मंगलवार, 18 सितंबर 2012

राजनीतिक दलों में उठी एफडीआई की मांग!


रिटेल सेक्टर में एफडीआई की मंज़ूरी के बाद जिस तरह की राजनीति हो रही है उससे आम आदमी तंग आ चुका है। वो मांग कर रहा है कि क्यों न राजनीति में भी एफडीआई को मंज़ूरी दे दी जाए ताकि अमेरिका की डेमोक्रेट और इंग्लैंड की लेबर पार्टी भारत में आकर वैसे ही अपनी गतिविधियां संचालित कर पाएं, जैसे वॉल मार्ट या अन्य रिटेल कम्पनियां भविष्य में करेंगी। जो लोग राजनीति में एफडीआई की बात कर रहे हैं, उनके पास अपने तर्क हैं। इस बारे में मैंने प्रमुख राजनीतिक चिंतक दिलीप शूरवीर से बात की तो उनका कहना था, “देखिए, जब ये कहा जाता है कि भारत में राजनीति धंधा हो गई तो हमारा मतलब होता है कि राजनीति में हर आदमी पैसा बनाने आता है, और उसे किसी के नफे-नुकसान की कोई फिक्र नहीं होती। दूसरा, अगर आप राजनीतिक दलों पर नज़र डालें तो पाएंगे कि हर जगह बाप की विरासत को बेटा या बाकी रिश्तेदार संभाल रहे हैं। कांग्रेस से लेकर समाजवादी पार्टी और शिवसेना से लेकर डेएमके तक, हर पार्टी में यही नज़ारा है। इस रूप में ये पार्टियां राजनीतिक दल न होकर, राजनीति की दुकानें हैं और पार्टी अध्यक्ष का पद वो गल्ला है, जिसे बाप के बाद बेटा संभालता है। जैसे मिठाई की, जूस की, किराने की, नाई की दुकान होती है उसी तरह अलग-अलग पार्टियों के रूप में हिंदुस्तान में राजनीति की भी बहुत सारी दुकानें हैं। इसलिए मेरा मानना है कि अगर रीटेल सेक्टर में विदेशी कम्पनियों को आने की इजाज़त दी जा रही है, तो विदेशी राजनीतिक दलों को भी मौका मिलना चाहिए। वैसे भी एक ग्राहक के नाते हमारे लिए जितना ज़रूरी उचित कीमत और अच्छी क्वॉलिटी की चायपत्ती खरीदना है, उससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी है कि अपने लिए ईमानदार और सक्षम राजनेता चुनना। चाय का पैकेट तो फिर भी दस दिन में नया ला सकते हैं, मगर एक बार ख़राब नेता चुनने लिया तो पांच साल तक पछताना पड़ेगा।” इस पर जब मैंने उनसे पूछा कि मगर विदेशी जब भारत आएंगे तो क्या हमारी जनता उन्हें स्वीकार करेगी, वो तो हमारी भाषा तक नहीं जानते? तो श्री शूरवीर ने कहा, “देखिए पिछले डेढ़ दशक की हमारी राजनीति ने ये साबित किया है कि ‘विदेशी मूल’ हमारे लिए कोई मुद्दा नहीं है। रही बात भाषा की, तो जैसे हमारे बहुत-से नेता रोमन में लिखा भाषण हिंदी में पढ़ते हैं, उसी तरह विदेशी राजनेता भी पढ़ लेंगे।” “मगर क्या इस तरह का भाषण जनता को समझ आएगा और भाषण ही समझ नहीं आएगा तो फिर आम आदमी अपने नेता से संवाद कैसा करेगा?” श्री शूरवीर (हंसते हुए), “देखिए श्रीमानजी, गंभीर बात करते-करते अब आप मज़ाक पर उतर आए हैं। अगर हमारे नेता जनता से संवाद करते होते, तो राजनीति में एफडीआई की मांग उठती ही क्यों? वैसे भी बात कर आम आदमी नेताओं को अपनी हालत ही बताएगा और जो हालत उन्हें इतने सालों में देखकर समझ नहीं आ रही है, वो बात करने से भला ज़्यादा कैसे समझ आ जाएगी!” सशर्त समर्थन को तैयार बहरहाल, राजनीति में एफडीआई के बारे में जब हमने एक नेता जी से उनकी प्रतिक्रिया ली तो उनका कहना था कि कोई भी चीज़ एकतरफा नहीं होती। अगर विदेशी राजनीतिक दल भारत आना चाहतें हैं तो उनका स्वागत है, मगर हमारी पार्टियों को भी वहां न सिर्फ जाने की, बल्कि अपने तरीके से राजनीति करने की इजाज़त दी जाए! मसलन, अगर हमारी पार्टी की लॉस एंजेलिस में कोई सभा है तो हमें छूट मिले कि हम न्यूयार्क से ट्रालियों में लोगों को भरकर लॉस एंजेलिस ला सकें। चुनाव जीतने के बाद लंदन के हर गली-चौराहे पर अपनी मूर्तियां स्थापित कर सकें, यूरोपियन यूनियन की मज़बूती के लिए स्पेन से लेकर फ्रांस तक रथ यात्रा निकाल सकें, और तो और बारबाडोस और मालदीव में जब चाहें किसी भारतीय मूल के किसी दलित परिवार के घर धावा बोलकर खाना खा सकें। अब अगर वो अपने-अपने देशों में भारतीय नेताओं को ये सब गुल खिलाने देने के लिए तैयार हैं तो जब चाहें भारत आकर हमसे दो-दो हाथ कर सकते हैं!

