तो दूर आपने आम आदमी से उसका फर्स्ट्रेशन निकालने का हक़ भी छीन लिया है। वित्त मंत्री-समझा नहीं। मैं- सर, आप शायद जानते नहीं इस देश में आम आदमी सालों से तम्बाकू, गुटखा खाकर अपनी कुंठा निकाल रहा है...नेताओं को ज़रदा समझ उन्हें दांतों तले कच्चा चबा रहा है और सिगरेट के धुंए में हर फिक्र धुंआ कर उसे उड़ाता आ रहा है, मगर आपने तो फिक्र को धुंए में उड़ाना तक महंगा कर दिया है! वित्त मत्री-ये इल्ज़ाम भी सरासर ग़लत है। मुझे नहीं लगता कि बातें करने से ज़्यादा किसी और तरीके से कुंठा निकली जा सकती है, इसीलिए हमने मोबाइल फोन सस्ते किए हैं। हर तरफ से थका-हारा इंसान दोस्तों से गपबाज़ी कर अपना मन हल्का कर सकता है, कॉ़ल रेट्स तो कम हैं ही, ऐसे में यारों के साथ पुराने दिन रीकॉल कर खुश हुआ जा सकता है!

मैं-मगर सर, ऊपर से इंसान खुश होने का कितना भी दिखावा क्यों न करे, मगर दिल का दर्द तो चेहरे पर आ ही जाता है। वित्त मंत्री-आपको क्या लगता है मुझे इन बातों का ख़्याल नहीं। क्या आपने मुझे इतना नौसीखिया समझ लिया है। आप फिर से सस्ती चीज़ों की लिस्ट देंखें, हमने कॉस्मेटिक का सामान भी सस्ता किया है। अंडरआई ब्लैक सर्किल्स को मेकअप से छिपाएं। पिचके गालों को पेनस्टिक से उभारिए। सडांध मारती ज़िंदगी पर डीओ छिड़किए। मैं-मगर सर, भूख का क्या करें, अब वो पाउडर को मिल्क पाउडर समझकर पी तो नहीं सकते! लिपस्टिक को लेडीफिंगर समझ भी लें, फिर भी उसकी सब्ज़ी तो नहीं बनेगी! सर, आदमी अगर कुछ खाएगा नहीं तो मर जाएगा न!

वित्त मंत्री-उसकी फिक्र मत करें। हम आपको किसी क़ीमत मरने नहीं देंगे। देखिए, आप ही की रक्षा के लिए हमने रक्षा बजट भी बढ़ा दिया है। पहले यह एक लाख इक्तालीस हज़ार करोड़ था अब बढ़ाकर एक लाख सैंतालीस हज़ार करोड़ कर दिया गया है! पूरे आठ फीसदी की बढ़ोतरी की है!

सोमवार, 1 मार्च 2010

नाम में क्या नहीं रखा! (हास्य-व्यंग्य)

नाम में क्या नहीं रखा!

जैसे ही नर्स डिलिवरी रूम से निकल ये बताती है कि ठाकुर साहब लड़का हुआ है, ठीक उसी समय इस सवाल की भी डिलिवरी हो जाती है कि बच्चे का नाम क्या रखा जाए? मौजूदा समय में बच्चे का नाम रखना उसे पैदा करने से भी कहीं बड़ी चुनौती है। मां-बाप चाहते हैं कि नाम कुछ ऐसा हो जो ‘डिफरेंट’ साउंड करे। सब्स्टेंस हो न हो, लेकिन स्टाइल होनी चाहिए। अर्थ में मात खा जाए, मगर अदा में खरा उतरे। फिर भले ही बच्चे को जीवन भर स्पष्टीकरण लेकर जेब में घूमना पड़े कि उसके नाम का मतलब क्या है? जब भी कोई पूछे कि बेटा आपके नाम का मतलब क्या है तो बच्चा पूछने वाले को बुकलेट थमा दे, ये पढ़ लीजिए, इसमें शब्द की उत्पत्ति से मेरी उत्पत्ति तक सब समझाया गया है।

ऐसी ही मुसीबत में कुछ दिनों से मेरा एक मित्र भी फंसा हुआ है। धरती पर बच्चे का पदार्पण हुए दो महीने बीत चुके हैं, लेकिन बच्चा प्यारू, लड्डू, पुच्ची, गोलू, पपड़ू के बीच फंसा हुआ है। जिसकी ज़बान पर जो आता है वो पुकारता है। हर कोई उम्मीद करता है कि उसके पुकारे नाम पर बच्चा मुस्कुराए। उम्मीद करने वालों में भी ज़्यादातर वो हैं जो जीवन में दो मोबाइल नम्बर तक याद नहीं रख पाते और दो महीने के बच्चे से उम्मीद लगाए हैं कि वो पांच-पांच नाम याद रख ले!

