बीस-बीस के खेल में सामने आई चार सौ बीसी मेरे लिए उतनी उत्सुकता का विषय नहीं है, जितना इस चार सौ बीसी पर नेताओं की चिंता। लालू, मुलायम जैसे नेता क्रिकेट की बर्बादी पर जब संसद में आंसू बहाते हैं तो इसे देख मगरमच्छ तक असली आंसू बहाने पर मजबूर होता है। चिंता को वाजिब पाकर नहीं, अभिनय में इनके हाथों मात खाकर।
मैं सोचता हूं कि कैसे ये लोग, जिनके खाते में अपने-अपने राज्यों की बीस-बीस साल की बर्बादी है, आज महज बीस-बीस ओवर के एक खेल की बर्बादी पर इतने दुखी हैं। ढाई सौ किलो वजनी शख्स स्वस्थ रहें, मस्त रहें विषय पर जोरदार भाषण दे रहा है।
मैं सोचता हूं कि ये नेता आइपीएल में हुए फर्जीवाड़े को लेकर इतना दुखी क्यों है? क्या उन्हें इस बात का दुख है कि ये फर्जीवाड़ा उनके हाथों नहीं हुआ। क्या उन्हें इस बात की तकलीफ है कि जब धंधेबाजों को ही खेल चलाना है तो हम क्यों नहीं चला सकते? जब हम देश बेच सकते हैं, तो खेल क्यों नही। या फिर उन्हें इस बात का गुस्सा है कि ऐसे खेल का क्या फायदा जिसमें यादव के लड़के को दूसरे के लिए तौलिया ले कर भागना पड़े।
मैं सुप्रीम कोर्ट से गुजारिश करूंगा कि नेताओं को ऐसी किसी भी सभा में घुसने या ऐसे किसी भी मंच पर चढ़ने से रोका जाए जहां नैतिकता, सदाचार या राष्ट्र निर्माण जैसे विषय पर कोई चर्चा हो रही हो। हिंदुस्तान एक लोकतांत्रिक देश है। यहां हर किसी को हर क्षेत्र में यथासम्भव क्षमता और यथासम्भव योग्यता के हिसाब से फर्जीवाड़े का हक है। भगवान के लिए आप उंगली क्रिकेट मत खेलें। उंगली उठाने और करने का काम किसी और पर छोड़ दें।
गुरुवार, 29 अप्रैल 2010
शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010
थरूर को बख़्श दो!
मज़बूत मंत्री अगर सरकार की ज़रूरत होता है तो विवादित मंत्री विपक्ष की। ऐसे में जब बीजेपी बार-बार ये मांग करती है कि शशि थरूर इस्तीफा दें, तो मुझे तरस आता है। उसकी मांग सोचने पर मजबूर करती है कि क्या वो वाकई इस्तीफे को लेकर गंभीर है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अगर विपक्ष का यही काम है कि वो वक़्त-वक़्त पर सरकार को शर्मिंदा करे, नीतियों को लेकर उसे कटघरे में खड़ा करे तो ये फिर ये काम तो थरूर बीजेपी से कहीं बेहतर कर रहे हैं।
कुछ साल पहले एक अंतरराष्ट्रीय बल्लेबाज़ ने अनौपचारिक बातचीत में मुझे कहा था कि जैसे ही विपक्षी टीम किसी घटिया गेंदबाज़ को बॉलिंग पर लगाती थी तो मेरी कोशिश होती थी कि उसके ओवर में एक-दो से ज़्यादा चौके न मारे जाएं। उनका कहना था कि ऐसे गेंदबाज़ की एक बार में ज़्यादा पिटाई करने का नुकसान ये होता था कि कप्तान फिर उसे दोबारा गेंद ही नहीं देता था।
ठीक इसी तरह जब भी बीजेपी शशि थरूर मामले पर उनके इस्तीफे को लेकर दबाव बनाए तो उसे ये ध्यान रखना चाहिए कि उसे किस हद तक जाना है। अगर वाकई ज्यादा दबाव बना दिया तो हो सकता है मजबूर होकर सरकार उनसे इस्तीफा मांग ले।
ऐसे ही सबक की ज़रूरत मीडिया को भी है। क्या ज़रूरत है हर बार टीवी पर ये बताने की इनका तो विवादों से पुराना नाता रहा है। ये तो कुछ न कुछ बोलते ही रहते हैं। एक बेलगाम मंत्री अगर विपक्ष की ज़रूरत है तो क्या बड़बोला मंत्री मीडिया की ज़रूरत नहीं है। क्या चैनल महिला आरक्षण के पक्ष में दी गई अच्छी दलीलों से चलेंगे। जी नहीं। यहां ये समझने की ज़रूरत है कि जिस दौर में मनोरजंन ही ख़बर बन गया हो, वहां सबसे बड़ी ख़बर भी वही बन सकता है जिसका मनोरंजन सूचकांक ज्यादा है। और एक अच्छे विवाद से बड़ा मनोरंजन और भला क्या हो सकता है! क्या आइटम मंत्रियों की इस देश को कोई ज़रूरत नहीं है।