सोमवार, 17 सितंबर 2012

सरकार जनता को भंग कर दे!


ये कतई ज़रूरी नहीं है कि जनता को ही योग्य सरकार न मिले। ऐसा भी हो सकता है कि सरकार को ही योग्य जनता न मिल पाए। और मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि हम भारतवासी जनता के रूप में सरकार के योग्य नहीं। तभी तो सरकार जब बिना बोली के टेलीकॉम स्पेक्ट्रम और कोयला ब्लॉक बेचती है तो हम कहते हैं लाखों करोड़ का घोटाला हुआ है। वो समझाती है कि इससे तुम्हें ही कॉल रेट सस्ती पड़ेगी, सस्ती बिजली मिलेगी, मगर हम नहीं मानते। हम शिकायत करते हैं कि ये राष्ट्रीय संसाधनों के साथ खिलवाड़ है, इसकी उचित कीमत वसूली जानी चाहिए थी। सरकार अच्छे बच्चे की तरह हमारी बात मान अगले दिन जब डीज़ल और रसोई गैस की कीमत बढ़ाती है तो हम चिल्लाते हैं, अरे, ये तुमने क्या किया। हमारे ‘ओवररिएक्शन’ को सरकार समझ नहीं पाती और पूछती है, “क्यों अब क्या हुआ, तुमने ही तो कहा था कि राष्ट्रीय महत्व की चीज़ों की उचित कीमत वसूलनी चाहिए।” आम आदमी कहता है,“वो तो ठीक है, मगर हमसे क्यों?” सरकार को चूंकि अगले चुनाव में आपसे फिर वोट मांगना है इसलिए वो इस ‘हमसे क्यों’ का जवाब नहीं देती। मगर मैं पूछता हूं कि अगर तेल कम्पनियों को रोज़ाना लाखों का घाटा हो रहा है तो ये घाटा आपसे नहीं, तो क्या मिस्र की जनता से वसूला जाएगा? हर वक्त ये मानते रहना कि सारे बलिदान हम ही कर रहे हैं, खुद को ज़बरदस्ती शहीद मानने वाली बात है। अगर आपको सालभर में सब्सिडी वाले सिर्फ छह सिलेंडर ही मिलेंगे तो उन नेताओं के बारे में भी सोचिए, जिनके ग्यारह-ग्यारह बच्चे हैं। उनके तो सारे सब्सिडाइज्‍ड सिलेंडर पहले महीने में ही ख़त्म हो जाएंगे। इसी तरह डीज़ल की बढ़ी कीमतों पर ऐसे लोग भी हायतौबा मचा रहे हैं जो सालों से पेट्रोल कार यूज़ कर रहे हैं। जिस दुख से वो वाकिफ नहीं, उसके बारे में चिल्लाकर भ्रम पैदा कर रहे हैं। इससे समाज में तनाव फैल सकता है। लिहाज़ा मेरा सरकार से अनुरोध है कि सख्त कार्रवाई करते हुए ऐसे लोगों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाए तभी वो सुधरेंगे। ब्रेताल्ड ब्रेस्ट की एक कविता की पंक्ति है, “सरकार इस जनता को भंग कर दे और अपने लिए नई जनता चुन ले”! यूपीए सरकार चाहे तो ब्रेताल्ड की ये सलाह मान सकती है। (दैनिक हिंदुस्तान, 17 सितम्बर)