इस सब पर ‘एक्सक्लूसिव’ नाम रखने की चाह ऐसी है कि जो नाम रखना है वो अपने रिश्तेदारों में तो दूर, पड़ौसियों तक के रिश्ते में किसी बच्चे का नहीं होना चाहिए। नेट से लेकर बच्चों के नाम सुझाने वाली कितनी ही किताबों की उन्होंने ख़ाक छानी, मगर नाम तय नहीं हुआ। एक-आध नाम जो उन्हें ठीक लगते वो बड़े-बुज़ुर्गों से पुकारे नहीं जाते और जो बड़े-बुज़ुर्ग सुझाते हैं वो पचास के दशक की ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों के हीरो पहले ही रख चुके हैं।

फिर किसी ने सुझाव भी दिया कि अगर हिंदू धर्म या हिंदी भाषा इसमें मदद नहीं कर रही तो बच्चे का कोई चाइनीज़ नाम रख दो इससे वो डिफरेंट साउंड भी करेगा और बच्चा जीवन भर सिर्फ अपने नाम की वजह से चर्चा का विषय रहेगा। जैसे हू जिंताओ, ब्रूस ली, चूस ली टाइप कुछ। या फिर किसी विदेशी नाम के साथ भारतीय नाम मिक्स कर रखा जाए। जैसे-सर्गेई सुरेंद्र, निकोलस नरेन्द्र या मैथ्यू महेंद्र....मगर दोस्त इस पर भी सहमत नहीं हुआ।

फिर बात आई कि एक ट्रेंड ये भी रहा है कि बच्चे के पैदा होने के समय जो फिल्म या हीरो हिट रहा हो, उसके नाम पर बच्चे का नाम रख दिया जाए। इस तरह बच्चे का नाम ‘रैंचो’ रखना चाहिए जो ‘थ्री इडियट्स’ में आमिर का था। मगर रैंचो तो उसका कच्चा नाम था उसका असली नाम फुन्सुख वांगड़ु था! मगर किसी की हिम्मत नहीं हुई जो दोस्त से पूछे कि वो अपने बेटे का नाम फुन्सुख वांगड़ु रख दे। एक ने कहा भी अगर आप इस तरह का एक्सपेरीमेंट करने के लिए तैयार हैं तो बच्चे का नाम ‘इब्नेब्तूता’ रख दें... इससे पहले की वो और कुछ कहता दोस्त की नज़र उस जूते पर पड़ी जो बगल में ही पड़ा था। ब्तूता के चक्कर में उसका भुर्ता न बन जाए, ये सोच सुझाव देने वाला चुप हो गया। जब किसी नाम पर सहमति नहीं बनी तो मैंने सुझाव दिया कि अगर ये काम वाकई इतना मुश्किल है तो हाल-फिलहाल बच्चे का नाम ‘स्थगित’ रख दो, जब बड़ा होगा तब खुद-ब-खुद अपना नाम रख लेगा। कम-से-कम कुछ फैंसी नाम न रख पाने के लिए तुम्हें कोसेगा तो नहीं! मित्र ने इसे भी हंस कर टाल दिया।

खैर, एक सुबह मैं क्या देखता हूं कि उसी मित्र का मेरे पास एसएमएस आया है, “हमारे प्यारे बेटे जिसका जन्म फलां-फलां तारीख को हुआ था, उसका नाम रखने के लिए हम आपकी मदद चाहते हैं। नीचे कुछ ऑप्शन दिए हैं। आप अपनी पंसद का नाम बता हमारी मदद करें। पोल एक हफ्ते तक चलेगा। नतीजे फलां तारीख़ को घोषित किए जाएंगे!” मित्र को जवाब दे मैं सोचने लगा …शेक्सपियर अगर आज ज़िंदा होते तो ये मैसेज मैं उन्हें ज़रूर फॉरवर्ड करता!

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

भारतीय होने की सुविधा!

