सोमवार, 23 नवंबर 2009

लौह राष्ट्र!

ऑफिस के रास्ते की मुख्य सड़क पर कुछ दिन पहले नाइट-आई लगाई गईं। ये देख तसल्ली हुई कि रात के समय सुविधा होगी। मगर क्या देखता हूं कि कुछ ही दिनों में एक-एक कर सभी नाइट-आई गायब हो गईं। सोचा तो यही लगा कि लोहे के खांचे में फिक्स होने के कारण उठाईगिरे उस पर हाथ साफ कर गए। खैर, नाइट-आई कवर तो अपनी जगह है यहां तो लोग बिजली के तार तक नहीं छोड़ते और तो और गटर पर रखे लोहे के ढक्कन तक उठा ले जाते हैं।

अपने एरिया के जिस पार्क में मैं जाता हूं वहां रखे सभी बेंच यहां-वहां से टूटे-फूटे हैं। माली से पूछा तो उसने बताया कि भाईसाहब लोहे के ठीक-ठाक पैसे मिल जाते हैं इसलिए रात को जो नशेड़ी यहां आते हैं वो मौका मिलने पर बेंच तोड़ उसका लोहा कबाड़ी को बेच देते हैं।

ये सुन गर्दन घुटने तक शर्म से झुक गई। सोचने लगा कि इतना पैसा, जुनून और सुविधाएं होने के बावजूद भले ही हम क्रिकेट में ऑस्ट्रेलिया से आज तक लोहा न ले पाए हों, हमारी फिल्में तकनीक और रचनात्मकता में हॉलीवुड फिल्मों के आगे कहीं न टिकती हों, देसी कम्पनियां अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में विदेशी कम्पनियों से मुंह की खाती हों और भले ही हमें ये एहसास है कि युद्ध होने पर हम चीन से लोहा नहीं ले पाएंगे, मगर इसके उल्ट अपने देश में हम हर जगह लोहा ले रहे हैं। कैसी विडम्बना है कि जो दुनिया हमें किसी भी क्षेत्र में लोहा न ले पाने के लिए कोसती है, उसे ज़रा भी इल्म नहीं कि हम तो सिर्फ लोहा ही लेते हैं।

सड़क के बीच डिवाइडर का लोहा हम नहीं छोड़ते। यहां-वहां खराब पड़े लैम्प पोस्टों का लोहा हम बाप का माल समझ बेच डालते हैं। यहां तक कि सरकारी इमारतों का बांउड्री ग्रिल भी हम उखाड़ लेते हैं और कोई हमारा कुछ नहीं उखाड़ पाता। इस पर भी मुझे ज़्यादा शिकायत नहीं है। मेरी आपत्ति ये है कि इतना लोहा खाने के बाद भी ये देश एक भी गैर विवादित लौह पुरूष नहीं पैदा कर पाया। जो पहले हुए उनकी उपलब्धियों पर हाल-फिलहाल लोग पानी फेरने में लगे हैं और जो स्वयंभू लौह-पुरूष हैं वो देश तो दूर पार्टी तक में अपना लोहा नहीं मनवा पाए। इतनी चुनावी जंग हारे कि वो लौह पुरूष से ज़ंग पुरूष हो गए। लौह पुरूष न मिलने का ग़म भी बर्दाश्त है मगर मेरी असल तकलीफ ये है कि इतना लोहा खाने के बाद भी जब आम हिंदुस्तानी डॉक्टर के पास जाता है तो वो आंख में झांक कर यही कहता है ओफ्फ फो...आपमें तो आयरन की कमी है!

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

कॉमनवेल्थ खेलों पर दिल्ली की छाप

दो हज़ार दस कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी में सरकार जी-जान से जुटी है। इन खेलों के बहाने हमें दुनिया को अपनी ताकत दिखानी है। यही वजह है कि इस आयोजन पर अब तक करोड़ों रूपया लग चुका है और करोड़ों लगाया जाना है। सरकार अपनी तरफ से कोई कमी नहीं रखना चाहती, यहां तक कि उसने दिल्लीवासियों को अगले एक साल में पिछले साठ सालों की गंदी आदतें सुधारने की हिदायत भी दे दी है। ये सब ठीक हैं, मगर मेरा मानना है कि अगर वाकई भारत इन खेलों के ज़रिए अलग छाप छोड़ना चाहता है तो उसे कुछ ऐसा करना चाहिए जिसमें पूरी तरह भारतीयता झलके। मतलब ऐसे खेल करवाए जाएं जो पूरी दुनिया में कहीं और नहीं हो सकते, जिनमें पूरी तरह दिल्ली का फ्लेवर हो। पेश है ऐसे ही कुछ खेलों के सुझाव-

