बुधवार, 30 अप्रैल 2008
ये था स्टार स्पिनर का ‘तीसरा’! (हास्य-व्यंग्य)
मंगलवार, 29 अप्रैल 2008
वैयक्तिकता! (individuality)
समाज (एक)
किरदार
समाज पूछता है
ग़र मैं उसका हिस्सा हूं
तो बताऊं
मेरा किरदार क्या है
और मेरे संवाद क्या
समाज कुरेदता है
पर मैं चुप हूं
मुझे बोलना होगा
अपने लिबास दिखाने होंगे
अपना किरदार बताना होगा
और ये भी ज़ाहिर करना होगा
कि मेरी पसन्द क्या है
और नापसन्द क्या
मगर मैं क्या करूं, किस सम्त (तरफ) जाऊं
रंगमंच के तमाशे से हमेशा बचा हूं
अदाओं की अय्यारी से हमेशा डरा हूं
रिश्तों के सुनहरे रेशों में कई बार फंसा हूं
नहीं जानता क्या करूं
मगर ये समाज है कि
मुसलसल पूछता है,
मेरा किरदार क्या है
और मेरे संवाद क्या
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समाज (दो)
होना (Being)
लोग कहते हैं
तुम बोलते बहुत हो
हँसते ज़्यादा हो
संजीदा नहीं हो
सॉफिस्टिकेटिड नहीं हो
संतुलन की कमी है
मज़ाक़ में कहें तो
तुममें एडिटिंग की
सख़्त ज़रूरत है
ये सब हो जाये
तो तुम बेहतर
हो जाओ
सोशल हो जाओ
या फिर एक्सेप्टेबल हो जाओ
प्रिय...गुज़ारिश है
मत मानना लोगों की बात
जो हो बने रहना
इस समाज ने पहले भी बहुत से
इंसान ख़त्म किये हैं।
सोमवार, 28 अप्रैल 2008
रिश्ते भी अगर ब्रेंडिड हो जाएं!
आज जब एक आदमी की दूसरे से उम्मीद घटती जा रही है, बाज़ार से लगातार उसकी उम्मीदें बढ़ती जा रही है। टूथपेस्ट में तो वो नमक चाहता है और बेटे से उम्मीद नहीं कि घर लौट कर पूछ ले कि पिताजी आज दिन कैसा रहा? रिश्तों से रिटर्न नहीं मिल रहा है, यही वजह है कि उनमें इनवेस्टमेंट भी कम हो गई है!
ऐसे में बड़ी कम्पनियां अपनी गुडविल का फायदा उठाते हुए रिश्ते बेचना भी शुरू कर दें। चमाटा कम्पनी को चाहिये कि वो एक लाख की कार के बाद, पचास हज़ार का पति भी ले आये। टीवी पर पति का विज्ञापन आ रहा है। मॉडल कह रहा है मैं चमाटा कम्पनी का सस्ता, सुंदर और मूर्ख पति हूं। मेरी सबसे बड़ी ख़ासियत यही है कि मैं मूर्ख हूं। मेरा पास अपना दिमाग नहीं। जैसा मुझे कहा जायेगा मैं वैसा ही करूंगा। मेरी दूसरी ख़ासियत है कि मैं सुंदर हूं। 'बेवकूफ' और 'हैंडसम’ पति का ऐसा 'डैडली कॉम्बीनेशन' आपको किसी और कम्पनी में नहीं मिलेगा। मार्केट में जब साथ चलूंगा तो आपका ईगो सैटिस्फाई करूंगा। मैं पन्द्रह सौ रूपये मासिक की आसान किस्तों में 'मनी बैक गारंटी' के साथ उपलब्ध हूं। पसंद न आने पर डाउन पेमंट वापिस, और किस्ते बंद!