कुछ साल पहले एक अंतरराष्ट्रीय बल्लेबाज़ ने अनौपचारिक बातचीत में मुझे कहा था कि जैसे ही विपक्षी टीम किसी घटिया गेंदबाज़ को बॉलिंग पर लगाती थी तो मेरी कोशिश होती थी कि उसके ओवर में एक-दो से ज़्यादा चौके न मारे जाएं। उनका कहना था कि ऐसे गेंदबाज़ की एक बार में ज़्यादा पिटाई करने का नुकसान ये होता था कि कप्तान फिर उसे दोबारा गेंद ही नहीं देता था।
ठीक इसी तरह जब भी बीजेपी शशि थरूर मामले पर उनके इस्तीफे को लेकर दबाव बनाए तो उसे ये ध्यान रखना चाहिए कि उसे किस हद तक जाना है। अगर वाकई ज्यादा दबाव बना दिया तो हो सकता है मजबूर होकर सरकार उनसे इस्तीफा मांग ले।
ऐसे ही सबक की ज़रूरत मीडिया को भी है। क्या ज़रूरत है हर बार टीवी पर ये बताने की इनका तो विवादों से पुराना नाता रहा है। ये तो कुछ न कुछ बोलते ही रहते हैं। एक बेलगाम मंत्री अगर विपक्ष की ज़रूरत है तो क्या बड़बोला मंत्री मीडिया की ज़रूरत नहीं है। क्या चैनल महिला आरक्षण के पक्ष में दी गई अच्छी दलीलों से चलेंगे। जी नहीं। यहां ये समझने की ज़रूरत है कि जिस दौर में मनोरजंन ही ख़बर बन गया हो, वहां सबसे बड़ी ख़बर भी वही बन सकता है जिसका मनोरंजन सूचकांक ज्यादा है। और एक अच्छे विवाद से बड़ा मनोरंजन और भला क्या हो सकता है! क्या आइटम मंत्रियों की इस देश को कोई ज़रूरत नहीं है।
शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010
विरोधियों का डब्ल फॉल्ट!
जब से सानिया मिर्ज़ा ने शोएब मलिक से शादी का एलान किया है लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं। कुछ का कहना है कि ज्ञात इतिहास में भारत को पहुंचाया गया ये इकलौता ऐसा नुकसान है जिसके बारे में हम दावे से कह सकते हैं कि इसके पीछे पाकिस्तान का हाथ है! वहीं पाकिस्तानी इस बात पर खुश हैं कि भले ही आइपीएल ने ग्यारह पाकिस्तानी खिलाड़ियों को नकारा हो, लेकिन सानिया ने तो एक अरब दस करोड़ भारतीय को नकार के एक पाकिस्तानी को चुना है। वहीं शोएब विरोधियों का कहना है कि सात साल के करियर में उन्होंने जितनी लड़कियों को उन्होंने छकाया है अगर गेंदबाज़ी से उतने बल्लेबाज़ों को छकाया होता तो कहीं के कहीं होते।
इसके अलावा न जाने कितनी बातें दोनों मुल्कों में इन दोनों को लेकर हो रही हैं। मगर सवाल ये है कि इस सबके बीच क्या किसी ने भी असली सानिया और असली टैनिस फैन का पक्ष जानने की कोशिश की।
सानिया का असली फैन किसी पाकिस्तानी या कजाकिस्तानी ही नहीं, वो तो उसकी शादी के ही खिलाफ हैं। जब से उसने ख़बर सुनी है उसे यही लग रहा है कि उसके साथ धोखा हुआ है! सिर्फ सानिया की ख़ातिर बरसों से टेनिस देखते आ रहे इस फैन ने अब टेनिस और सानिया दोनों को ही न देखने की क़सम खा ली है। टेनिस से तो उसका वही सम्बन्ध रहा है जो उदय चोपड़ा का एक्टिंग और राखी सावंत का सौम्यता से है। ऐसे में विरोध इस बात पर करना चाहिए कि भारत में टेनिस की लोकप्रियता के खा़तिर सानिया अभी शादी न करे या फिर कभी शादी न करे। हो सके तो पाकिस्तान सरकार को पेशकश की जाए कि चाहो तो कसाब ले लो, मगर हमारी लड़की हमें लौटा दो!