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम है भ्रष्टाचार

दोस्तों, पहचान का इस बात से कोई ताल्लुक नहीं है कि वो अच्छी है या बुरी। ज्यादा मायने रखता है उस पहचान को बनाने के लिए की गई मेहनत। मसलन अगर कोई आदमी मोहल्ले का सबसे बड़ा गुंडा कहलाता है तो वो छह महीने पहले किसी को एक चपत लगाकर तो गुंडा बना नहीं। इसके लिए उसने सच्ची लगन और निष्ठा से महीनों तक न जाने कितनों की हड्डियां तोड़ी। उसी तरह कोई एक्टर एक हिट फिल्म देकर सुपरस्टार नहीं बनता, इसके लिए उसे दसियों सुपरहिट फिल्में देनी पड़ती है। मतलब, पहचान कोई ‘हादसा’ नहीं है, ये एक दिशा में किया गया ‘डेलीब्रेट एफर्ट’ हैं। इसलिए जब कोई इंसान या राष्ट्र अपनी पहचान नकारता है, तो मुझे समझ नहीं आता वो चाहता क्या है। सालों तक पहचान बनाने के लिए एक तो तुमने इतनी मेहनत की और जब दुनिया तुम्हें उस रूप में मान्यता देने लगी है, तो तुम नखरे कर रहे हो। और यही मेरी सबसे बड़ी आपत्ति है कि आज जब पूरी दुनिया भ्रष्ट राष्ट्र के रूप में भारत को मान्यता दे रही है, तो हम इतने नखरे क्यों कर रहे हैं। ऐसा करके हम दुनिया से तो अपने सम्बन्ध तो ख़राब कर ही रहे हैं, उस मेहनत का भी अपमान कर रहे हैं जो पिछले साठ सालों में हमारे हुक्मरानों ने की है। वक्त आ गया है कि दुनिया की इस मान्यता के लिए हम उसका शुक्रिया अदा करें और उसे बताएं कि कैसे भ्रष्टाचार हमारे यहां ‘सांस्कृतिक अभिव्यक्ति’ का सबसे बड़ा माध्यम है। उन्हें समझाए कि हमारी लाइफ में भ्रष्टाचार नहीं है बल्कि भ्रष्टाचार हमारे लिए ‘वे आफ लाइफ है’। और ये तमाम बातें निम्नलिखित बिंदुओं के ज़रिए समझाई जा सकती है। वस्तु से पहले व्यक्ति: ऐसे समय जब दुनिया, दुनिया न होकर एक बहुत बड़ा बाज़ार हो गई है और हर चीज़ बिकने के लिए उपलब्ध है, इसे हमारे संस्कार ही कहे जाएंगे कि आज भी हम हर बिक्री में वस्तु से पहले व्यक्ति को तरजीह देते हैं। तभी तो हम अरबों की कोयला खदानों को ‘जनता के फायदे’ के लिए बिना ऑक्शन के कौड़ियों के भाव बेच देते हैं और दो कोडी के खिलाड़ियों को आईपीएल के ऑक्शन में करोड़ों रूपये दिलवा देते हैं। ‘आम आदमी’ को काल रेट मंहगा नहीं पडे इसलिए टेलीकाम मंत्री स्पेक्ट्रम की बोली नहीं लगवाते और ऊर्जा मंत्री दलील देते हैं कि अगर खदानों की बोली लगाई जाती तो ‘आम आदमी’ को बिजली महंगी पड़ती। अब ध्यान देने लायक बात ये है कि जिसे दुनिया लाखों करोड़ का घोटाला कहते नहीं थक रही, उसके केंद्र में आम आदमी की चिंता है! अब आम आदमी