मेरी आंखों के सामने सीन क्रिएट हो रहा है। महिला पति को काउंटर पर पटकते हुए दुकानदार को डांटती है, कैसे पति बेचते हैं आप ? दुकानदार घबराता है। क्या हुआ मैडम...होना क्या है....कितनी आवाज़ करता है ये! दुकानदार घबराता हुआ ....मैडम रसीद दिखायें। रसीद देखते हुए, स़ॉरी मैडम वैलीडिटी तो निकल गई, पीस तो चेंज नहीं कर सकते। महिला-फिर क्या कर सकते हैं.....दुकानदार थोड़ा रूकते हुए..... आप कहें तो इनमें साइलेंसर लगा दें! महिला उछलते हुए-हां ये बढ़िया रहेगा, लगा दो!
सच....रिश्तों की आज जो हालत है उनका बाज़ार भाव तब ही सुधर सकता है, जब बड़ी कम्पनियां उन्हें बेचने लगे और वो ब्रेंडिड हो जायें! हुंडई हसबैंड, वोडाफोन वाइफ, टाइटन आंटी और कोडैक अंकल! वाह! कितनी ब्रेंडिड फैमिली होगी!
तबीयत नहीं, नीयत है ख़राब! (हास्य-व्यंग्य)
उनकी इस बीमारी पर बहुत से लोगों ने रिसर्च की मगर हाथ कुछ नहीं लगा। लोग समझ नहीं पा रहे ‘वीकली बेसिस’ पर आने वाली ये कौन सी बीमारी है जो जितनी तेज़ी से उन्हें अपने आगोश में लेती है, उतनी ही जल्दी छोड़ भी देती है। हंसती-खेलती वो ऑफिस से जाती हैं, हंसती-खेलती ही लौटती हैं। इस बीच वो बीमार पड़ती हैं और रिकवर भी कर जाती हैं!
हममें से बहुतों की तमन्ना है कि हम भी इस तरह ‘अचानक’ बीमार पड़ें, मगर ज़्यादातर इसे अफोर्ड नहीं कर सकते। वजह, इस तरह बीमार पड़ने के लिए बॉस से मेल बढ़ाना पड़ता है और अगर आप मेल हैं, और आपका बॉस भी मेल है तो ये मेल कभी नहीं बढ़ सकता है। आप रियलाइज़ करते हैं कि जिस समाज में महिला उत्पीड़न की इतनी बात की जाती है, वहां आदमी की 'असल औकात' ये है कि वो ज़रा-सा झूठ बोल एक टु्च्ची बीमारी भी अफोर्ड नहीं कर सकता!
पूरी स्थिति पर मैंने एक ईमानदार चिंतन किया और सोचा कि मेरी असल तकलीफ क्या है ? क्या मैं अचानक बीमार नहीं पड़ सकने की अपनी ‘सीमा’ से परेशान हूं या मुझे इस बात का अफसोस है कि मैं बॉस नहीं हूं? बहुत सोचने पर निष्कर्ष निकाला कि भाषा को लेकर मेरा प्यार ही मेरी असली पीड़ा है।
मुझे 'अचानक' और 'इतेफाक' शब्दों के खिलाफ षड्यंत्र की बू आ रही है। 'अचानक' शब्द के साथ अगर कंसिस्टेंसी जुड़ जायेगी और इतेफाक के बारे में भविष्यवाणी होने लगेगी तो इन दोनों शब्दों का अस्तित्व ही मिट जायेगा। नहीं-नहीं मैं ऐसा नहीं होने दूंगा। मगर मैं कर भी क्या सकता हूं?
