बुधवार, 22 अक्टूबर 2008

भारत तोड़ो आंदोलन

भारत एक स्वादिष्ट चीज़ है। पूरा देश एक बड़ी सी मैस है। देश टेबल पर पड़ा है। खाने वालों की लम्बी कतार है। सब देश खाना चाहते हैं। जीभें लपलपा रही है। देश मुर्गे की तरह फड़फड़ा रहा है। खाने वाले ज्यादा है, देश छोटा। हर किसी को उसका हिस्सा चाहिए। समस्या संगीन है। मगर लोग होशियार। उच्च दर्ज़े के न्यायाधीश। वो किसी को भूखा मरने नहीं देंगे। जानते हैं सब एक साथ देश पर टूट पड़े तो अराजकता फैलेगी।
तय हुआ है कि देश के टुकड़े कर लो और कोई चारा नहीं। सभी की भूख शांत करनी है। हर किसी का टेस्ट अलग है। सब ने अपने-अपने हिस्से की पहचान कर ली है। किसी की नज़र कश्मीर पर है तो किसी की असम पर। कोई उड़ीसा चाहता है तो कोई महाराष्ट्र।
कुछ हिस्से ऐसे हैं जिन पर एक से ज़्यादा की नज़र है। मांग की जा रही है इनके अलग से टुकड़े हों। आंध्र को तोड़ कर तेलंगाना बना दो। असम से बोडोलैंड अलग हो। बंगाल से गोरखालैंड निकाला जाए। यूपी से हरित प्रदेश। लोग बेचैन हो रहे हैं। भूख बढ़ रही है। आवाज़े आ रही हैं जल्दी करो। देश को काटने की तैयारी हो रही है। कुछ कह रहे हैं कि इसे काटो मत, ये ठोस है कटेगा नहीं इसे तोड़ दो। देश को तोड़ा जा रहा है वो नहीं टूट रहा। फिर किसी ने बताया कि देश तो लोगों से बना है। इसे तोड़ा नहीं जा सकता। लोगों को अलग कर दो ये अपने आप बिखर जाएगा। जिन्हें तोड़ना है उनकी पहचान हो गई है।
भाषा, जाति, धर्म, संस्कृति जो देश की सबसे बड़ी विशेषता थी उसे ही इसे तोड़ने का हथियार बना लिया गया है। देश तोड़ने की पूरी तैयारी हो चुकी है। बिना किसी निविदा के समाजसेवियों ने रुचि के मुताबिक ठेके ले लिए हैं। महाराष्ट्र में भाषा के नाम पर देश तोड़ने का काम राजठाकरे ने लिया है तो असम में उल्फा ने। जाति के आधार फूट डालने के क्षेत्र में कर्नल बैंसला ने उल्लेखनीय काम किया है। वहीं धर्म के आधार पर फूट डालने में मारा-मारी मची है। मोदी, लालू, अमर सिंह पासवान जैसे कितने ही आईएसआई मार्का देश तोड़ू काम में जुटे हैं। कई फ्रेंचाइज़ी खुली है। राज्य प्रयोगशाला बन गए हैं,कार्यकर्ता शोधार्थी। देश लैब में पड़ा है महाप्रयोग जारी है। उम्मीद करते हैं जैसे 'भारत छोड़ो आंदोलन' के ज़रिए हमने अंग्रेज़ों को भारत से बाहर भेजा था वैसे ही इस 'भारत तोड़ों आंदोलन' के ज़रिए भारत को भी भारत से बाहर निकाल देंगे।