1.जैसा की ख़बर है, साइकलिंग ट्रेक अभी तैयार नहीं हुआ है। मेरा मानना है कि उसे तैयार करवाने की ज़रूरत भी नहीं है। कॉमनवेल्थ खेलों में ये इवेंट दिल्ली की सड़कों पर करवाया जाए। बिल्कुल असल माहौल में। बिना सड़कें खाली करवाए। इधर, बीस-पचास साइकिल सवार एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में हैं। पीछे से ब्लू लाइन बस पीं-पीं कर रही है। सामने सरिए लहराता हुआ ट्रक जा रहा है। साथ में दो किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से गाय चल रही है। वहीं सड़क किनारे कुछ नटखट कुत्ते भौं-भौं कर रहे हैं। इन सबके बीच बिना गिरे, बिना डरे और सबसे महत्वपूर्ण बिना मरे जो फिनिशिंग लाइन तक पहुंचेगा, वही विजेता होगा।

2.दोस्तों, मेरा मानना है कि असली खिलाड़ी वो नहीं है जो पोल वॉल्ट में सात मीटर की छलांग लगा ले या फिर सौ मीटर की फर्राटा दौड़ नौ सैकेंड में पूरी कर दे, असल खिलाड़ी वो है जो पीक आवर में ब्लूलाइन की बस में सीट ढूंढ लें। इसलिए एक इवेंट इससे जुड़ा भी होना चाहिए। आठ-दस खिलाड़ियों को सुबह के वक़्त किसी बस स्टॉप पर खड़ा किया जाए और उन्हें पीछे से आती किसी भीड़ भरी बस में घुस कर सीट ढूंढनी पड़े। जो जिस क्रम में सीट ढूंढेगा उसी क्रम में वो स्वर्ण,रजत और कांस्य का हक़दार होगा।


3.एथलेटिक स्पर्धाओं में एक इवेंट पैदल दौड़ का भी होता है। पैदल दौड़ के लिए यूं तो दिल्ली में कई जगहें उपयुक्त हैं मगर सदर बाज़ार इलाके का कोई सानी नहीं है। इसमें प्रतिस्पर्धी की चुनौती ये है कि उसे पैदल दौड़ना तो है, मगर दौड़ते वक़्त किसी से टकराना नहीं है और अगर टकरा भी गया तो गाली नहीं खानी है। अब टकराना या न टकराना आपकी काबिलियत पर निर्भर करता है जबकि गाली खाना आपकी किस्मत पर। इस तरह ये दौड़ हुनर और किस्मत का मेल होगी। वैसे भी इन दोनों के मेल के बिना इस शहर में कौन सरवाइव कर सकता है। खैर, आख़िर में जो भी प्रतिस्पर्धी सबसे कम धक्के और गालियां खा दौड़ ख़त्म करेगा वही विजेता होगा।


4.दिल्लीवासी होने के नाते मेरी ये हमेशा शिकायत रही है कि जब गंगा नदी में इतने सारे एडवेंचर स्पोर्ट्स होते हैं तो यमुना में क्यों नहीं। लिहाज़ा मैं आयोजन समिति से मांग करूंगा कि वॉटर स्पोर्ट्स से जुड़ी सभी स्पर्धाएं यमुना में करवाई जाएं। जिसमें पचास मीटर फ्री स्टाइल स्विमिंग से लेकर बैक स्ट्रोक,बटरफ्लाई और चार गुना सौ मीटर रिले सब शामिल हों।