अपने ब्लॉग के माध्यम से (अगर कोई पढ़ रहा है तो) मैं सरकार से निवेदन करना चाहता हूं कि ऐसे लोग जिनकी 'अचानक' तबीयत ख़राब होती है, दरअसल इनकी तबीयत नहीं, नीयत ख़राब होती है। इसलिए मेरी गुज़ारिश है कि कि इन लोगों की 'नीयत' को इनकी तबीयत का हिस्सा माना जाये, और जब भी इनकी नीयत ख़राब हो इन्हें इस आधार पर छुट्टी लेने का हक़ दिया जाये कि इनकी तबीयत ख़राब है। मतलब नीयत ख़राब होने पर इन लोगों को मेडिकल लीव दी जाये। इस तरह इनका काम भी हो जायेगा और भाषा की गरिमा भी बनी रहेगी।
शनिवार, 26 अप्रैल 2008
उनकी फ़ुरसत, हमारी ख़बर! (हास्य-व्यंग्य)
फुरसत, हमारी ख़बर' में। आस्ट्रेलिया से लौटने के बाद क्या कर रहे हैं टीम
इंडिया के सितारे अगले एक घंटे में हम इसका जायज़ा लेंगे।
तो सबसे पहले हम रुख करेंगे दिल्ली का, जहां मौजूद हैं हमारे संवाददाता
धुरंधर सिंह। हां तो धुरंधर बताएं। जी अज्ञान... इस वक़्त मैं मशहूर हेयर
स्टाइलिस्ट 'जा-बे' हबीब के सैलून के बाहर खड़ा हूं। अभी-अभी युवा तेज़
गेंदबाज़ प्रशांत शर्मा अंदर गए हैं। उनके यहां आने को लेकर मतभेद बना
हुआ है। कुछ का कहना है कि वो कटिंग करवाने आए हैं, तो कुछ का कहना
है शेव करवाने। वहीं ऐसे भी लोग हैं जिनका मानना है कि उन्नीस साल की
उम्र में शेव तो उनके ढंग से आई नहीं, वो यहां ज़ीरो नम्बर मशीन फिरवाने
आए हैं।
लेकिन अज्ञान, सूत्रों से जो ख़बर हमें मिल रही है उसके हिसाब से वो यहां
'आईब्रो' बनवाने आए हैं। सूत्र बताते हैं कि जो मीडिया कम्पनी प्रशांत का
बिज़नेस प्रमोशन देख रही है उसे लगता है कि प्रशांत गेंद फेंकने के बाद
बल्लेबाज़ को देखते हुए जब आईब्रो रेज़ करता है, तो उसकी 'स्क्रीन प्रजेंस'
कुछ ठीक नहीं आती। इसीलिए कम्पनी ने प्रशांत को सलाह दी है कि अच्छा
हो अगर वो आईब्रो बनवा लें!
तभी अज्ञान बीच में काटते हुए...लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या इतनी कम
उम्र में उन्हें आईब्रो बनवानी चाहिए? मैं 'पर्सनल एक्सपीरियंस' से बता सकता
हूं कि अगर एक बार आप धागा लगवा लें तो हर पन्द्रह दिनों में नाई के पास
जाना पड़ता है।
इस बारे में दर्शकों से जानना चाहेंगे कि क्या उन्नीस साल की उम्र में प्रशांत
शर्मा को आईब्रो बनवानी चाहिए? आप अपने जवाब 'हां' या 'ना' में स्क्रीन पर
दिये नम्बर पर भेज सकते हैं।
और आइये अब रूख करते हैं टीम इंडिया के कप्तान महेन्द्र सिंह 'सो-नहीं' के
शहर रांची का, जहां मौजूद हैं हमारे संवाददाता मुफ़्तलाल। तो मुफ़्तलाल
बताएं क्या ख़बर है? दीपक, इस वक़्त मैं रांची के मेन मार्केट में मौजूद हूं
जहां टीम इंडिया के कप्तान महेंन्द्र सिंह 'सो-नहीं' अपने भाई के साथ दही
खरीदने आए हैं।हमने जब उनसे पूछा कि दही खरीदने वो बाज़ार क्यों आए हैं, तो उनका
कहना था कि दही के मामले में मैं काफी चूज़ी हूं, इसलिए दही खरीदने खुद
ही बाज़ार आता हूं और जब उनसे पूछा गया कि आपकी माताजी घर पर दही
नहीं जमातीं तो उन्होंने हंसते हुए बताया कि आप तो जानते हीं हैं कि मैं दूध
का कितना शौकीन हूं। सारा दूध ऐसे ही पी जाता हूं.. दही जमाने लायक
बचता ही नहीं।
लेकिन अज्ञान मैं आपको बताना चाहूंगा कि उन्होंने ये बताने से साफ इंकार
कर दिया कि वो इस दही का आख़िर करेंगे क्या?