मगर अफसोस इस मोर्चे पर कोई विरोध दिखाई नहीं देता। उल्टे हम इस बात पर बहस कर रहे हैं कि सानिया को शादी के बाद भारत के लिए खेलना चाहिए या नहीं। दरअसल जो टेनिस के जानकार हैं वो तो मानते हैं कि जैसी टेनिस सानिया अभी खेल रही हैं हमें तो उल्टे ये ज़िद्द करनी चाहिए कि सानिया चाहे तो भी अब हम उसे अब भारत की ओर से नहीं खेलने देंगे। अब तो उसे पाकिस्तान से ही खेलना पड़ेगा! हम नहीं चाहते कि अंतरराष्ट्रीय स्तर वो भारत की और भद्द पिटवाए। खुदा के लिए ये काम हमारी हॉकी टीम के लिए छोड़ दो।....मगर अफसोस इस फ्रंट पर भी कोई विरोध नहीं उठाई जा रही है। आख़िर पेशेवर अंसतुष्ट कब ये बात समझेंगे कि किसी बात पर विरोध करना और किस पर नहीं!
इसके अलावा न जाने कितनी बातें दोनों मुल्कों में इन दोनों को लेकर हो रही हैं। मगर सवाल ये है कि इस सबके बीच क्या किसी ने भी असली सानिया और असली टैनिस फैन का पक्ष जानने की कोशिश की।
सानिया का असली फैन किसी पाकिस्तानी या कजाकिस्तानी ही नहीं, वो तो उसकी शादी के ही खिलाफ हैं। जब से उसने ख़बर सुनी है उसे यही लग रहा है कि उसके साथ धोखा हुआ है! सिर्फ सानिया की ख़ातिर बरसों से टेनिस देखते आ रहे इस फैन ने अब टेनिस और सानिया दोनों को ही न देखने की क़सम खा ली है। टेनिस से तो उसका वही सम्बन्ध रहा है जो उदय चोपड़ा का एक्टिंग और राखी सावंत का सौम्यता से है। ऐसे में विरोध इस बात पर करना चाहिए कि भारत में टेनिस की लोकप्रियता के खा़तिर सानिया अभी शादी न करे या फिर कभी शादी न करे। हो सके तो पाकिस्तान सरकार को पेशकश की जाए कि चाहो तो कसाब ले लो, मगर हमारी लड़की हमें लौटा दो!
मगर अफसोस इस मोर्चे पर कोई विरोध दिखाई नहीं देता। उल्टे हम इस बात पर बहस कर रहे हैं कि सानिया को शादी के बाद भारत के लिए खेलना चाहिए या नहीं। दरअसल जो टेनिस के जानकार हैं वो तो मानते हैं कि जैसी टेनिस सानिया अभी खेल रही हैं हमें तो उल्टे ये ज़िद्द करनी चाहिए कि सानिया चाहे तो भी अब हम उसे अब भारत की ओर से नहीं खेलने देंगे। अब तो उसे पाकिस्तान से ही खेलना पड़ेगा! हम नहीं चाहते कि अंतरराष्ट्रीय स्तर वो भारत की और भद्द पिटवाए। खुदा के लिए ये काम हमारी हॉकी टीम के लिए छोड़ दो।....मगर अफसोस इस फ्रंट पर भी कोई विरोध नहीं उठाई जा रही है। आख़िर पेशेवर अंसतुष्ट कब ये बात समझेंगे कि किसी बात पर विरोध करना और किस पर नहीं!