यमुना की हालत देख अगर कोई इसे नदी मानने के लिए तैयार न हो तो उसे इतिहास की किताबें दिखाई जाएं, उसका पौराणिक महत्व बताया जाए। इसके बावजूद कोई गंदगी की बात करे तो उसे पिछले सालों में इसकी सफाई पर खर्च पैसे का ब्यौरा दिया जाए। उससे पूछा जाए कि आप ही बताएं, करोड़ों रूपये खर्च करने के बाद भी ये गंदी कैसे हो सकती है।

दोस्तों, इस तरह खेल करवाने का सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि ज्यादातर खेलों में सबसे ज़्यादा स्वर्ण पदक भारत ही जीतेगा। ऐसे में उन लोगों के मुंह भी बंद हो जाएंगे जो ये कहते हैं कि खेल आयोजन करवाने से खेलों का स्तर नहीं सुधरता, उसके लिए खिलाड़ियों को परफॉर्म करना पड़ता है। अब आप ही बताएं, दिल्ली की भीड़ भरी सड़कों पर दौड़ने, घटिया ट्रांसपोर्ट में सफर करने और सांस रोक यमुना में तैरने में, हमसे बढ़िया भला पूरी दुनिया में कौन परफॉर्म कर सकता है!

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

सनसनी का बेंचमार्क!

ये बहस तो अवहेलना से आहत हो कब की आत्महत्या कर चुकी है कि न्यूज़ चैनलों को सनसनी परोसनी चाहिए या नहीं। अब तो सवाल ये है कि सनसनी का स्तर कैसे बनाकर रखा जाए। मतलब, आज से छह महीने पहले लोग जिस खबर पर हैरान होते थे, आज उसने उत्तेजित करना बंद कर दिया है। जिस ‘कूड़े’ को तैयार करने में पहले एक-आध चैनल को महारत हासिल थी, उसकी रेसिपी आज सब ने जान ली है। इस सबके चलते हुआ ये है कि सनसनी का ‘बार’ रेज़ हो गया है। जो चैनल कल तक ‘साल की सबसे बड़ी’ ख़बर या घटना बता धमकाते थे वो अब सदी से नीचे बात ही नहीं करते।

नक्सली बंगाल में गाड़ी रोकते हैं-चैनल बताता है-भारत का सबसे बड़ा अपहरण। जयपुर के तेल डिपो में आग लगती है-वो लिखता है-भारत का सबसे बड़ा अग्निकांड। मंझोले या छुटके के लिए यहां कोई जगह नहीं है, क्योंकि उसका मानना है कि बड़ा है तो बेहतर है। आतंकियों ने मुम्बई पर हमला किया था तब भी उसने बताया था-सबसे बड़ा आतंकी हमला। इंचटेप ले त्रासदी का साइज नापा जा रहा है। अगर कोई बताए कि मेरे पिताजी तो इस-इस तरह से सड़क हादसे में मारे गए और हादसे का विवरण सुन सामने वाला कहे, अरे! ये तो सदी का सबसे बड़ा सड़क हादसा था! तो क्या पीड़ित शख्स ‘दुख की बढ़िया हैडलाइन’ सुन खुश हो जाएगा।

खैर, पीड़ित शख्स कुछ भी सोचे, यहां तो हर किसी की कोशिश है कि उसका बड़ा, सामने वाले के बड़े से किसी कीमत पर छोटा नहीं पड़ना चाहिए। इसलिए ‘सदी’ प्राइम टाइम का नया बेंचमार्क हो गई है और अगर कोई अतिउत्साही ‘दशक की सबसे बड़ी ख़बर’ ले प्रोड्यूसर के पास जाए तो उसे पूरे न्यूज़रूम के सामने पीटा जाता है। सबको बताया जाता है कि शाम छह बजे के बाद सदी से नीचे की कोई खबर नहीं चलनी चाहिए। सुबह ‘दशक की’ और रात बारह बजे बाद ‘साल की’। ‘आज की सबसे बड़ी ख़बर’ कहने का रिवाज़ तो अक्लमंदी की तरह न जाने कब का गायब हो चुका है। प्राइम टाइम और नॉन प्राइम टाइम कहे जाने वाले एंकर भी अब ‘सदी टाइम’ और ‘नॉन सदी टाइम’ कहलाने लगे हैं। ऐसे लोग जो चैनलों में साल की सबसे बड़ी ख़बर वाले बुलेटिन बनाते हैं, उन्हें नीची निगाहों से देखा जाता है। लोग बॉयोडेटा में लिखते हैं कि फलां चैनल में पिछले तीन सालों से सदी के सबसे बड़े बुलेटिन का ज़िम्मा निभा रहा हूं। और जैसा मुकाबला आज चैनल्स के बीच है उसे देख लगता नहीं कि सदी का ये चलन इस सदी के आख़िर तक भी जाएगा।

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

सदाबहार कसूरवार!