बुधवार, 15 अक्टूबर 2008

पुरस्कार का एंटी क्लाइमैक्स

पुरस्कार समिति से जुड़े शख़्स का कहना था लोग ख़्वामखाह चिंता करते हैं कि फलां लेखक उम्रदराज़ हो रहा है, डिज़र्व भी करता है, लेकिन अकादमी ध्यान नहीं दे रही। लेखक को वक़्त पर पुरस्कार न मिलना, और मरने से पहले मिल जाना महज़ इतेफ़ाक नहीं है। बहुत कम लोग जानते हैं इस मामले में हमारी तैयारी कॉरपोरेट कम्पनियों से भी अच्छी होती है।
हमने बाकायदा मेडिकल जासूसों की एक टीम तैयार कर रखी है। हर जासूस 70 की उम्र पार कर चुके तीन ब़ड़े लेखकों पर निगरानी रखता है। ये जासूस अलग-अलग तरीकों से हमें रिपोर्ट देते हैं कि फलां लेखक का स्वास्थ्य कैसा चल रहा है। इन तरीकों में लेखक के फैमिली डॉक्टर को खरीद लेना, उससे वक़्त-वक़्त पर लेखक की डॉयबिटिक रिपोर्ट लेना, ब्लड प्रेशर की स्थिति जानना, पता लगाना कि लेखक को कोई बड़ी तक़लीफ तो नहीं है? है तो वो कितनी गंभीर है?
अब इसी रिपोर्ट के आधार पर अकादमी तय करती है कि लेखक को अभी कितना और लटकाया जा सकता है?
मैंने कहा, श्रीमान लेकिन यही तो सवाल है कि आख़िर आप लटकाते क्यों हैं? सारी जवानी लेखक दो पैंटों में निकाल देता है, सौ-सौ रुपये के लिए संपादकों से उलझता रहता है। कुल्फी वाले की घंटी को, ग़फ़लत में डाकिये की घंटी समझ कर दरवाज़ा खोलता है। तब तो उसकी सुध लेते नहीं, फिर अस्सी की उम्र में उसकी उस रचना को सम्मान दे देते हैं जो उसने चालीस में लिखी थी।
बात काटते हुए समिति सदस्य बोले, इसके पीछे भी हमारा अपना दर्शन है। दरअसल समिति मानती है कि 'व्यवस्था से नाराज़गी' ही लेखक की सबसे बड़ी ताकत होती है। अब लेखक की नाराज़गी कोई आशिक की नाराज़गी नहीं कि वो गुस्से में शराब पीने लगे या फांसी पर लटक जाए। इसी नाराज़गी से रचनात्मक ऊर्जा मिलती है। वो उम्दा रचनाएं लिखता है।
हमें लगता है वक़्त पर अगर लेखक को सम्मान और पैसा दोनों मिल जाएगा तो वो 'जीवन के द्वंद्व' को कैसे समझेगा?
मैंने कहा, श्रीमान वो तो ठीक है, लेकिन उस पर भी लेखक की सर्वश्रेष्ठ रचना को पुरस्कार न दिया जाना भी क्या इतेफ़ाक है? उपन्यासकार की कहानी को पुरस्कार दे दिए जाते हैं, और कहानीकार के उपन्यास को, और वो भी ऐसी रचना पर जो खुद लेखक की नज़र में सर्वश्रेष्ठ नहीं होती।
देखिये... चौधराहट का उसूल है कि आप ऐसा कुछ करते रहें जो लोगों की समझ से परे हो। अगर हमें भी उसी पर मुहर लगानी है, जिसकी दुनिया तारीफ कर रही है तो हमारी क्या रह जाएगी? आख़िर हमें भी तो 'अपनी वाली' दिखानी होती है।
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शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2008

सोने दो, सोना मत दो!