गुरुवार, 1 अप्रैल 2010
महंगाई के रास्ते मोक्ष! (व्यंग्य)
सरकारों को लेकर हमारी नाराज़गी हमेशा बनी रहती है। महंगाई से लेकर भ्रष्टाचार तक हर चीज़ के लिए हम उसे ज़िम्मेदार मानते हैं। हर पार्टी हमें अपनी दुश्मन लगती है। अपनी हर तकलीफ का श्रेय हम उसे देते हैं। मगर ये सब कहतें वक़्त हम शायद ये भूल जाते हैं कि सरकार जो कुछ करती है, हमारी बेहतरी के लिए करती हैं। हर संभव तरीके से हमारा जीना हराम कर दरअसल वो इस जीवन से ही हमारा मोहभंग करवाना चाहती है!
नाम न छापने की शर्त पर एक नेता ने कहा भी कि दरअसल हम चाहते हैं कि आम आदमी जीवन की व्यर्थता को समझे। इसलिए अपने स्तर पर हमसे जो बन पड़ता है, हम करते हैं। भले ही वो सब्ज़ियों से लेकर रसोई गैस के दाम बढ़ाने हों या फिर पानी-बिजली की कटौती हो। हमारी कोशिश रहती है कि आम आदमी का वो हाल करें कि उसे अपने पैदा होने पर अफसोस हो और जिस पल उसके अंदर ये भाव जागृत उसी क्षण उसे मोक्ष का ख्याल आएगा। जन्म-मरन के झंझट से मुक्ति का, मोक्ष ही उसका एक रास्ता दिखेगा। वो सद्कर्मों की तरफ मुड़ेगा, ईश्वर में उसकी आस्था गहरी होगी।
मैंने बीच में टोका, नेताजी आप कैसी बात करते हैं, समाजशास्त्र का नियम है कि समस्या बढेंगी तो समाज में अपराध भी बढ़ेगा। फिर आप कैसे कह सकते हैं कि भूखा और बेरोज़गार इंसान ईश्वर की तलाश में घर से निकलेगा। भूखे पेट तो आदमी शर्ट के बटन नहीं बंद कर सकता वो भला मोक्ष की क्या सोचेगा? नेताजी- तो तुम्हें क्या लगता है हम यहीं उसका जीवन स्वर्ग कर, उसे धर्म के रास्ते से हटा दें। मोक्ष की तलाश तो आम आदमी को करनी ही होगी...यही उसके लिए बेहतर है मगर इससे पहले उसे जीवन से मुक्ति कैसे मिले, उसका इंतज़ाम हम कर देंगे!
नाम न छापने की शर्त पर एक नेता ने कहा भी कि दरअसल हम चाहते हैं कि आम आदमी जीवन की व्यर्थता को समझे। इसलिए अपने स्तर पर हमसे जो बन पड़ता है, हम करते हैं। भले ही वो सब्ज़ियों से लेकर रसोई गैस के दाम बढ़ाने हों या फिर पानी-बिजली की कटौती हो। हमारी कोशिश रहती है कि आम आदमी का वो हाल करें कि उसे अपने पैदा होने पर अफसोस हो और जिस पल उसके अंदर ये भाव जागृत उसी क्षण उसे मोक्ष का ख्याल आएगा। जन्म-मरन के झंझट से मुक्ति का, मोक्ष ही उसका एक रास्ता दिखेगा। वो सद्कर्मों की तरफ मुड़ेगा, ईश्वर में उसकी आस्था गहरी होगी।
मैंने बीच में टोका, नेताजी आप कैसी बात करते हैं, समाजशास्त्र का नियम है कि समस्या बढेंगी तो समाज में अपराध भी बढ़ेगा। फिर आप कैसे कह सकते हैं कि भूखा और बेरोज़गार इंसान ईश्वर की तलाश में घर से निकलेगा। भूखे पेट तो आदमी शर्ट के बटन नहीं बंद कर सकता वो भला मोक्ष की क्या सोचेगा? नेताजी- तो तुम्हें क्या लगता है हम यहीं उसका जीवन स्वर्ग कर, उसे धर्म के रास्ते से हटा दें। मोक्ष की तलाश तो आम आदमी को करनी ही होगी...यही उसके लिए बेहतर है मगर इससे पहले उसे जीवन से मुक्ति कैसे मिले, उसका इंतज़ाम हम कर देंगे!
रविवार, 21 मार्च 2010
हम कमाते क्यों हैं?