की चिंता कर अगर हम कुछ नुकसान उठा रहे हैं तो ये हमारी मूर्खता नहीं, हमारे संस्कार हैं और जैसा कि सभी जानते हैं, व्यक्ति हो या राष्ट्र संस्कारवान होने की कुछ कीमत तो सभी को चुकानी ही पड़ती है! सामाजिक न्याय का अस्त्र: प्रमोशन में आरक्षण के लिए भले ही कुछ लोग राजनेताओं को कोस रहे हो मगर उन्हें ये भी देखना चाहिए राजनीति में भ्रष्टाचार के मौके सभी को देकर हमारे नेता अपने स्तर पर तो उसकी शुरूआत कर ही चुके हैं। तभी तो दलित होने के बावजूद ए राजा पौने दो लाख करोड़ का टेलीकाम स्पैक्ट्रम घोटाले कर देते हैं और आदिवासी होने के बावजूद मधु कोड़ा चार हज़ार करोड़ का मनी लांडरिंग घोटाला। पिछड़ी जाति के लालू यादव एक सौ पचास करोड़ का चारा घोटाला कर भैंसों का निवाली छीन लेते हैं और मुस्लिम होने के बावजूद हसन अली को 80,000 करोड़ की टैक्स चोरी करने में कोई दिक्कत नहीं आती। अगर इस देश में आप आदमी से पूछे कि क्या कभी उसे उसकी जाति या धर्म की वजह से कोई भेदभाव झेलना पड़ा तो हो सकता है वो आपको दसियों कारण बता दें मगर किसी घपलेबाज़ को शायद ही कभी उसकी जाति या धर्म की वजह से भ्रष्टाचार करने से किसी ने रोका हो। आर्थिक शक्ति का परिचायक: अगर आपके किसी पड़ोसी के यहां चोरी हो जाए और आपको पता लगे कि चोर उसके यहां से तीस तौले सोना और बीस लाख रुपये नगद ले उड़े तो आपको उसके लिए हमदर्दी बाद में होगी पहले ये ख्याल आएगा साले के पास इतना पैसा था क्या? ठीक इसी तरह हम सालों से खुद के आर्थिक महाशक्ति बनने का दावा कर रहे हैं मगर ट्रेन के सफर के दौरान विदेशी जब देखते हैं कि लाखों भारतीय सुबह सबुह अपनी सारी शक्ति खुले में फ्रेश होने में लगा रहे हैं तो उन दावे की पोल खुल जाती है। वो हमारी बातों पर यकीन नहीं करते। लेकिन जैसे ही वो अख़बारों में पढ़ते हैं कि भारत में पौने दो लाख करोड़ का स्पैक्ट्रम घोटाला हुआ, 1 लाख छियासी हज़ार करोड़ का कोयला घोटाला और 48 लाख करोड़ का थोरियम घोटाला तो उन्हें भी हमारे पैसा वाला होने पर यकीन करना पड़ता है। अंग्रेज़ लेखक चार्ल्स कोल्टन ने कहा था कि भ्रष्टाचार बर्फ के उस गोले की तरह है जो एक बार लुढ़कने लगता है तो फिर उसका आकार बढ़ता जाता है। 1948 में हुए 80 लाख के जीप घोटाले से लेकर 2012 में 1 लाख छियासी हज़ार करोड़ के कोयला आवंटन घोटाले तक भ्रष्टाचार रूपी ये बर्फ का गोला, गोला न रहकर बर्फ का पहाड़ बन चुका है। पूरे देश पर सफेद चादर बिछी है। ऐसा लगता है मानों मृत उम्मीदों को किसी ने कफन ओढ़ा दिया हो।