कभी-कभी मुझे लगता है कि भारत का होना जितना भारतीयों के लिए ज़रूरी है, उससे कहीं ज़्यादा पाकिस्तान सरकार के लिए। अगर भारत नहीं होता तो पाकिस्तान की सरकारें करतीं क्या? वहां के हुक्मरान और सेना के रिटायर्ड अफसर तो कुछ गैर-रचनात्मक न पा सुसाइड कर लेते। बिना पासपोर्ट भारत में घुसने को बेचैन सैंकड़ों-हज़ारों फिदायीन बेरोज़गारी का दंश झेलते।

भारत है तो पाकिस्तान के पास भी साज़िश रचने के लिए एक देश है, अपनी नाकामियों का ठीकरा फोड़ने के लिए एक सिर है। तभी तो रहमान मलिक साहब कहते हैं कि भारत सरकार पाकिस्तान में तबाही के लिए तालिबान की मदद कर रही है। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि ये इल्ज़ाम है या एसएमएस जोक। मैं गुज़ारिश करूंगा स्टार वन वालों से कि लॉफ्टर चैलेंज के सीज़न फाइव के लिए वो इस बार रहमान मलिक को स्टैंड अप कॉमेडियन के तौर पर पाकिस्तान से बुलाए।

मलिक साहब ने ये बात भले ही अपनी आवाम की आंखों में धूल झोंकने के लिए कही हो, मगर ऐसा कह उन्होंने भारत सरकार का कद यहां की जनता की नज़र में काफी ऊंचा कर दिया है। हम लोग तो अरसे से तरस रहे थे कि कभी हमारे बच्चे की भी कोई शिकायत लेकर आए। हमारी हालत तो उन बेबस मां-बाप की तरह थी जिनका बच्चा हर दिन यहां-वहां से मार खा कर आता और शिकायत करता। कभी ये कहना कि चीनी सैनिकों ने आज लद्दाख में घुसपैठ कर ली, पाकिस्तान ने वाघा बॉर्डर पर रॉकेट लांचर दाग दिया, कश्मीर में घुसपैठ करवा दी। अरे...वो कर रहा है तो तुम भी तो कुछ करो....तुमने क्या हाथों में करवा चौथ की मेहंदी लगवा रखी है। हम तो कब से यही चाहते थे हमारा रोंदलूं बच्चा भी किसी को एक-आध लगा कर आए। और आज जब मलिक साहब ये इल्ज़ाम लगा रहे हैं तो मैं बता नहीं सकता कि एक भारतवासी होने के नाते मुझे कितनी खुशी हो रही है।


मगर बावजूद इसके पाकिस्तान को भारत से शिकायत रहती है। आपकी नाकामियों का ‘सदाबहार कसूरवार’ बनने के अलावा हम आपको और क्या दे सकते हैं? यहां तक कि चैम्पियंस ट्रॉफी में आपकी टीम हारी तब भी किसी मंत्री ने कहा था कि इसके पीछे भारत के रसूखदार क्रिकेट बोर्ड का हाथ है! बिना ये सोचे कि उसी रसूखदार बोर्ड की टीम तो टूर्नामेंट के सेमीफाइनल तक भी नहीं पहुंच पाई थी...कहते हैं न अच्छा पड़ौसी वही है जो मुसीबत के वक़्त काम आए...आपकी वजह से हमारे यहां मुसीबत आती है और आपकी मुसीबत के वक़्त हम कसूरवार के रूप में आपके काम आते हैं। और क्या चाहिए आपको? तो रिश्ता पक्का समझें...दोस्ती का!

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009

झूठ-फरेब के रास्ते, छुट्टी के वास्ते!

