शनिवार, 12 जुलाई 2008

फुटबॉल में गोल!

ख़बर पढ़ी कि यूरो कप में जीत के बाद स्पेन फीफा रैंकिंग में पहले स्थान पर पहुंच गया। कुछ बड़ी टीमों की रैंकिंग के अलावा आख़िर में लिखा था कि ताज़ा रैंकिंग में भारत ने 153 वां स्थान बरकरार रखा है। वाह! कैसा गौरवशाली क्षण है! दिल किया भोंदूराम हलवाई की दुकान से 5 किलो जलेबी ला पूरे मोहल्ले में बांटूं। रिक्शे पर ढोल बजाता शहरभर घूमूं। महिलाएं घरों के आगे रंगोली बनाएं। लड़कियां मेहंदी लगवाएं। बच्चे पटाखे फोड़ें। कवि ओजपूर्ण कविताएं लिखें। पीने का बहाना ढूंढने वाले ठेकों का रुख करें। राष्ट्रीय प्रवक्ता महेश भट्ट जीत की महिमा बताएं और सरकार में ज़रा भी राष्ट्र प्रेम बाकी है तो वो राष्ट्रीय अवकाश घोषित करे। आख़िर मामला 153 वां स्थान ‘बरकरार’ रखने का है।

जहां तक मेरा भाषायी ज्ञान है इंसान उपलब्धियों को बरकारार रखता है शर्मिंदगी को नहीं। जैसे वित्तमंत्री कहते हैं नौ फीसदी विकास दर ‘बरकरार’ रखना चुनौती होगा लेकिन 153 वें स्थान को बनाए रखने के लिए भारत को क्या चुनौतियां झेलनी पड़ीं, ये शोध का विषय है। क्या ये स्थान हमने अच्छी फुटबॉल खेल कर बरकरार रखा है या फिर इसके लिए राजनयिक स्तर पर कोशिशें की गईं। गरीब देशों को धमकाया गया कि हमें पछड़ाने की कोशिश की तो चावल सप्लाई रोक दी जाएगी या फिर गृहयुद्द के चलते कुछ देश फुटबॉल नहीं खेल पाए। कहीं तुनकमिजाज राजा ने खेल पर प्रतिबंध लगा दिया तो कहीं छोटे देशों ने आपस में विलय कर लिया। जानना चाहता हूं कि इस महान उपलब्धि के लिए हम खुद ज़िम्मेदार हैं या फिर बाहरी कारण।

कुछ लोगों को लग सकता है कि मैं दीन-हीन भारतीय फुटबॉल का मज़ाक उड़ा रहा हूं। तो राष्ट्रीय फुटबॉल टीम के कोच बॉब हॉटन का बयान मुलाहिज़ा फरमाएं। ‘अगर भारत 2018 के विश्व कप फुटबॉल के लिए क्वॉलिफाई करना चाहता है तो राज्य संघों को अपना रवैया सुधारना होगा।‘
कहना नहीं चाहिए मगर भारतीय दंड विधान के तहत अगर अव्यावहारिक सपने देखना अपराध की श्रेणी में आता तो हॉटन को सज़ा से बचाने के लिए उनके वकील को काफी मेहनत करनी पड़ती। 153 वां स्थान बरकरार रखना अगर मज़ाक है तो 2018 विश्व कप के लिए क्वॉलिफाई करने की बात करना गैर ज़मानती अपराध है। फुटबॉल संघ के मुखिया प्रियरंजन दास मुंशी से कुछ वक़्त पहले एक पत्रकार ने उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि पूछी तो उनका जवाब था मेरे आने से पहले संघ घाटे में चल रहा था जबकि अब मुनाफा पांच करोड़ हो गया है। कह सकते हैं कि जब संघ के मुखिया को ही खेल की बेहतरी इसके बहीखाते में दिखती हो ऐसे में 153 वां स्थान ‘बरकरार रखना’ भी तो उपलब्धि हो ही सकता है।

शुक्रवार, 11 जुलाई 2008

सलाह छोड़ना मना है! (हास्य-व्यंग्य)