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

मूर्खताओं को चाहिए बड़ा मंच!

मैं हमेशा इस बात का पक्षधर रहा हूं कि व्यक्ति हो या राष्ट्र, उसकी एक पहचान होनी चाहिए। अब इस पहचान का इस बात से कोई ताल्लुक नहीं है कि वो अच्छी है या बुरी। इसके लिए ज़रूरी है कि जो मूर्खताएं या करतब अब तक आप छोटे स्तर पर दिखाते रहे हैं, उसे बड़े मंच पर परफॉर्म करें ताकि आपका हुनर ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंच पाए। जैसे मोटे तौर पर हर हिंदुस्तानी ये जानता है कि हमारे यहां 8 से 10 घंटे बिजली न रहना आम बात है। मगर ‘हमारे यहां घंटों बिजली नहीं रहती’ ये अपने आप में एक कैज़ुअल स्टेटमेंट है, इस पर कोई ध्यान नहीं देने वाला। और इसका नुकसान ये हो रहा है कि रोज़ाना घंटों बिजली गुल रहने के बावजूद विश्व मानचित्र में भारत की ‘पावर कट नेशन’ के तौर पर कोई पहचान नहीं बन पा रही। ऐसे में क्या किया जाए...किया ये जाए कि नदर्न ग्रिड फेल कर दो...अब एक साथ देश के नौ राज्यों में बिजली चली गई...पूरे देश में हाहाकार मच गया...टीवी से लेकर अख़बार तक हर जगह बिजली गुल रहना सुर्खियां बना...जबकि माई लॉर्ड ध्यान देने लायक बात ये है कि इस कट के दौरान भी रोज़ाना की तरह बिजली सिर्फ आठ से दस घंटे तक ही नहीं आई। तो सवाल ये है कि जो कटौती हमारी सामान्य दिनचर्या का हिस्सा है, उस पर इतना क्लेश क्यों? शायद इसलिए क्योंकि इस बार बिजली गुल रखने का ये गुल हमने एक साथ कई राज्यों में खिला दिया। नतीजा ये हुआ कि एक साथ चारों ओर से सरकार को गालियां पड़ीं। भारत सहित विश्व मीडिया में इसकी चर्चा हुई... भारत को लानत देते हुए दुनिया ने कहा, ‘अरे! ये कैसा देश है जहां घंटो बिजली नहीं रहती’, और आख़िरकार हमने एक ऐसे अवगुण के लिए वर्ल्ड लेवल पर अपनी पहचान बना ली, जो सालों से हममें विद्यमान तो था मगर हम उसे एनकैश नहीं कर पा रहे थे! और जैसा कि होता है जब आप बड़े मंच पर परफॉर्म करते हैं तो आपको उसका रिवॉर्ड भी बड़ा मिलता है। लगातार दो दिनों तक नदर्न ग्रिड फेल हुआ, आधा देश अंधेरे में डूब गया और इस सबसे खुश होकर कांग्रेस ने ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे को गृहमंत्री बना दिया। मानो वो संदेश देना चाह रही हो कि लोगों को अंधेरे में रखने का हम क्या इनाम देते हैं! (दैनिक हिंदुस्तान 3 अगस्त, 2011)

बुधवार, 18 मई 2011

एक आध्यात्मिक घटना!



आजकल परीक्षा परिणामों का सीज़न चल रहा है। रोज़ अख़बार में हवा में उछलती लड़कियों की तस्वीरें छपती हैं। नतीजों के ब्यौरे होते हैं, टॉपर्स के इंटरव्यू। तमाम तरह के सवाल पूछे जाते हैं। सफलता कैसे मिली, आगे की तैयारी क्या है और इस मौके पर आप राष्ट्र के नाम क्या संदेश देना चाहेंगे आदि-आदि। ये सब देख अक्सर मैं फ्लैशबैक में चला जाता हूं। याद आता है जब मेरा दसवीं का रिज़ल्ट आना था। अनिष्ट की आशंका में एक दिन पहले ही नाई से बदन की मालिश करवा ली थी। कान, शब्दकोश में न मिलने वाले शब्दों के प्रति खुद को तैयार कर चुके थे। तैंतीस फीसदी अंकों की मांग के साथ तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं को सवा रूपये की घूस दी जा चुकी थी और पड़ौसी, मेरे सार्वजिनक जुलूस की मंगल बेला का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे।

वहीं फेल होने का डर बुरी तरह से तन-मन में समा चुका था और उससे भी ज़्यादा साथियों के पास होने का। मैं नहीं चाहता था कि ये ज़िल्लत मुझे अकेले झेलनी पड़े। उनका साथ मैं किसी कीमत पर नहीं खोना चाहता था। उनके पास होने की कीमत पर तो कतई नहीं। दोस्तों से अलग होने का डर तो था ही मगर उससे कहीं ज़्यादा उन लड़कियों से बिछड़ जाने का था जिन्हें इम्प्रैस करने में मैंने सैंकड़ों पढ़ाई घंटों का निवेश किया था। असंख्य पैंतरों और सैंकड़ों फिल्मी तरकीबें आज़माने के बाद ‘कुछ एक’ संकेत भी देने लगी थीं कि वो पट सकती हैं। ये सोच कर ही मेरी रूह कांप जाती थी कि फेल हो गया तो क्या होगा! मेरे भविष्य का नहीं, मेरे प्रेम का! या यूं कहें कि मेरे प्रेम के भविष्य का!