हाल ही में एक सर्वे में ये बात सामने आई कि बत्तीस फीसदी लोग ऑफिस से छुट्टी लेने के लिए झूठ बोलते हैं। इन आंकडों पर मुझे हैरानी हुई। मुझे कतई उम्मीद नहीं थी कि अड़सठ फीसदी लोग छुट्टी के लिए सच बोलते होंगे!

वजह बेहद साफ है। ऑफिस से छुट्टी के पीछे सबसे बड़ी वजह है नीयत। अक्सर हमारा ऑफिस जाने का दिल ही नहीं करता। अगर किसी सुबह आप फोन कर बॉस से ये कहें कि सर, मैं आज ऑफिस नहीं आ सकता क्योंकि मेरा दिल नहीं कर रहा तो क्या लगता है...बॉस क्या कहेगा...ऐसा वाहियात काम कर कोई भी बोर हो सकता है...चलो, तुम छुट्टी ले लो...नहीं...बॉस ऐसा हरगिज़ नहीं कहेगा। वो यही पूछेगा कि इस्तीफा तुम ऑफिस आ कर दोगे या घर से ही फैक्स करोगे। यही वजह है कि ज़्यादातर लोगों को छुट्टी के लिए झूठ बोलना पड़ता है।

यूं तो झूठ किसी भी विषय पर बोला जा सकता है मगर ये ज़रूरी है कि बॉस के पास उसकी कोई काट न हो। ऐसे में सबसे लोकप्रिय बहाना है, बीमारी। एक सर्वे में ये बात भी सामने आई कि भारत में अब तक स्वाइन फ्लू से भले ही कुछ-एक हज़ार लोग संक्रमित हुए हों, लेकिन देश भर के दफ्तरों में लाखों कर्मचारी स्वाइन फ्लू की आशंका दिखा छुट्टी ले चुके हैं। नाम न छापने की शर्त पर इस ख़ाकसार को कुछ लोगों ने बताया कि दस साल की नौकरी में पहली बार उन्हें महज़ एक छींक पर खुद बॉस ने आगे बढ़कर कहा कि तबीयत ठीक नहीं है तो छुट्टी ले लो। छुट्टी के आग्रह के साथ ऐसे-ऐसे लोग मेरे हिस्से का काम करने आगे आए, जो खुद अपने हिस्से का काम कभी वक़्त पर नहीं करते।

झूठी बीमारी के अलावा, फर्ज़ी एग्ज़ाम के नाम पर भी मैंने लोगों को साल में तीन-तीन बार छुट्टियां लेते देखा है। मैं कभी नहीं समझ पाया कि आख़िर ये कौन सी यूनिवर्सिटी है जो साल में तीन-तीन बार परीक्षा लेती है। जो भी हो, एग्ज़ाम के नाम पर छुट्टियां मिलने का सफलता प्रतिशत काफी अच्छा है। इस अपराधबोध के साथ कोई भी मालिक नहीं जी सकता कि मेरी वजह से इसका वर्तमान तो ख़राब हो ही रहा है, कहीं इसका भविष्य भी ख़राब न हो जाए!


लेकिन, बहाने बनाते समय कुछ सावधानियां बरतनी बेहद ज़रूरी हैं। मसलन, बरसों पहले गुज़र चुके दादा-नाना का छुट्टी के लिए ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल करने से बचें। मेरे एक परिचित को तो उसके बॉस ने एक बार कह भी दिया था कि मुझे समझ नहीं आता कि हर बार दीपावली के आसपास ही तुम्हारे नानाजी की डैथ क्यों होती है। बहानों में अति भावुकता से भी बचें। जैसे, छुट्टी के लिए नज़दीकी रिश्तेदार की शादी या दोस्त की ख़राब तबीयत की आड़ न लें। एक बात समझ लें कि जिस शख़्स को आप इमोशनल कर छुट्टी लेने की सोच रहे हैं, वो सारे इमोशन्स का गला घोंट कर ही इस पद तक पहुंचा है। ऐसे बहानों पर अक्सर आपको सुनने को मिल सकता है कि या तो रिश्तेदारियां निभा लो या नौकरी कर लो।