टाइगर वुड्स के माफ़ीनामे के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों में ‘सच के सामने घुटने टेकने’ की कमज़ोरी एक बार फिर उजागर हुई है। समाजशास्त्रियों को ज़रूर विचार करना चाहिए कि आखिर क्यों ये लोग वे सब बातें सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लेते हैं, जो हम बंद कमरे में खुद के सामने भी स्वीकार नहीं कर पाते। ऐशो-आराम और तमाम व्यसनों का आख़िर मतलब क्या है, जब उनके इस्तेमाल पर इतना हंगामा होना है? इतना नाम-दाम क्या आदमी इसलिए कमाता है कि सिर्फ वो काम करे, जिसके बूते उसे ये सब मिला है। कतई नहीं!

ये समझना बहुत ज़रूरी है कि किसी भी सफल पुरूष के लिए अपनी प्रतिभा के दम पर किया गया सबसे बड़ा हासिल ‘औरत’ है! भले ही उसे रिझाना हो या किसी भी तरह पाना हो। आपने जो किया उस पर दोस्तों ने तारीफ कर दी, पैसा भी मिल गया, सम्मान भी ले लिए...अब? और जैसा कि खुद वुड्स ने अपने माफीनामे में कहा कि उन्हें लगता था कि जो सब उन्होंने हासिल किया उसके लिए उन्होंने काफी मेहनत की है, इसलिए उन्हें पूरा हक़ है अपनी ‘टेम्पटेशन्स’ को पाने का! और यहीं अमेरिका का दोगलापन साफ हो जाता है। आप उन ‘टेम्पटेशन्स’ की सुविधा तो देते हैं, जैसा कि वुड्स को दी, मगर पकड़े जाने पर ज़लील भी करते हैं। यहीं भारत पूरे अमेरिकी और यूरोपीय समाज पर लीड करता है। बात चाहे मीडिया की हो या फिर उन लोगों की जो ऐसे मामलों में शामिल होते हैं, कभी सेलिब्रिटी को शर्मिंदा नहीं होने देते!

इक्के-दुक्के मामलों को छोड़कर कभी किसी ने नहीं कहा कि फलां से मेरे नाजायज़ सम्बन्ध हैं। ये जानते हुए की फलां शादीशुदा है, सम्बन्ध तो बनाए जा सकते हैं, मगर इतना नहीं गिरा जा सकता कि दुनिया को बता दें। ऐसा नहीं है कि इतना गिरने पर कोई सरकारी रोक है मगर चरित्रहीनता, दुस्साहस मांगती है और वो किसी भी समाज में आते-आते ही आता है। पर्दा हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा है इसलिए तमाम कुकर्म भी भी यहां पर्दे के पीछे ही रह जाते हैं। लिहाज़ा, ऐसे मामलों से कभी घूंघट नहीं उठता!

रही बात मीडिया की, तो वो अपने व्यावसायिक हितों के चलते ऐसा कोई रिस्क नहीं लेता। कालांतर में ये साबित भी हो चुका है कि कैसी भी सनसनी की तलाश में रहने वाले चैनल, राजनीतिक दबाव के चलते हाथ में सीडी होने के बावजूद उसे नहीं चलाते। चैनल चालू रहे इसलिए कभी-कभी किसी के चालू होने को नज़रअंदाज़ भी किया जा सकता है!

वैसे भी आइकॉन्स को हमारे यहां ईश्वर का दर्जा हासिल है, इसलिए उनसे जुड़ी ऐसी कोई बात हम सार्वजिनक करने से परहेज़ करते हैं, जिससे ईश्वर को शर्मिंदा होना पड़े। लिहाज़ा, ऐसे माहौल में सेलिब्रिटी को कभी पकड़े जाने का डर नहीं रहता। और यही एक प्रतिभाशाली व्यक्ति के साथ सही सलूक भी है। ऐसी शोहरत का आख़िर फायदा ही क्या जो आदमी को इतना ‘स्पेस’ भी न दे! तभी तो चाहे शेन वॉर्न हों, बिल क्लिंटन हों या टाइगर वुड्स, सभी के लिए मुझे बहुत बुरा लगा। वक़्त आ गया है कि योग के बाद पश्चिम अब सेलिब्रिटी आरक्षित भारत के इस ‘भोग’ को भी समझे।

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

मेरी सम्पत्ति घोषणा! (हास्य-व्यंग्य)