कुल मिलाकर पिताजी के हाथों मेरी हड्डियां और प्रेमिका के हाथों दिल टूटने से बचाने की सारी ज़िम्मेदारी अब माध्यमिक शिक्षा बोर्ड पर आ गयी थी। इस बीच नतीजे आए। पिताजी ने तंज किया कि फोर्थ डिविज़न से ढूंढना शुरू करो! गुस्सा पी मैंने थर्ड डिविज़न से शुरूआत की। रोल नम्बर नहीं मिला तो तय हो गया कि कोई अनहोनी नहीं होगी! (फर्स्ट या सैकिंड डिविज़न की तो उम्मीद ही नहीं थी) पिताजी ने पूछा कि यहीं पिटोगे या गली में.....इससे पहले की मैं ‘पसंद’ बताता...फोन की घंटी बजी...दूसरी तरफ मित्र ने बताया कि मैं पास हो गया...मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था....पिताजी भी खुश थे...आगे चलकर मेरा पास होना हमारे इलाके में बड़ी 'आध्यात्मिक घटना' माना गया....जो लोग ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे, वो करने लगे और जो करते थे, मेरे पास होने के बाद उनका ईश्वर से विश्वास उठ गया!

शुक्रवार, 6 मई 2011

“मैंने ओसामा जी नहीं, ओसामा जीजा जी कहा था!”

ओसामा बिन लादेन की मौत और उसके बाद आए दिग्विजय सिंह के बयान पर कुछ वनलाइनर लिखे हैं। आप इन वनलाइनर्स को फेसबुक के फ़ेकिंग न्यूज़ पेज (facebook.com/hindifakingnews) पर भी पढ़ सकते हैं। झेलिए

"भले ही ओसामा बिन लादेन हमारे बीच नहीं रहे मगर हमें उनके अधूरे काम को पूरा करना है"-दिग्विजय सिंह

ओसामा की पहचान के लिए अमेरिका अब उसका डीएनए टेस्ट करवाएगा मुझे डर है कि कहीं वो नारायण दत्त तिवारी का बेटा न निकले!

ओबामा की मौत का स्वागत करते हुए मनमोहन सिंह ने एक बार फिर से सोनिया गांधी के कुशल नेतृत्व की तारीफ की है!

अमेरिका का कहना है कि ओसामा की मौत का क्रेडिट महेंद्र सिंह धोनी को जाता है क्योंकि उसी के 'हैलीकॉप्टर शॉट' से अमेरिकी सेना ने प्रेरणा ली थी!

अफसोस...ओसामा अपनी वसीयत 2001 में लिख गए अगर 2011 में लिखी होती तो ऐबटाबाद की हवेली दिग्विजय सिंह के नाम कर देते#Osama ji

दिग्विजय सिंह का कहना है कि मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है। मैंने ओसामा जी नहीं, ओसामा जीजा जी कहा था!

पाकिस्तान एक 'भाड़' प्रभावित देश है। अर्थव्यवस्था से लेकर राजनीति तक यहां हर चीज़ यहां भाड़ में जा रही है!

पाकिस्तान ने अपनी कुछ ज़मीन चीन को दे रखी है, कुछ तालिबान ने हथिया ली है और उसके मुताबिक कुछ पर इंडिया ने कब्ज़ा कर रखा है। जब उसे ये नहीं पता कि पाकिस्तान में पाकिस्तान कहां है.... तो ये कैसे पता होता कि ओसामा पाकिस्तान में है!

अमेरिकी सेना पर फेंकने के लिए दिग्विजय सिंह जल्द ही पाकिस्तानियों को अपनी अक्ल पर पड़ा पत्थर देंगे!

जो लोग कहते हैं कि हमें पाकिस्तान पर हमला कर उसे नष्ट कर देना चाहिए, वो उसे underestimate कर रहे हैं। मुझे पाकिस्तान की 'क्षमता' पर पूरा यकीन है। थोड़ा सब्र रखें... एक दिन वो खुद ही अपने आप को बर्बाद कर लेगा!

दिग्विजय सिंह का कहना है कि जब मुझ जैसा आदमी ज़िंदा घूम रहा है तो अफज़ल गुरू को फांसी क्यों दी जाए?

आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान ठीक वैसे ही अमेरिका के साथ है जैसे वर्ल्ड कप में श्रीसंत इंडियन टीम के साथ थे!

पाकिस्तान करे भी तो क्या करे...तालिबान से उसका मन मिलता है और अमेरिका से उसे धन मिलता है!

पाकिस्तान का कहना है कि हमारी खुफिया एजेंसियां ओसामा को इसलिए नहीं पकड़ पाईं क्योकि उसे पकड़ने की ट्रेनिंग..... कामरान अकमल ने दी है!

दिग्विजय सिंह की सेवाओं से प्रभावित हो कर कांग्रेस आलाकमान ने पिक-ड्रॉप के लिए उन्हें पवन हंस हैलीकॉप्टर देने का फैसला किया है!

ओसामा बिन लादेन के डीएनए टेस्ट के बाद अमेरिकी खुफिया एजेंसी इस नतीजे पर पहुंची हैं कि वो दिग्विजय सिंह के बाप हैं!

Pigvijay Singh का कहना है कि इसमें मेरी कोई ग़लती नहीं है। कांग्रेस में रहकर मैंने 'जी हुज़ूरी' ही सीखी है इसलिए ओसामा के आगे भी 'जी' लगा बैठा

BREAKING NEWS:मारी गयी औरत, जिसके बारे में पहले कहा जा रहा था कि वो ओसामा की बीवी है दरअसल वो अरूंधति राय निकली!

क्या आप जानते हैं कि ओसामा का सबसे बड़ा बेटा ओसामा की सबसे छोटी बीवी से ग्यारह साल बड़ा था?

अमेरिकी अधिकारी-ख़बर लगी है कि सभी सरकारी इमारतों पर पाकिस्तानी झंडे आधे झुके हैं, क्या आप लोग ओसाम के मरने पर राजकीय शोक मना रहे हैं???? पाक अधिकारी-नहीं जनाब, हमने कुछ नहीं किया...शायद शर्मिंदगी में वो खुद-ब-खुद झुक गए हैं।

जिस तरह पाकिस्तान हर मामले में हिंदुस्तान पर इल्जा़म लगाता है। मुझे शक है कि कहीं वो ये न कह दे कि ओसामा पर हमला करने वाले हैलीकॉप्टर्स में से एक दोरजी खांडू का था!

Pigvijay Singh भारत के सबसे भरोसेमंद नेता हैं... क्योंकि वो ISI मार्का हैं!

बिन लादेन और मनमोहन सिंह में एक समानता तो है। मुसीबत आने पर दोनों ही औरत के पीछे छिपने में यकीन रखते हैं।

दिग्विजय सिंह की भौंकने की प्रवृत्ति को देखते हुए जल्द ही उनका BARKO TEST करवाया जाएगा!

इस रूप में पाकिस्तान सरकार और मनमोहन सिंह एक जैसे हैं कि दोनों को आख़िर तक कुछ भी पता नहीं रहता!

"बार-बार ये न कहो कि ओसामा दुनिया का नम्बर एक आतंकवादी था, मेरा 'इगो' हर्ट होता है"-Pigvijay Singh

ख़तरों का खिलाड़ी तो लादेन था ही, जब मारा गया तब भी दो बीवियों के साथ रह रहा था!

दिग्विजय सिंह का कहना है कि ओसामा की मौत के लिए अन्ना हज़ारे ज़िम्मेदार हैं। अन्ना की नकल करते हुए ओसामा भी अमेरिका के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठा और मारा गया!

ख़तरनाक आतंकवादी ही नहीं, ओसामा दुनिया के इकलौते इंसान भी थे जिसकी अमर सिंह से ज़्यादा सीडी मार्केट में आई थी !
प्रिंस चार्ल्स से ओबामा-आपकी बहू हमारे लिए बड़ी शुभ निकली!

"ज़्यादा खुश होने की ज़रूरत नहीं है, अभी मैं ज़िंदा हूं"-दिग्विजय सिंह

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

इस शहर में हम भी भेड़ें हैं!