मध्यवर्गीय नौकरीपेशा आदमी के नाते ये सवाल अक्सर मेरे ज़हन में आता है कि हम कमाते क्यों हैं? क्या हम इसलिए कमाते हैं कि अच्छा खा-पहन सकें, अच्छी जगह घूम सकें और भविष्य के लिए ढेर सारा पैसा बचा सकें। या हम इसलिए कमाते हैं कि एक तारीख को मकान मालिक को किराया दे सकें। पानी,बिजली, मोबाइल, इंटरनेट सहित आधा दर्जन बिल चुका पाएं। पांच तारीख को गाड़ी की ईएमआई दें और हर तीसरे दिन जेब खाली कर पैट्रोल टैंक फुल करवा सकें।
मुझे तो यहां तक लगता है कि मां-बाप बच्चों का स्कूल में एडमिशन ही इसलिए कराते हैं कि पढ़-लिख कर अच्छी नौकरी और बड़ी तनख्वाह पा वो एक दिन मकान मालिक को दस-पंद्रह हज़ार किराया दे सके! इसीलिए वित्त मंत्री भी जब घोषणा करते हैं कि अगले एक साल में हम एक करोड़ नौकरियां पैदा करेंगे तो उसका मतलब है कि अगले एक साल में हम एक करोड़ किराएदार तैयार करेंगे। ऐसे में लगता है कि तनख्वाह आपकी-हमारी मेहनत का प्रतिफल नहीं बल्कि मकान मालिकों और कामवालियों की वो अमानत है जो मिलते ही हमें उन्हें लौटानी हैं।
और इन झटकों के बावजूद आपके सेविंग अकाउंट में अगर कुछ बच गया है तो मार्च आते-आते इसे भी तो टैक्स सेविंग की मजबूरी में उन म्यूचल फंडों में इनवेस्ट करना होगा, जो स्टार लगाकर ये हिदायत देते हैं कि इनवेस्टमेंट इन शेयरमार्किट इज़ सब्जिक्ट टू मार्केट रिस्क प्लीज़ रीड द् ऑफर डाक्यूमेंट क्लियरली बिफोर इनवेस्टिंग! ऐसे में या तो बंदा अपना सर पीट ले या फिर नौकरी छोड़ गांव में हल चलाकर समस्या का हल ढूंढें। आप भी सोचें कि इस सब पर हम अपना सर पीटें, या फिर लोन की गाड़ी, किराए के मकान और इनवेस्टमेंट पोर्टफोलियों में गर्व तलाशें और जो चल रहा है उसे चलने दें।
मुझे तो यहां तक लगता है कि मां-बाप बच्चों का स्कूल में एडमिशन ही इसलिए कराते हैं कि पढ़-लिख कर अच्छी नौकरी और बड़ी तनख्वाह पा वो एक दिन मकान मालिक को दस-पंद्रह हज़ार किराया दे सके! इसीलिए वित्त मंत्री भी जब घोषणा करते हैं कि अगले एक साल में हम एक करोड़ नौकरियां पैदा करेंगे तो उसका मतलब है कि अगले एक साल में हम एक करोड़ किराएदार तैयार करेंगे। ऐसे में लगता है कि तनख्वाह आपकी-हमारी मेहनत का प्रतिफल नहीं बल्कि मकान मालिकों और कामवालियों की वो अमानत है जो मिलते ही हमें उन्हें लौटानी हैं।
और इन झटकों के बावजूद आपके सेविंग अकाउंट में अगर कुछ बच गया है तो मार्च आते-आते इसे भी तो टैक्स सेविंग की मजबूरी में उन म्यूचल फंडों में इनवेस्ट करना होगा, जो स्टार लगाकर ये हिदायत देते हैं कि इनवेस्टमेंट इन शेयरमार्किट इज़ सब्जिक्ट टू मार्केट रिस्क प्लीज़ रीड द् ऑफर डाक्यूमेंट क्लियरली बिफोर इनवेस्टिंग! ऐसे में या तो बंदा अपना सर पीट ले या फिर नौकरी छोड़ गांव में हल चलाकर समस्या का हल ढूंढें। आप भी सोचें कि इस सब पर हम अपना सर पीटें, या फिर लोन की गाड़ी, किराए के मकान और इनवेस्टमेंट पोर्टफोलियों में गर्व तलाशें और जो चल रहा है उसे चलने दें।
मंगलवार, 9 मार्च 2010
पपी और पापी!