अज्ञान फिर बीच में कूदता है, तो मुफ्तलाल आपका कहना है कि 'सो-नहीं' ने
ये बताने से साफ इंकार कर दिया है कि वो दही का क्या करेंगे? ये तो अपने
आप में बड़ी ख़बर है।
चलिए हम दर्शकों से ही पूछते हैं ....आप बताएं क्या लगता है आपको कि
महेन्द्र सिंह 'सो-नहीं' जो दही ले कर आएं है उसका वो क्या करेंगे? इसके
लिए आपके पास चार आप्शंस हैं।
आप्शन ए क्या वो इस दही का बूंदी वाला रायता बनाएंगे? आप्शन बी क्या
वो दही को मिक्सी में फेंटकर उसकी लस्सी बनाएंगे? आप्शन सी क्या वो
दही की कढ़ी बनाएंगे? आप्शन डी क्या वो बालों को मुलायम करने के लिए
उसे सिर में लगाएंगे?
आप अपने जवाब हमें आज शाम सात बजे तक हमारी वेबसाइट 'उनकी
फुरसत हमारी ख़बर' डॉट कॉम पर ईमेल के ज़रिए भेज सकते हैं। इसके
अलावा आप फलां नम्बर पर एसएमएस भी कर सकते हैं या फलां नम्बरों पर
कॉल कर सकते हैं। और फोन पर अगर आप पैसे बर्बाद न करना चाहें तो
हमें मिस कॉल कर सकते हैं, हमारा लड़का आपको पलट कर कॉल कर लेगा।
नोट-(यह लेख पहले indiabol.blogspot.com पर पोस्ट हो चुका है।
अपने ब्लॉग पर पहली दफा डाल रहा हूं।)
मच्छर को बनाएं राष्ट्रीय कीट (हास्य-व्यंग्य)
मतलब पहले किसी भी चीज को सिर-आंखों पर बैठाओ, फिर सिगरेट के ठूंठ की तरह पैरों तले मसल दो। मेरा मानना है कि जब यह सिद्धांत इतना सीधा है तो क्यों न हम तमाम बड़ी समस्याओं को राष्ट्रीय महत्व से जोड़ दें, वे खुद-ब-खुद खत्म हो जाएंगी। इस दिशा में हमें सबसे पहले मच्छर को राष्ट्रीय कीट घोषित करना चाहिए।
सरकार घोषणा करे कि राष्ट्रीय कीट होने के नाते मच्छरों का संरक्षण किया जाए। उसे ' गंदगी बढ़ाओ, मच्छर बचाओ ' टाइप कैम्पेन चलाने चाहिए। निगम कर्मचारियों को आदेश दिए जाएं कि वे अपनी अकर्मण्यता में सुधार लाएं। जिस गली में पहले हफ्ते में दो बार झाडू लगती थी, वहां महीने में एक बार से ज्यादा झाडू न लगे। गंदगी बढ़ाने के लिए पॉलिथीन के इस्तेमाल को प्रोत्साहन दिया जाए ताकि अधूरी चौपट सीवर व्यवस्था पूरी तरह चौपट हो पाए। गटर-नालियां जितने उफान पर होंगी, उतनी तेजी से मच्छर बिरादरी फल-फूल पाएगी। मच्छर को चीतल के समान दर्जा दिया जाए और प्रावधान किया जाए कि एक मच्छर मारने पर पांच साल का सश्रम कारावास और दो लाख का आर्थिक दण्ड दिया जाएगा। कानून का आम आदमी में खौफ पैदा करने के लिए ' एक मच्छर आदमी को जेल भिजवा सकता है ' टाइप थ्रेट कैम्पेन भी चलाए जाएं। इसके लिए किसी बड़े स्टार की सहायता ली जा सकती है।
किसी सिलेब्रिटी को मच्छर अम्बेसडर घोषित किया जा सकता है। आप इसे कोरी बकवास न समझें। आपको जानकर हैरानी होगी कि जब इस योजना को मैंने सरकार के सामने रखा तो उसने फौरन देश के 156 जिलों में प्रायोगिक तौर पर इसे लागू भी कर दिया और जो नतीजे आए वे बेहद चौंकाने वाले थे।