ब्लूलाइन में घुसते ही मेरी नज़र जिस शख़्स पर पड़ी है, बस में उसका डेज़ीग्नेशन कन्डक्टर का है। पहली नज़र में जान गया हूं कि सफाई से इसका विद्रोह है और नहाने के सामन्ती विचार में इसकी कोई आस्था नहीं । सुर्ख होंठ उसके तम्बाकू प्रेम की गवाही दे रहे हैं और बढ़े हुए नाखून भ्रम पैदा करते हैं कि शायद इसे ‘नेलकटर’ के अविष्कार की जानकारी नहीं है।

इससे पहले कि मैं सीधा होऊं वो चिल्लाता है- टिकट। मुझे गुस्सा आता है। भइया, तमीज़ से तो बोलो। वो ऊखड़ता है, 'तमीज़ से ही तो बोल रहा हूं।' अब मुझे गुस्सा नहीं, तरस आता है। किसी ने तमीज़ के बारे में शायद उसे 'मिसइन्फार्म' किया है!

टिकिट ले बस में मैं अपने अक्षांश-देशांतर समझने की कोशिश कर ही रहा हूं कि वो फिर तमीज़ से चिल्लाता है-आगे चलो। मैं हैरान हूं ये कौन सा 'आगे' है, जो मुझे दिखाई नहीं दे रहा। आगे तो एक जनाब की गर्दन नज़र आ रही है। इतने में पीछे से ज़ोर का धक्का लगता है। मैं आंख बंद कर खुद को धक्के के हवाले कर देता हूं। आंख खोलता हूं तो वही गर्दन मेरे सामने है। लेकिन मुझे यकीन है कि मैं आगे आ गया हूं क्योंकि कंडक्टर के चिल्लाने की आवाज़ अब पीछे से आ रही है!

कुछ ही पल में मैं जान जाता हूं कि सांस आती नहीं लेना पड़ती है....मैं सांस लेने की कोशिश कर रहा हूं मगर वो नहीं आ रही। शायद मुझे आक्सीज़न सिलेंडर घर से लाना चाहिये था। लेकिन यहां तो मेरे खड़े होने की जगह नहीं, सिलेंडर कहां रखता।

मैं देखता हूं कि लेडीज़ सीटों पर कई जेन्ट्स बैठे हैं। महिलाएं कहती हैं कि भाईसाहब खड़े हो जाओ, मगर वो खड़े नहीं होते। उन्होंने जान लिया है कि बेशर्मी से जीने के कई फायदे हैं। वैसे भी 'भाईसाहब' कहने के बाद तो वो बिल्कुल खड़े नहीं होंगे। कुछ पुरुष महिलाओं से भी सटे खड़े हैं और मन ही मन 'भारी भीड़' को धन्यवाद दे रहे हैं!

इस बीच ड्राइवर अचानक ब्रेक लगाता है। मेरा हाथ किसी के सिर पर लगता है। वो चिल्लाता है। ढंग से खड़े रहो। आशावाद की इस विकराल अपील से मैं सहम जाता हूं। पचास सीटों वाली बस में ढाई सौ लोग भरे हैं और ये जनाब मुझसे 'ढंग' की उम्मीद कर रहे हैं। मैं चिल्लाता हूं - जनाब आपको किसी ने गलत सूचना दी है। मैं सर्कस में रस्सी पर चलने का करतब नहीं दिखाता। वो चुप हो जाता है। बाकी के सफर में उसे इस बात की रीज़निंग करनी है।

बस की इस बेबसी में मेरे अंदर अध्यात्म जागने लगा है। सोच रहा हूं पुनर्जन्म की थ्योरी सही है। हो न हो पिछले जन्म के कुकर्मों की सज़ा इंसान को अगले जन्म में ज़रुर भुगतनी पड़ती है। लेकिन तभी लगता है कि इस धारणा का उजला पक्ष भी है। अगर मैं इस जन्म में भी पाप कर रहा हूं तो मुझे घबराना नहीं चाहिये.... ब्लूलाइन के सफर के बाद नर्क में मेरे लिए अब कोई सरप्राइज नहीं हो सकता !

बहरहाल....स्टैण्ड देखने के लिए गर्दन झुकाकर बाहर देखता हूं। बाहर काफी ट्रैफिक है... कुछ समझ नहीं पा रहा कहां हूं। तभी मेरी नज़र भेड़ों से भरे एक ट्रक पर पड़ती है। एक साथ कई भेड़ें बड़ी उत्सुकता से बस देख रही हैं। एक पल के लिए लगा.... शायद मन ही मन वो सोच रही हैं.....भेड़ें तो हम हैं!