दोस्तों, छुट्टियों की ये कशमकश नौकरी का स्थायी भाव है। भले ही भारत में साल में डेढ़ सौ छुट्टियां होती हों, मगर हमारी लड़ाई तो बाकी बचे दो सौ दिनों से है। जब तक दिलो में कामचोरी का जज़्बा है, रगों में मक्कारी का लहू है और बहाने बनाने के लिए कल्पनाशक्ति का चकला मौजूद है, हमें झूठ बोल कर छुट्टियां लेते रहना है। हमारा मक़सद दो वीकली ऑफ नहीं, दो वर्किंग डे है... हमें तो पांच वीकली ऑफ चाहिए।

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009

प्लास्टिक बधाइयां!

दीपावली से पहले पुलिस ने इतनी जगह छापेमारी कर नकली मावा, नकली घी और नकली पनीर भारी मात्रा में पकड़ा। मगर, वो संगठित अपराधियों की ऐसी जमात नहीं पकड़ पाई, जो हर दीपावली लाखों-करोड़ों लोगों का जीना हराम करती है। ये कौम है-मोबाइल मैसेज माफिया की। हर त्योहार से पहले ये लोग हिंदी-अंग्रेजी के सैंकड़ों मैसेज फॉरवर्ड कर समाज में हाहाकार मचा देते हैं। घड़ी की सुई के बारह पर पहुंचते ही परिचितों के इनबॉक्सों पर हमला कर देते हैं। जिन लोगों को अंग्रेज़ी में ‘हाय’ लिखना नहीं आता, वो तीन-तीन पंक्तियों में शेक्सपियराना अंदाज़ में बधाई संदेश लिखते हैं। ऐसे संदेश मिलते ही मेरे तन-बदन में आग लग जाती है। दिल करता है कि उसी वक़्त स्कूटर पकड़ उस आदमी के घर जाऊं और उसे चप्पलों से पीटना शुरू कर दूं। कॉलर पकड़ उसे धमकाऊं कि आइंदा तुमने ऐसा कोई बनावटी बधाई संदेश फॉरवर्ड किया तो असली बम फेंक तुम्हारी जान ले लूंगा।

मैसेज फॉरवर्ड करने के पीछे भेजने वाले के छिपे प्यार और मानसिकता को मैं कभी नहीं समझ पाया। दोस्त-रिश्तेदारों को ऐसे निराले संदेश भेज हमें ये थोड़ा ही न बताना है कि अगला ‘निराला’ मैं ही हूं। वैसे भी जिसे संदेश भेजा जा रहा है, वो आपका दोस्त या रिश्तेदार ही है न कि कोई बड़ा प्रकाशक, जिसे आप अपनी काव्य-प्रतिभा से चमत्कृत कर किताब छपवाने की भूमिका बांध रहे हैं। ऐसा ही एक संदेश कहता है-आपकी उम्मीदों का प्रकाश, सफलता का आकाश और लक्ष्मी का वास...जीवन में हो सबसे ख़ास-शुभ दीपावली। मेरा मानना है कि इसके पीछे भावना भले ही नेक है मगर ऐसी तुकबंदी करने वाले को फौरन बंदी बना लेना चाहिए। ऐसे आकाश, प्रकाश और वास वाले मैसेज मुझे कभी नहीं आते रास। किसी और के भेजे बनावटी संदेश को फॉरवर्ड कर, बिना सामने वाले को सम्बोधित किए, भावनाएं कैसे सम्प्रेषित हो सकती हैं, मेरी समझ से परे हैं।

रैंप पर चलते हुए एक मॉडल अपना पूरा कॉरियर एक अदद प्लास्टिक मुस्कान के सहारे निकाल देती है। हिंदी फिल्मों के कितने ही जम्पिंग जैक कुछ-एक प्लास्टिक एक्सप्रेशन्स के ज़रिए तीन सौ से ऊपर फिल्में कर गए। असली जैसे दिखने वाले सैंकड़ों-हज़ारों की तादाद में प्लास्टिक फूल हर दिन सड़कों पर बेचे जाते हैं। मगर जहां तक भावनाओं के इज़हार की बात है, वहां तो हमें इन प्लास्टिक शुभकामनाओं से बचना चाहिए। किसी आयुर्वेदिक या होम्योपैथिक डॉक्टर ने ऐसी हिदायत नहीं दी और न ही कोई वास्तुविद् ऐसा करने के लिए कहता है, शास्त्रों में भी इसका कोई ज़िक्र नहीं, फिर भी, ऐसी प्लास्टिक बधाइयों का कारोबार ज़ोरो पर है। ज़रूरत है कि पॉलीथिन की तरह इन प्लास्टिक बधाइयों पर भी बैन लगा देना चाहिए।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2009

दुर्घटना से देर भली!