निगम कर्मचारियों तक जैसे ही सरकार का फरमान पहुंचा उनका खून खौल उठा। उन्होंने तय किया कि अब वे कभी अपनी झाडू पर धूल नहीं चढ़ने देंगे। जो कर्मचारी पहले सड़क पर झाडू नहीं लगाते थे, वो खुंदक में अपने घर पर भी सुबह-शाम झाडू लगाने लगे। वहीं पॉलिथीन का ज्यादा इस्तेमाल करने के सरकारी आदेश के बाद महिलाएं पति की पुरानी पैंट का थैला बनाकर बाजार से सामान लाने लगीं। शाही घरानों के़ लड़कों ने, जो पहले जंगल में शेर का शिकार करने जाते थे, अब जीपों का मुंह शहर के गटरों की तरफ कर दिया। अब वह बंदूक के बजाय शिकार पर बीवी की चप्पलें ले जाने लगे और उनसे चुन-चुनकर मच्छर मारने लगे। इस सबके बीच उन लोगों की मौज हो गई जो एक वक्त कमजोर डील-डौल के चलते मच्छर कहलाते थे, अब वो इसे कॉम्प्लीमेंट की तरह लेने लगे।
खैर, नतीजा यह हुआ कि लागू करने के महज तीन महीने के भीतर ही योजना बुरी तरह फ्लॉप हो गई और सभी 156 जिले पूरी तरह मच्छरों से मुक्त करवा लिए गए। योजना की असफलता से उत्साहित कुछ लोगों ने प्रस्ताव रखा है कि इसी तर्ज पर भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय आचरण और दलबदल को राष्ट्रीय खेल घोषित किया जाए। इसी तरह 'अतिथि देवो भव' का स्लोगन बदलकर 'अतिथि छेड़ो भव' किया जाए। ऐसा करने पर ही इन समस्याओं से मुक्ति मिल पाएगी।
गुरुवार, 24 अप्रैल 2008
महंगाई से निपटने के कुछ उपाय! (हास्य-व्यंग्य)
बताने की ज़रुरत नहीं है कि सरकारें करने का नहीं कहने का खाती है। और आज जब महंगाई के चलते आम आदमी का खाना मुश्किल हो रहा है, सरकार बहानेबाज़ी के फ्रंट पर भी मुंह की खा रही है। उससे कुछ भी कहते नहीं बन रहा। आख़िर क्या हो गया हमारे नेताओं की रचनात्मकता को? ‘जादू की छड़ी नहीं है’, टाइप एक आध बयान आए भी लेकिन बात बनी नहीं। लालू जी ने भी महंगाई के पीछे बीजेपी समर्थित व्यापारियों का हाथ बताया, लेकिन ये बात भी विपक्ष पर हमला कम और ‘एसएमएस जोक’ ज़्यादा लगी। बहरहाल, सरकार का ये आत्मसमर्पण मुझसे देखा नहीं जा रहा और मैंने तय किया है कि इस बारे में उसकी कुछ मदद करुं। मैं जानता हूं वो महंगाई से जनता को तो नहीं बचा सकती। लेकिन मेरी सलाहें मान ले तो वो महंगाई से ‘खुद को’ ज़रुर बचा सकती है।
1-कुछ लोगों का कहना है कि सरकार को महंगाई की ख़बर इतनी देर से इसलिए लगी क्योंकि ज़्यादातर सांसद और विधायक तो संसद और विधानसभा की कैंटीनों में भयंकर सब्सिडी वाला खाना खाते हैं। उन्हें लगता रहा कि जितना सस्ता खाना यहां मिलता है उतना ही बाहर भी मिलता होगा। बहरहाल, मेरा सरकार से निवेदन है कि वो अपनी तमाम सांसदों को आदेश कि संसद का सत्र शुरु हो चुका है। इसलिए जितने दिनों तक सत्र चले वो रोज़ाना पचास सौ लोगों का खाना संसद की कैंटीन से पैक करवा कर ले जाएं। और टिफिनों में भर-भर कर अपने-अपने इलाकों में पुहंचाए। हो सकता है खाना पहुंचने तक ठंडा हो जाए लेकिन इस पर भी लोग नाराज़ नहीं होंगे। अब आप बताएं जिनके लिए खाने की याद तक बासी हो चुकी हो, वो भला बासी खाने की क्या शिकायत करेंगे!