गहरी नींद में था कि अचानक कुछ बजने की आवाज़ आई। ये मोबाइल की आवाज़ थी। कम्बल हटाया, तकिये के नीचे देखा, बेड के साइड्स में भी चैक कर लिया,आवाज़ आ रही है, मगर मोबाइल का पता नहीं.. भयंकर नींद में हूं... दिल कर रहा है सो जाऊं, मगर....कोई ज़रूरी कॉल हुआ तो....
एक पल के लिए सोचता हूं। सोने से पहले कहां रखा था। तभी.....याद आता है रात को देर से घर आना हुआ, और मोबाइल पैंट में रह गया!
पैंट की तरफ लपकता हूं। वो उसी में था। ये नोएडा का नम्बर था। एक पल में हज़ार ख़्याल। नोएडा की कुछ कम्पनियों में मैंने अप्लाई किया था, वहीं से तो नहीं... दिल धड़कता है..माता रानी भला करना... फोन उठाता हूं और आवाज आती है ......झाबुआ के छेदीलाल ने जीता है एक किलो सोना....आप भी चाहें तो जीत सकते हैं एक किलो सोना...सोना ही सोना....इसके लिए आपको करना सिर्फ ये है......सिर दीवार में दे मारे। उसने तो नहीं कहा... लेकिन, दिल यही किया कि सिर दीवार में दे मारूं। इन कम्पनियों को मुझे सोना जीताने की तो फिक्र है, मेरे सोने की नहीं।
पहले इस तरह के सिर्फ अंट-शंट मैसिज आया करते थे। लोगो ने पढ़ने बंद कर दिये। अब ये कम्पनियां साधारण दिखने वालों नम्बरों से कॉल करती है। आप फ़ोन काटने का रिस्क नहीं ले सकते।
दोस्त बता रहा था कि उसका बॉस बड़ा खुंदकी है। तीन रिंग से ज़्यादा चली जाए तो उसे लगता है मैं चिढ़ाने के लिए फोन नहीं उठा रहा। इसी दहशत में लू में भी मुझे मोबाइल साथ ले जाना पड़ता है। कल ही मैं लू में था...अचानक मोबाइल बजा....समझ नहीं आया नम्बर कहां का है.... फोन उठाया तो दूसरी तरफ मोहतरमा बताने लगी...आप चाहे 'कहीं' भी हों....अब सुन सकते हैं लेटस्ट पंजाबी और हिंदी गाने....इसके लिए आप अपने......
हे ईश्वर! ......कहीं मतलब क्या ....बोलने से पहले कंफर्म तो कर लो.. सुनने वाला असल मे है कहां!

इस सबको लेकर एक आदमी कुछ ज़्यादा ही गुस्से में था। बता रहा था इन्ही फोन कॉल्स के चलते उसका तलाक होते-होते बचा है। मैंने पूछा- क्या हुआ? होना क्या है-कल घर पहुंचा, तो बीवी पूछने लगी आप 'साढ़े आठ मिनट' देर से आये हो, जान सकती हूं कहां थे 'इतनी देर'।
मैं समझाने लगा.. रेड लाइट में फंस गया। उसके बाद गाड़ी रिज़र्व में आ गयी, तो पैट्रोल भरवाने रूक गया। बीवी कंविंस नहीं हुई। मैं उसे बात समझा ही रहा था.....कि मोबाइल बज उठा। इससे पहले की मैं चेक करता, उसने मोबाइल छीन लिया, स्पीकर फोन ओन किया, मेरी तरफ घूरते हुए फोन पिक किया........दूसरी तरफ से आवाज़ आई.......क्या बात है दोस्त, रेखा और हेमा तुम्हारी बड़ी तारीफ कर रही थी......सुना है तुम उन्हें अच्छे-अच्छे शेर सुना कर इम्प्रैस कर रहे हो......बीवी ने यहीं फोन काट दिया और मित्र, इसके बाद जो हुआ वो रहस्य ही रहे तो बेहतर होगा!

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2008

पिक्चर अभी बाकी है...(व्यंग्य)

मेरा मानना है कि हर समझौते में बराबर न्याय होना चाहिए। मतलब किसी सांसद को ख़रीदते वक़्त अगर कहा गया कि तुम हमें वोट दो, हम तुम्हें नोट देंगे, नोट नहीं तो पद देंगे। तो उसे टाइमली पेमेंट होनी चाहिए। इएमआई का कोई टंटा नहीं, एक मुश्त, लम-सम जितना बने, दे के नक्की करो। वैसे भी ऐसा सांसद जो किसी लालच में पार्टी से विश्वासघात कर आया हो, पैसे न मिलने पर किसी और पर विश्वासघात का इल्ज़ाम नहीं लगा सकता। जैसे झारखंड के राजनीतिक विवाद में भी मेरी पूरी हमदर्दी आदरनीय सोरेन के साथ थी। मैं बराबर तिलमिलाता रहा कि भाई उन्हें मुख्यमंत्री बना क्यों नहीं रहे। उन्होंने 'देश हित' को देखते हुए सरकार के पक्ष में वोट दिया और मधु कोड़ा थे कि 'देश हित' सधने नहीं दे रहे। आख़िर में देशभक्त सोरने की जीत हुई और वो मुख्यमंत्री बने।