हाल-फिलहाल वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के यहां पड़े आयकर विभाग के छापों के बाद से मैं काफी सहम गया हूं। उससे पहले मधु कोड़ा के यहां हुई छापेमारी में भी मुझे काफी घबराहट हुई थी। रोज़-रोज़ के तनाव से तंग आकर मैंने तय किया है कि हाईकोर्ट के जजों की तर्ज पर मैं भी अपनी सम्पत्ति घोषित कर देता हूं। इससे पहले की मैं अपने ‘साजो-सामान’ के बारे में मैं कुछ बताऊं ये कहना चाहूंगा कि ईर्ष्या भले सहज़ मानवीय गुण/अवगुण हो, फिर भी इससे बचा जाए तो बेहतर है। दिल थाम लें।

सम्पत्ति के नाम पर मेरे पास 70 के दशक का एक लैमरेटा स्कूटर है, जिसे पिताजी ने सन् सत्तर में सैकिंड हैंड खरीदा था। मशीनों को अगर इच्छामृत्यु की इजाज़त होती तो आज मैं इसकी 15 वीं बरसी मना रहा होता। जैसे ही इसे ले घर से निकलता हूं, पास-पड़ौस की कई महिलाएं पतीले ले बालकॉनी में आ जाती हैं, इस भ्रम में कि दूध वाला आ गया। मेरे पास तो पैसे नहीं थे मगर इस दुविधा से निजात दिलाने के लिए दूधवाले ने अपनी मोटरसाइकिल में साइलेंसर लगवा लिया। एक-आध बार मैंने इसे बेचने की कोशिश भी की मगर बदले में दुआओं से ज़्यादा कोई कुछ देने के लिए तैयार नहीं हुआ।

इसके अलावा अस्सी के दशक का एक कलर टीवी है। उसके कलर होने का रहस्य मेरे और टीवी के अलावा किसी को नहीं पता। जब इसे लिया था तब ये इक्कीस इंच था मगर अब घिसकर उन्नीस-साढ़े उन्नीस रह गया है। बुढ़ापे में जिस तरह दांत झड़ने लगते हैं, उसी तरह इसके भी बटन टूटने लगे हैं। मुझे विश्वास है कि अख़बार में इसके साथ मेरी फोटू छपने पर कोई अमीर शख़्स मुझे गोद ले सकता है या फिर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष गरीबी उन्मूलन फंड से मुझे दो करोड़ डॉलर दे सकता है।

इसके अतिरिक्त घर में एक फ्रिज है। है तो वो घर में मगर उसकी असली जगह नेशनल म्यूज़ियम में है। बर्फ तो उसमें हीर-रांझा के दिनों से नहीं जमी। अब तो पानी भी ठंडा नहीं होता। ये फ्रिज का कम और अलमारी का रोल ज़्यादा निभा रहा है। वैजिटेबल कम्पार्टमेंट में मैं जुराबें रखता हूं और फ्रिजर में बीवी चूड़ियां। दिल करता है कि फ्रिज की इस नामर्दानगी पर उसे भी दो-चार चूड़ियां पहना दूं।

अन्य सम्पत्तियों में एक डबल बेड भी है जिसकी हालत काफी बैड है। मगर वफादर इतना है कि सोने के बाद भी रातभर चूं-चूं कर घर की रखवाली करता है। ठीक उसके ऊपर एक पंखा है जो चलने के साथ ही चीं-चीं करता है। डबल उर्फ ट्रबल बेड की चूं-चूं और सीलिंग फैन की चीं-चीं जुगलबंदी कर हमें रात भर लोरियां सुनाते हैं।

नकदी की बात करूं तो मेरे पास, सुबह सब्ज़ी लाने से पहले, तीन सौ सत्तावन रूपये थे। ये देखते हुए कि महीना ख़त्म होने में दस दिन बाकी है इतनी रक़म ‘जस्टिफाइड’ है। बैंक में एक हज़ार रूपये हैं (जो न्यूनतम बैलेंस मैनटेन करने के लिए रखे हैं)। इसके अलावा घर में लोहे की अलमारी के लॉकर के सिवा, मेरे पास किसी बैंक मे कोई लॉकर नही हैं। उसमें भी मेरी और बीवी की दसवीं, बारहवीं और ग्रेजुएशन की मार्कशीट्स रखी हैं। रही ज़ेवरात की बात तो जिस सोने की कीमत 17 हज़ार तौला हो गई है, उससे मेरा कोई वास्ता नही है जिस सोने से किसी का बाप मुझे नहीं रोक सकता वो मैं खूब सोता हूं, बिना इस डर के कि कहीं घर में छापा न पड़ जाए!