कुछ लोगों का कहना है कि कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारियां देखकर लगता है कि ये खेल दो हज़ार दस में न होकर, मानो दस हज़ार दो में होने हों। ऐसा कहने वालों के संस्कृति-बोध पर मुझे तरस आता है। ये लोग शायद भारत की कार्य-संस्कृति से वाक़िफ नहीं हैं। मेरा मानना है कि इस कार्य-संस्कृति के पीछे हो न हो, अस्सी-नब्बे के दशक की हिंदी फिल्मों का गहरा असर है। उसमें भी ख़ासतौर पर उनके क्लाइमेक्स का।


हीरो-हीरोइन का ‘किसी ग़लतफहमी’ की वजह से ब्रेकअप हो चुका है। अमीर बाप की बेटी इससे काफी दुखी है। बाप सलाह देता है कि कुछ महीने लंदन बिता आओ, मूड़ ठीक हो जाएगा। हीरोइन देश छोड़ने के लिए एअरपोर्ट पहुंचती है। तभी हीरो को ‘हक़ीकत’ का पता चलता है। वो जैसे-तैसे ऑटो पकड़ एअरपोर्ट पहुंचता है और फिल्म ख़त्म होने से एक या दो मिनट पहले दोनों का मिलन हो जाता है। ये सब देख भारतीय दर्शक काफी रोमांचित होता है। उसे ‘शानदार क्लाइमेक्स’ की परिभाषा समझ आती है।


यही वजह है कि निजी ज़िदंगी में वो छोटे-बड़े जितने भी काम करता है, चाहता है कि उसका क्लाइमेक्स भी उतना ही रोचक हो। आख़िरी तारीख़ के आख़िरी घंटों में बिल जमा करवा, ट्रेन छूटने से एक मिनट पहले स्टेशन पहुंच, नम्बरिंग स्टार्ट होने के बाद सिनेमा हॉल में घुस, वो अक्सर अपने लिए उत्तेजना जुटाता रहता है। फिर बड़ी शान से लोगों को बताता है कि कैसे मैं स्टेशन पहुंचा या फिर कैसे मैंने आख़िरी वक़्त पर फिल्म की टिकट जुटाई।


अब हमारे नेता या सरकार कोई बृहस्पति या मंगल ग्रह से तो आए नहीं, लिहाज़ा उनके शौक या आदतें भी वही होंगे, जो जनता के हैं। ऐसे समय जब पूरी दुनिया उम्मीद छोड़ चुकी होगी, मीडिया कोस-कोस कर थक चुका होगा, देश बिना नाक के अपनी कल्पना से कांप चुका होगा, सरकार कहेगी, ये देखो हमने सारा काम कर दिया। दर्शक अपनी सीटों से खड़े हो ताली बजाएंगे, कुछ मासूम रो पड़ेंगे और सरकार एक ऐसे काम के लिए हीरो या विजेता बन उभरेगी, जो असल में उसे एक साल पहले ही कर देना चाहिए था!

क्लाइमेक्स का ये फंडा कब का बॉलीवुड फिल्मों से निकल देश की कार्य-संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। लोगों को तो शुक्र मनाना चाहिए कि सारे स्टेडियम वक़्त पर बन नहीं गए....वरना तो कॉमनवेल्थ खेलों से पहले ही हम उनकी बैंड बजा देते। हड़बड़ी के साथ गड़बड़ी भी तो जु़ड़ी रहती है। बावजूद इसके लोग शिकायत करते हैं। वे नहीं जानते कि ज़रा-सी लेटलतीफी से सरकार तारीफ भी बटोरेगी और स्टेडियम भी बचा जाएगी। दुर्घटना से देर भली!