जिस दुकान पर कल मैं सामान लेने गया, वहां एक जनाब अपने पपी के साथ कुछ खरीद रहे थे। वहां मौजूद एक लड़का जैसे ही पपी के पास से गुज़रा, तो वो जनाव बोल पड़े: देख के भइया, देख के... पैर मत रख देना इस पर…वरना खड़े-खड़े दस हज़ार का नुकसान हो जाएगा! हिंदी भाषा से अनजान पुअर पपी अब भी मालिक का जूता चाट रहा था, कायदे से जिस पर उसे अब तक सूसू कर देना चाहिए था!
मैं सोचने लगा कि इस शख़्स ने भी ‘थ्री इडियट्स’ देखी होगी। करीना के ‘प्राइज़ टैग’ मंगेतर पर ये भी हंसा होगा। इसने भी सोचा होगा कि कैसा घटिया आदमी है? बिना ये सोचे की जैसा ये घटिया है, वैसा ही मैं भी तो हूं, या फिर हॉल में ठहाके लगाते दो-तीन सौ लोगों पर इसे गुस्सा आया होगा? आख़िर आदमी अच्छा खाता-पहनता किसलिए है, इसीलिए न कि वक़्त आए (न भी आए) तो बता सके कि उसका दाम क्या है?
मैं सोचता हूं...पपी पर वयस्क आदमी पांव रख दे तो क्या होगा?....सुनने में भले ही लगे कि इस सवाल का ताल्लुक जीव विज्ञान से है, मगर इसका आर्थिक पक्ष भी है। और अगर कोई इन्हें कहे कि पपी कितना ‘क्यूट’ है तो ये उसे समझाएंगे कि इसका सम्बन्ध जीव विज्ञान से नहीं, अर्थशास्त्र से भी है। ‘क्यूट’ है तभी तो दस हज़ार का है! क्यूटनेस पपी से प्यार की नहीं, उसे घर लाने की भी नहीं, उस सवाल की वजह है जिसका जवाब है, 'ये दस हज़ार का है’! मैं सोचता हूं कि मानवीय या सामाजिक बुराईयों का ‘गवाह’ और ‘शिकार’ होना एक बात है और उसकी आलोचना कर या खिल्ली उड़ा खुद को ज़मानत देना दूसरी! सच...ऐसों का बीमार बाप भी मर जाए तो पहले मुंह से यही निकलेगा कि हाय! दो लाख का नुकसान हो गया....इतना पैसा लगा था दवाई पर!
मैं सोचने लगा कि इस शख़्स ने भी ‘थ्री इडियट्स’ देखी होगी। करीना के ‘प्राइज़ टैग’ मंगेतर पर ये भी हंसा होगा। इसने भी सोचा होगा कि कैसा घटिया आदमी है? बिना ये सोचे की जैसा ये घटिया है, वैसा ही मैं भी तो हूं, या फिर हॉल में ठहाके लगाते दो-तीन सौ लोगों पर इसे गुस्सा आया होगा? आख़िर आदमी अच्छा खाता-पहनता किसलिए है, इसीलिए न कि वक़्त आए (न भी आए) तो बता सके कि उसका दाम क्या है?
मैं सोचता हूं...पपी पर वयस्क आदमी पांव रख दे तो क्या होगा?....सुनने में भले ही लगे कि इस सवाल का ताल्लुक जीव विज्ञान से है, मगर इसका आर्थिक पक्ष भी है। और अगर कोई इन्हें कहे कि पपी कितना ‘क्यूट’ है तो ये उसे समझाएंगे कि इसका सम्बन्ध जीव विज्ञान से नहीं, अर्थशास्त्र से भी है। ‘क्यूट’ है तभी तो दस हज़ार का है! क्यूटनेस पपी से प्यार की नहीं, उसे घर लाने की भी नहीं, उस सवाल की वजह है जिसका जवाब है, 'ये दस हज़ार का है’! मैं सोचता हूं कि मानवीय या सामाजिक बुराईयों का ‘गवाह’ और ‘शिकार’ होना एक बात है और उसकी आलोचना कर या खिल्ली उड़ा खुद को ज़मानत देना दूसरी! सच...ऐसों का बीमार बाप भी मर जाए तो पहले मुंह से यही निकलेगा कि हाय! दो लाख का नुकसान हो गया....इतना पैसा लगा था दवाई पर!
सोमवार, 8 मार्च 2010
इंस्टैंट फल!