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

चरित्रहीन चप्पल!

हिंदुस्तान में रहते हुए अगर आप रचनात्मक हो गए हैं तो इसे आपका दुस्साहस ही माना जाएगा वरना तो नई सोच पर हमारे यहां इतने पहरे हैं कि लकीर के प्रति फकीरी छोड़ना बेहद मुश्किल है। यही वजह है कि घटिया चुटकुलों, वाहियात फिल्मों, बेहूदा विज्ञापनों का हमारे यहां असीम भंडार है। मगर खुशी इस बात कि है कि कुछ लोग स्तरहीनता के इस स्तर में गुणात्मक सुधार करने में बराबर लगे हुए हैं। कुछ साल पहले अगर अमिताभ की ‘झूम बराबर झूम’ आई तो उसके कुछ वक़्त बाद ही राम गोपाल वर्मा अपनी ‘आग’ ले आए। (जिसकी चपटे में आकर फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर्स ने आत्मदाह कर लिया था)

ऐसे माहौल में आपकी पाचनशक्ति को हर वक़्त नई चुनौतियों के लिए तैयार रहना पड़ता है। ऐसी ही एक चुनौती से मैं कुछ रोज़ पहले वाबस्ता हुआ। दिखने में तो ये एक चप्पल का घटिया किस्म का सामान्य-सा विज्ञापन था। मगर जैसे ही इसकी पंचलाइन आई धमाका हो गया। चप्पल की तारीफ में लिखा था-आपकी सोच से भी हल्की! अगर ये निजी कटाक्ष होता तो भी इसे मैं हंस के टाल देता, लेकिन ये मेरे मेल बॉक्स में आया मेल नहीं, टीवी पर आया विज्ञापन था इसलिए समझ सकता था कि इसके चपेट में समस्त भारत आ गया है! आपकी सोच से भी हल्की चप्पल! दूसरे शब्दों में गिरी हुई चप्पल! बेहया चप्पल! लूच्ची चप्पल! चरित्रहीन चप्पल!

हल्की सोच को हम छोटी सोच के संदर्भ में लें तो एक गुंजाइश ये भी हो सकती है कि चप्पल छोटे बच्चों के लिए हो, मगर ऐसा भी नहीं था। जिस लड़की के चक्कर में मैं ये विज्ञापन देख रहा था वो तो काफी बड़ी थी। सोचता हूं मुझे जीवन में वैसे भी किसी मक़सद की तलाश थी, बाकी बची ज़िंदगी इस विज्ञापन को समझने में लगा दूं!

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

महंगाई पीड़ित लेखक का ख़त!