मगर ये कहानी एक हिस्सा था। जिनको पद, पैसा मिलना था मिला। पर सवाल ये था कि जिस महान उद्देश्य के लिए ये सब किया जा रहा था उसकी प्राप्ति तो बाकी थी। मेरी हमदर्दी अब कांग्रेस के साथ हुई। बेचारी ने क्या नहीं किया। कितने ईमान खरीदे, कितने घर उजाड़े, कितना निवेश किया, कितने सपने तोड़े(पीएम बनने के), कितनों से धमकी देने का सुख छीना, कितनी लानतें झेलीं सिर्फ इसलिए कि परमाणु डील कर देश तरक्की कर पाए।

ये सोच कर ही मैं कांप जाता था कि इस सबके बावजूद अगर डील नहीं हुई तो कांग्रेस कैसे अपना मुंह, जो पहले ही दिखाने लायक नहीं बचा था, किसी को दिखाएगी। शिबू सोरेने का देश हित तो सध चुका अब किस मुंह से उन्हें उनके पद से हटाते। न ही सांसदों से अपील की जा सकती थी कि चूंकि डील नहीं हुई इसलिए 50 परसेंट पैसे वापिस दो। ये वाकई उसके लिए कष्टदायक होता। लेकिन जैसा कि सब जानते हैं ऊपर वाला किसी के साथ अन्याय नहीं करता। अगर कांग्रेस ने अपने सारे वादे पूरे किए तो उसको भी मनचाहा नतीजा मिला। वैसे भी कहानी फिल्मी हो या असली हम भारतीय विपरित अंत नहीं चाहते। एंटी-क्लाइमेक्स से हमें सख़्त नफरत है। हम सुखांत के आदी हैं। और हमें एनएसजी के देशों, अमेरिकी कांग्रेंस और अमेरिकी दबदबे का शुक्रिया अदा करना चाहिए जिन्होंने ये सुखांत दिखाया। और रही बात सबक की। तो तब तक ख़ैर मनाए जब तक कोई अमेरिकी राष्ट्रपति ये न कह दे..... पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त....

शनिवार, 12 जुलाई 2008

फुटबॉल में गोल!

ख़बर पढ़ी कि यूरो कप में जीत के बाद स्पेन फीफा रैंकिंग में पहले स्थान पर पहुंच गया। कुछ बड़ी टीमों की रैंकिंग के अलावा आख़िर में लिखा था कि ताज़ा रैंकिंग में भारत ने 153 वां स्थान बरकरार रखा है। वाह! कैसा गौरवशाली क्षण है! दिल किया भोंदूराम हलवाई की दुकान से 5 किलो जलेबी ला पूरे मोहल्ले में बांटूं। रिक्शे पर ढोल बजाता शहरभर घूमूं। महिलाएं घरों के आगे रंगोली बनाएं। लड़कियां मेहंदी लगवाएं। बच्चे पटाखे फोड़ें। कवि ओजपूर्ण कविताएं लिखें। पीने का बहाना ढूंढने वाले ठेकों का रुख करें। राष्ट्रीय प्रवक्ता महेश भट्ट जीत की महिमा बताएं और सरकार में ज़रा भी राष्ट्र प्रेम बाकी है तो वो राष्ट्रीय अवकाश घोषित करे। आख़िर मामला 153 वां स्थान ‘बरकरार’ रखने का है।