2-अंत्योदय योजना की तरह एक ‘केलेंडर और पोस्टर योजना’ शुरु की जाए। लोग सब्ज़ियों की शक़्ल न भूल जाए इसलिए इनके पोस्टर छपवा कर घर-घर पहुंचाए जाएं। इसके पीछे मक़सद यही हो कि मंहगाई में आप भले ही शिमला मिर्च खा न सकें, कम से कम रसोई में इसका पोस्टर तो लगा सकते हैं। पोस्टर छपवाने में ज़्यादा खर्चा न आए इसके लिए हर इलाके में उसी कम्पनी से करार किया जाए जो किसानो की कर्ज़माफी के बड़े-बड़े होर्डिंग्स छाप रही है। इससे डिस्काउंट मिलेगा। साथ ही सब्ज़ियों और दालों की तस्वीरों वाले केलेंडर भी राशन की दुकानों पर उपलब्ध करवाये जाएं। ताकि रेहडी पर सब्ज़ियां देख आम आदमी नोस्टैलजिक फील न करे और महीना बदलने का साथ ही वो कलेंडर में ‘आंख का ज़ायका’ भी बदल सके।
3-सब्ज़ियों के साथ-साथ दूध भी आम आदमी की पहुंच से बाहर हो रहा है। बड़ों की तो विशेष बात नहीं, बच्चों को इसकी ख़ासी ज़रुरत होती है। ऐसे में सरकार पोलियो ड्राप्स की तरह ‘दूध ड्राप्स’ पिलाने के लिए मिशन दूध शुरु करें। महीने में एक दिन तय करे जब लोग अपने बच्चों को नज़दीकी केन्द्रों पर ले जा कर दूध ड्राप्स पिलवायें। और लगे हाथ चाय के लिए कुछ बूंदें साथ ले आएं। इसका स्लोगन भी ‘दो बूंद ज़िंदगी की’ रखा जाए। ये बात अलग है कि इससे बच्चों को ज़िंदगी मिले न मिले, सरकार को ज़रुर मिलेगी।
4-भूखे आदमी का दिमाग भी कम चलता है। लिहाज़ा अगर सरकार अगले डेढ़ सौ सालों तक भी ये समझाती रहेगी कि महंगाई इसलिए बढ़ी है क्यों कि कच्चे तेल की कीमत एक सौ बीस डॉलर प्रति बैरल हो गई है तब भी लोग नहीं समझेंगे। वायदा कारोबार के लिए बीजेपी पर हमला करने और अमेरिकी मंदी का हवाला देने से भी बात नहीं बनेगी। ज़रुरत है सरकार ज़िले से लेकर पंचायत स्तर के तमाम पार्टी मुख्यालयों को हिदायत दे कि अपने-अपने इलाकों में नुक्कड़ नाटकों के ज़रिये लोगों को ये कारण समझाएं। इसके लिए पार्टी के नाटकबाज़ कार्यकर्ताओं की मदद ली जाए। उन्हें निर्देश दिए जाएं कि राहुल बाबा को कृष्ण, और सोनिया गांधी को मां दुर्गा के रुप में दिखाने वाले पोस्टर बनाने का काम छोड़कर फौरन इन नाटकों की तैयारी की जाए। नाटक ख़त्म होने तक लोग रुके रहें इसलिए आख़िर में चाय मट्ठी का बंदोबस्त किया जाए।
5-और आख़िर महंगाई सबसे ज़्यादा हल्ला करने वाले वामदलों को सरकार कटघरे में खड़ा करें। उससे पूछा जाए तुम लोग दिन-रात चीन की चम्मचागिरी में बिताते हो उसका आखिर क्या फायदा क्या? उससे पूछो बाकी सस्ते सामानों की तरह क्यों नहीं वो सस्ती सब्ज़ियां भी भारत को बेचता। उसे समझाओ कि अलार्म क्लोक बेचना बंद करे, हम हिंदुस्तानी वैसी भी लेट उठते हैं, कुछ भेजना ही है तो सस्ती सब्ज़िया भेजो।