सम्पादक महोदय,

पिछले दिनों महंगाई पर आपके यहां काफी कुछ पढ़ा। कितने ही सम्पादकीयों में आपने इसका ज़िक्र किया। लोगों को बताया कि किस तरह सरिया, सब्ज़ी, सरसों का तेल सब महंगे हुए हैं और इस महंगाई से आम आदमी कितना परेशान है। ये सब छाप कर आपने जो हिम्मत दिखाई है उसके लिए साधुवाद। हिम्मत इसलिए कि ये सब कह आपने अनजाने में ही सही अपने स्तम्भकारों के सामने ये कबूल तो किया कि महंगाई बढ़ी है।दो हज़ार पांच में महंगाई दर दो फीसदी थी, तब आप मुझे एक लेख के चार सौ रुपये दिया करते थे, यही दर अब सात फीसदी हो गई है लेकिन अब भी मैं चार सौ पर अटका हूं।आप ये तो मानते हैं कि भारत में महंगाई बढ़ी है, मगर ये क्यों नहीं मानते कि मैं भारत में ही रहता हूं? आपको क्या लगता है कि मैं थिम्पू में रहता हूं और वहीं से रचनाएं फैक्स करता हूं? बौद्ध भिक्षुओं के साथ सुबह-शाम योग करता हूं? फल खाता हूं, पहाड़ों का पानी पीता हूं और रात को 'अनजाने में हुई भूल' के लिए ईश्वर से माफी मांग कर सो जाता हूं! या फिर आपकी जानकारी में मैं हवा-पानी का ब्रेंड एम्बेसडर हूं। जो यहां-वहां घूम कर लोगों को बताता है कि मेरी तरह आप भी सिर्फ हवा खाकर और पानी पीकर ज़िंदा रह सकते हैं।महोदय, यकीन मानिये मैंने आध्यात्म के ‘एके 47’ से वक़्त-बेवक़्त उठने वाली तमाम इच्छाओं को चुन-चुन कर भून डाला है। फिर भी भूख लगने की जैविक प्रक्रिया और कपड़े पहनने की दकियानूसी सामाजिक परम्परा के हाथों मजबूर हूं। ये सुनकर सिर शर्म से झुक जाता है कि आलू जैसों के दाम चार रुपये से बढ़कर, बारह रुपये किलो हो गए, मगर मैं वहीं का वहीं हूं। सोचता हूं क्या मैं आलू से भी गया-गुज़रा हूं। आप कब तक मुझे सब्ज़ी के साथ मिलने वाला 'मुफ़्त धनिया' मानते रहेंगे। अब तो धनिया भी सब्ज़ी के साथ मुफ्त मिलना बंद हो गया है।नमस्कार।
इसके बाद लेखक ने ख़त सम्पादक को भेज दिया। बड़ी उम्मीद में दो दिन बाद उनकी राय जानने के लिए फोन किया। 'श्रीमान, आपको मेरी चिट्ठी मिली।' 'हां मिली।' 'अच्छा तो क्या राय है आपकी।' 'हूं.....बाकी सब तो ठीक है, मगर 'प्रूफ की ग़लतियां’ बहुत है, कम से कम भेजने से पहले एक बार पढ़ तो लिया करो!

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

चंचल बाला ठाकरे!

बचपन में गली क्रिकेट खेलते हुए हममें से बहुतों ने खुद को स्टार माना है। हद दर्जे की बेसुरी आवाज़ के बावजूद सिर्फ ‘स्टेज पर गा लेने की हिम्मत’ के कारण हम कॉलेज के किशोर भी कहलाए। कॉलोनी में एक-आध को चपत लगा हम मोहल्ले के दादा भी हुए। मगर मान्यता का यही दायरा गली, कॉलेज और मोहल्ले से बाहर फैले इसके लिए ज़रूरी है कि हम बड़े मंच पर परफॉर्म करें। गली स्टार को राष्ट्रीय होरी बनने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलना पड़ता है और कॉलेज किशोर को ‘इंडियन ऑयडल’ टाइप कुछ जीतना पड़ता है। ठीक इसी तरह जब से अर्द्ध विक्षिप्तता हुनर मान ली गयी है तब से उसकी चुनौतिया भी बढ़ी हैं। दोस्तों या परिवार के बीच खुद को मूर्ख साबित करना कोई मुश्किल नहीं है। मगर असल चुनौती तब है जब आपका लक्ष्य एक राष्ट्र या उसके बढ़कर एक महाराष्ट्र हो!

जिस गुंडई और अंट-शंट बयानबाज़ी को चंचल बाला ठाकरे अपनी सबसे बड़ी ताकत समझते थे, उन्हीं के पुराने इंटर्न ने उसका बार रेज़ कर दिया है। और जैसा कि हर जीनियस से उम्मीद की जाती है कि वो हर बदलते समय में खुद को साबित करे। जैसे सचिन,अमिताभ और फेडरर कर रहे हैं। ठीक उसी तरह चंचल बाला ठाकरे भी कर रहे हैं। तभी तो विधानसभा चुनाव हारते ही पहले उन्होंने ईश्वर से विश्वास उठाया। महाराष्ट्र की जनता को कोसा। फिर मुकेश अंबानी को लताड़ा। सचिन तेंदुलकर को लपेटा। शाहरूख-आमिर को घसीटा। राहुल गांधी को धमकाया। और ये सब कर वो खाज ठाकरे जैसे छुटभैया बदतमीज़ों को बता रहे हैं कि बेलगाम बयानबाज़ी के असली बादशाह आज भी वहीं है।

सम्बोधित भले ही वो आमिर-शाहरूख-अंबानी को कर रहे हैं, मुखातिब तो वो खाज ठाकरे से ही हैं। आतंकवादियों के पास जैसे हिट लिस्ट रहती है, ठाकरे साहब के हाथ में सेलिब्रिटी लिस्ट है। सावधान!