जहां तक मेरा भाषायी ज्ञान है इंसान उपलब्धियों को बरकारार रखता है शर्मिंदगी को नहीं। जैसे वित्तमंत्री कहते हैं नौ फीसदी विकास दर ‘बरकरार’ रखना चुनौती होगा लेकिन 153 वें स्थान को बनाए रखने के लिए भारत को क्या चुनौतियां झेलनी पड़ीं, ये शोध का विषय है। क्या ये स्थान हमने अच्छी फुटबॉल खेल कर बरकरार रखा है या फिर इसके लिए राजनयिक स्तर पर कोशिशें की गईं। गरीब देशों को धमकाया गया कि हमें पछड़ाने की कोशिश की तो चावल सप्लाई रोक दी जाएगी या फिर गृहयुद्द के चलते कुछ देश फुटबॉल नहीं खेल पाए। कहीं तुनकमिजाज राजा ने खेल पर प्रतिबंध लगा दिया तो कहीं छोटे देशों ने आपस में विलय कर लिया। जानना चाहता हूं कि इस महान उपलब्धि के लिए हम खुद ज़िम्मेदार हैं या फिर बाहरी कारण।

कुछ लोगों को लग सकता है कि मैं दीन-हीन भारतीय फुटबॉल का मज़ाक उड़ा रहा हूं। तो राष्ट्रीय फुटबॉल टीम के कोच बॉब हॉटन का बयान मुलाहिज़ा फरमाएं। ‘अगर भारत 2018 के विश्व कप फुटबॉल के लिए क्वॉलिफाई करना चाहता है तो राज्य संघों को अपना रवैया सुधारना होगा।‘
कहना नहीं चाहिए मगर भारतीय दंड विधान के तहत अगर अव्यावहारिक सपने देखना अपराध की श्रेणी में आता तो हॉटन को सज़ा से बचाने के लिए उनके वकील को काफी मेहनत करनी पड़ती। 153 वां स्थान बरकरार रखना अगर मज़ाक है तो 2018 विश्व कप के लिए क्वॉलिफाई करने की बात करना गैर ज़मानती अपराध है। फुटबॉल संघ के मुखिया प्रियरंजन दास मुंशी से कुछ वक़्त पहले एक पत्रकार ने उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि पूछी तो उनका जवाब था मेरे आने से पहले संघ घाटे में चल रहा था जबकि अब मुनाफा पांच करोड़ हो गया है। कह सकते हैं कि जब संघ के मुखिया को ही खेल की बेहतरी इसके बहीखाते में दिखती हो ऐसे में 153 वां स्थान ‘बरकरार रखना’ भी तो उपलब्धि हो ही सकता है।

शुक्रवार, 11 जुलाई 2008

सलाह छोड़ना मना है! (हास्य-व्यंग्य)

जिस तरह ताने मारने के लिए, चुगली करने के लिए और मज़ाक उड़ाने के लिए होता है, उसी तरह सलाह देने के लिए होती है। हर आदमी सलाहों की फैक्ट्री खोले बैठा है। सलाहों के गोदाम भरे पड़े हैं। इस रूट में सारा ट्रैफिक वन-वे है। इस क्नेक्शन में सारी कॉल्स आउटगोइंग हैं। सलाहों के मैसेज सेंड किये जा रहे हैं लेकिन डिलीवरी रिपोर्ट नहीं आ रही। पूरे माहौल में सलाह ही सलाह है। दम घुटने लगा है। सलाह प्रदूषण हो गया है। ज़रूरत है, 'सलाह नियंत्रण मशीनें' लगाई जायें। रास्ते में रोक लोगों की जांच की जाए कि कहीं कोई ज़्यादा सलाह तो नहीं छोड़ रहा!

पूरा मुल्क सलाहों की रणभूमि में तब्दील हो गया है। हर तरफ सलाहों के तीर छोड़े जा रहे हैं। मूर्ख समझदार से सलाह कर रहा है। मूर्ख, मूर्ख से भी सलाह कर रहा है। मूर्ख अपने अनुभव से मूर्खतापूर्ण सलाह दे रहे हैं। मूर्ख उन सलाहों को मान वैसी ही मूर्खता कर रहे हैं। तमाम मूर्खताओं पर परम्पराओं के लेबल चिपके हैं। लिहाज़ा सभी खुश है!