बाबा अपने शिष्यों को नैतिकता का पाठ पढ़ाते थे। संयम के मायने समझाते थे। उनका कहना था कि इस लोक में अगर सद्चरित्र रहे तो उस लोक में एक से बढ़कर एक सुख-सुविधाएं मिलेंगी। गुरू की इसी शिक्षा पर चलते हुए एक शिष्य ने कभी किसी को बुरी नज़र से नहीं देखा। हर किसी को बहन माना। हमेशा संयम रखा। यहां तक कि जीवनभर शादी भी नहीं की।
सारा जीवन वो इन्हीं आदर्शों पर चला और फिर एक दिन देह त्याग दी। कर्मों के आधार पर शिष्य को स्वर्ग में पार्क फेसिंग एमआइजी फ्लैट अलॉट हुआ, शॉफर ड्रिवन गाडी मिली। ये सब देख उसके मन में गुरू के प्रति आस्था और गहरी हो गई। उसी दिन शाम वो सैर पर निकला। दो कदम ही चला था कि क्या देखता है... जीवन भर चरित्र का उपदेश देने वाले उसके गुरू सोसायटी के ही पार्क में एक मशहूर अभिनेत्री के साथ रंगरलियां मना रहे हैं। ये देख शिष्य का खून खौल उठा। उसके पांव तले ज़मीन खिसक गई। वो चिल्लाया-ये क्या कर रहे हैं...शर्म नहीं आती आपको...जीवन भर मुझे नैतिकता का पाठ पढ़ाते रहे और यहां गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। इससे पहले की वो कुछ और कहता, गुरू ने टोका-शांत वत्स शांत...आख़िर क्यों इतना भड़क रहे हो...मैंने तो हमेशा तुम्हें चरित्रवान होने की शिक्षा दी, संत बनने को कहा और यही समझाया कि ऐसा करोगे तो स्वर्ग में एक से बढ़कर एक अप्सराएं मिलेंगी। अब तुम ही बताओ मुझसे बड़ा संत भला कौन है और इन सितारा देवी से बड़ी अप्सरा कौन हुई हैं!
दोस्तों, ठीक इसी तरह आसपास अगर किसी बाबा के रंगरलियां मनाने की ख़बर आप सुनें, तो बुरा न मानें। दरअसल, ‘सब कुछ इंस्टैंट’ के इस ज़माने में दुआएं भी इंस्टैंट कबूल होने लगी हैं...सुबह बाबा ने दुआ मांगी और रात को कबूल हो गई! वैसे भी स्वर्ग-नर्क सब यहीं है!
सारा जीवन वो इन्हीं आदर्शों पर चला और फिर एक दिन देह त्याग दी। कर्मों के आधार पर शिष्य को स्वर्ग में पार्क फेसिंग एमआइजी फ्लैट अलॉट हुआ, शॉफर ड्रिवन गाडी मिली। ये सब देख उसके मन में गुरू के प्रति आस्था और गहरी हो गई। उसी दिन शाम वो सैर पर निकला। दो कदम ही चला था कि क्या देखता है... जीवन भर चरित्र का उपदेश देने वाले उसके गुरू सोसायटी के ही पार्क में एक मशहूर अभिनेत्री के साथ रंगरलियां मना रहे हैं। ये देख शिष्य का खून खौल उठा। उसके पांव तले ज़मीन खिसक गई। वो चिल्लाया-ये क्या कर रहे हैं...शर्म नहीं आती आपको...जीवन भर मुझे नैतिकता का पाठ पढ़ाते रहे और यहां गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। इससे पहले की वो कुछ और कहता, गुरू ने टोका-शांत वत्स शांत...आख़िर क्यों इतना भड़क रहे हो...मैंने तो हमेशा तुम्हें चरित्रवान होने की शिक्षा दी, संत बनने को कहा और यही समझाया कि ऐसा करोगे तो स्वर्ग में एक से बढ़कर एक अप्सराएं मिलेंगी। अब तुम ही बताओ मुझसे बड़ा संत भला कौन है और इन सितारा देवी से बड़ी अप्सरा कौन हुई हैं!
दोस्तों, ठीक इसी तरह आसपास अगर किसी बाबा के रंगरलियां मनाने की ख़बर आप सुनें, तो बुरा न मानें। दरअसल, ‘सब कुछ इंस्टैंट’ के इस ज़माने में दुआएं भी इंस्टैंट कबूल होने लगी हैं...सुबह बाबा ने दुआ मांगी और रात को कबूल हो गई! वैसे भी स्वर्ग-नर्क सब यहीं है!
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