जिस तरह डाकू लोगों को लूटते हैं। बाप, बच्चों की अक़्ल लूट रहे हैं। बच्चे पेड़ से बंधे हैं। मुंह में कपड़े ठूंसे हुए हैं। बच्चे बेहाल है। लेकिन बाप सलाह दे कर रहेगा क्योंकि उसके बाप ने भी उसे सलाह दी थी। बच्चे सलाह मान रहे हैं, फ़ेल हो रहे हैं। वो नहीं जानते उन सलाहों की एक्सपायरी डेट आ गयी है!

प्रकृति के आधार पर सलाह देने वालों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है-
-शौकिया सलाहदाता
-स्वयंभू बुद्धिजीवी सलाहदाता
और पेशेवर सलाहदाता

हममें से ज़्यादातर शौकिया यानी 'एमेच्योर' सलाहदाता की श्रेणी में आते हैं। इनमें सलाह देने की विशेष उत्कंठा नहीं होती। न ही ये सलाह देने के लिए माहौल बनाते हैं। लेकिन मौका मिले तो चूकते नहीं हैं।

दूसरी श्रेणी स्वयंभू बुद्धिजीवी सलाहदाताओं की है। हर शहर में ये 10 से 15 प्रतिशत के बीच पाये जाते हैं। आम आदमी से दो अख़बार ज़्यादा पढ़ते हैं। वक़्त निकाल कर गीता के कुछ उपदेश रटते हैं और किसी भी न समझ आने वाली बात को, कबीर या तुलसीदास के दोहे का हिंदी रूपांतरण बता, लोगों को धमकाते हैं। ओए गुरु!

सलाह के रंगमंच पर ये शुरूआत तो आत्मसंशय से करते हैं, लेकिन दाद मिलने के बाद ओवरएक्टिंग शुरू कर देते हैं। ज़बरदस्ती की छूट लेने लगते हैं। राह चलतों पर घात लगाकर हमला करते हैं। पढ़ने वालों को कहते हैं, धंधा करो। धंधा करने वालों को समझाते हैं कि 'जीवन के और भी मायने हैं' और जीवन समझने में लगे लोगों को धिक्कारते हैं, 'किस फिज़ूल के काम में लगे हो, भला आज तक कोई जान पाया है जीवन क्या है!' समझो गुरू समझो!

आपके सुख-दुख से इन्हें कोई सरोकार नहीं। इन्हें बस सलाह देनी है। सलाह देना ही इनका जीवन है। इसी में ये पूर्णता महसूस करते हैं। ऐसे लोग सामाजिक दायरे के जिस टापू में रहते हैं, वहां ऐसे आठ-दस लोगों की पहचान कर ही लेते हैं जो इनकी सलाहों के परमानेंट ग्राहक बन पाये।

तीसरी श्रेणी में आते हैं पेशेवर सलाहदाता। ऐसे सलाहदाता जिनके पास सलाह देने का लाइसेंस हैं। इनमें करियर काउंसलर हैं, मनोविज्ञानी हैं, डाइटिशयन हैं। लेकिन विडम्बना है कि हम आधों को हिंदी के नाम तक नहीं दे पाये हैं। ये सब पैसे लेकर सलाह देते हैं लेकिन हम अपने मौहल्ले की किसी भी मुफ्त क्लिनिक में अपना इलाज, 'बड़े भाई' या 'दुनिया देख चुके' सरीख़े किसी शख़्स से करवा लेते हैं। लेकिन ये सलाहदाता परवाह नहीं करते। उदारीकरण से लाभान्वित हुए कुछ चुनिंदा लोग इनके 'मोटे ग्राहक' हैं।

दिल कर रहा है सलाह पर और लिखूं मगर मित्र सलाह दे रहा है कि लोगों को बहुत पका लिया इससे पहले की वो झड़ कर गिर पड़े, रुक जाओ। मैं रुकता हूं, आप पढ़ें।

सोमवार, 7 जुलाई 2008

चीनी ग़म है!

इन दिनों दो लोग ख़ासी चर्चा में हैं। डॉक्टर मनमोहन और कम्पांउडर कृष्णा। मगर दोनों के इधर जिन पर सब की निगाहें हैं वो हैं वहम के मरीज़, वहमपंथी। पांचवी पास से तेज़ भी नहीं समझ पा रहा है कि परमाणु डील पर उनका एतराज़ क्या है। वहमपंथी लगातार कह रहे हैं कि डील देशहित में नहीं है। मगर ये नहीं बता रहे, किस देश के हित में? भारत या चीन? जानकारों को वहमपंथियों की मंशा पर श़क है। लिहाज़ा वो सलाह दे रहे हैं कि उनका लाई डिटेक्टर टेस्ट करवाया जाए। वहीं कुछ अति-उत्साहित ब्रेन मैपिंग की बात भी कर रहे हैं। कुल मिलाकर देश नहीं जान पा रहा कि डील पर एतराज़ की असली वजह वहमपंथियों की स्वाभाविक राष्ट्रीय चिंता है, अनुवांशिक अमेरिकी एलर्जी या फिर पैदाइशी चीन प्रेम। ख़ैर, इस मामले पर मैंने एक वरिष्ठ वहमपंथी से बात की। पेश हैं उसके कुछ अंश।

मैं-सर, देश नहीं समझ पा रहा कि डील को लेकर आख़िर आपका एतराज़ क्या है। वहमपंथी-बेटा, जो बात देश नहीं समझ पा रहा, वो तुम्हारे भेजे में क्या बैठेगी। ‘फिर भी कुछ तो बताएं।‘ वहमपंथी-संघी हो क्या? एक बार में समझ नहीं आती। ‘मतलब आप डील पर बात नहीं करेंगे।‘ वहमपंथी-बिल्कुल नहीं। ‘तो फिर ऐसा क्या पूछूं आपसे, जिस पढ़ने में लोग इंटरेस्टेड हों।‘ वहमपंथी- हल्की-फुल्की बात तो हो ही सकती है।

‘अच्छा तो ये बताएं आख़िरी फिल्म कौन-सी देखी आपने।‘ वहमपंथी-चीनी कम। ‘अरे वाह! वो तो काफी बोल्ड सब्जेक्ट पर थी। वहमपंथी-बोल्ड-इटैलिक को गोली मारो, मुझे तो लगा शायद किसी ने चीन के खिलाफ साज़िश की है। चीनी कम है, हमला करो।

‘चलिए, चीनी को छोड़ते हैं। खाने की बात करते हैं। बंगाली फूड के अलावा ज़्यादा क्या पसंद है। वहमपंथी-चाइनीज़! ‘मगर चाइनीज़ का टेस्ट आपने कैसे डिवेलप किया।‘ वहमपंथी- वो मेरी डिवेलपमंट के साथ ही डिवेलप हुआ है। ‘मतलब, मामला स्वाद से ज्यादा संस्कारों का है।‘ वहमपंथी-जी, बिल्कुल।

‘आप बंगाली हैं, फुटबॉल में तो आपकी दिलचस्पी होगी, यूरो देखा?’ देखिए, पश्चिम की तरफ ताकने की आदत हमारी नहीं है। वो तो बीजेपी और कांग्रेस का चरित्र है। ‘फिर भी किसी खेल में तो दिलचस्पी होगी।‘ वहमपंथी- हां, एक इवेंट का मुझे बेसब्री से इंतज़ार है। ‘वो कौन-सा?’ बीजिंग ओलम्पिक!

‘और एक आख़िरी सवाल, घूमने-फिरने का शौक तो होगा, कोई फेवरेट टूरिस्ट प्लेस।‘ वहमपंथी-ऐसी तो एक ही जगह है। ‘वो कौनसी।‘ वहमपंथी- द ग्रेट वॉल ऑफ चाइना। ‘मतलब चीन की महान दीवार।‘ दरअसल वहीं से हमें प्रेरणा मिलती है कि जहां कहीं से चीन को ख़तरा हो वहां दीवार खड़ी कर दो।