जिस तरह ताने मारने के लिए, चुगली करने के लिए और मज़ाक उड़ाने के लिए होता है, उसी तरह सलाह देने के लिए होती है। हर आदमी सलाहों की फैक्ट्री खोले बैठा है। सलाहों के गोदाम भरे पड़े हैं। इस रूट में सारा ट्रैफिक वन-वे है। इस क्नेक्शन में सारी कॉल्स आउटगोइंग हैं। सलाहों के मैसेज सेंड किये जा रहे हैं लेकिन डिलीवरी रिपोर्ट नहीं आ रही। पूरे माहौल में सलाह ही सलाह है। दम घुटने लगा है। सलाह प्रदूषण हो गया है। ज़रूरत है, 'सलाह नियंत्रण मशीनें' लगाई जायें। रास्ते में रोक लोगों की जांच की जाए कि कहीं कोई ज़्यादा सलाह तो नहीं छोड़ रहा!

पूरा मुल्क सलाहों की रणभूमि में तब्दील हो गया है। हर तरफ सलाहों के तीर छोड़े जा रहे हैं। मूर्ख समझदार से सलाह कर रहा है। मूर्ख, मूर्ख से भी सलाह कर रहा है। मूर्ख अपने अनुभव से मूर्खतापूर्ण सलाह दे रहे हैं। मूर्ख उन सलाहों को मान वैसी ही मूर्खता कर रहे हैं। तमाम मूर्खताओं पर परम्पराओं के लेबल चिपके हैं। लिहाज़ा सभी खुश है!

जिस तरह डाकू लोगों को लूटते हैं। बाप, बच्चों की अक़्ल लूट रहे हैं। बच्चे पेड़ से बंधे हैं। मुंह में कपड़े ठूंसे हुए हैं। बच्चे बेहाल है। लेकिन बाप सलाह दे कर रहेगा क्योंकि उसके बाप ने भी उसे सलाह दी थी। बच्चे सलाह मान रहे हैं, फ़ेल हो रहे हैं। वो नहीं जानते उन सलाहों की एक्सपायरी डेट आ गयी है!

प्रकृति के आधार पर सलाह देने वालों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है-
-शौकिया सलाहदाता
-स्वयंभू बुद्धिजीवी सलाहदाता
और पेशेवर सलाहदाता

हममें से ज़्यादातर शौकिया यानी 'एमेच्योर' सलाहदाता की श्रेणी में आते हैं। इनमें सलाह देने की विशेष उत्कंठा नहीं होती। न ही ये सलाह देने के लिए माहौल बनाते हैं। लेकिन मौका मिले तो चूकते नहीं हैं।

दूसरी श्रेणी स्वयंभू बुद्धिजीवी सलाहदाताओं की है। हर शहर में ये 10 से 15 प्रतिशत के बीच पाये जाते हैं। आम आदमी से दो अख़बार ज़्यादा पढ़ते हैं। वक़्त निकाल कर गीता के कुछ उपदेश रटते हैं और किसी भी न समझ आने वाली बात को, कबीर या तुलसीदास के दोहे का हिंदी रूपांतरण बता, लोगों को धमकाते हैं। ओए गुरु!

सलाह के रंगमंच पर ये शुरूआत तो आत्मसंशय से करते हैं, लेकिन दाद मिलने के बाद ओवरएक्टिंग शुरू कर देते हैं। ज़बरदस्ती की छूट लेने लगते हैं। राह चलतों पर घात लगाकर हमला करते हैं। पढ़ने वालों को कहते हैं, धंधा करो। धंधा करने वालों को समझाते हैं कि 'जीवन के और भी मायने हैं' और जीवन समझने में लगे लोगों को धिक्कारते हैं, 'किस फिज़ूल के काम में लगे हो, भला आज तक कोई जान पाया है जीवन क्या है!' समझो गुरू समझो!

आपके सुख-दुख से इन्हें कोई सरोकार नहीं। इन्हें बस सलाह देनी है। सलाह देना ही इनका जीवन है। इसी में ये पूर्णता महसूस करते हैं। ऐसे लोग सामाजिक दायरे के जिस टापू में रहते हैं, वहां ऐसे आठ-दस लोगों की पहचान कर ही लेते हैं जो इनकी सलाहों के परमानेंट ग्राहक बन पाये।

तीसरी श्रेणी में आते हैं पेशेवर सलाहदाता। ऐसे सलाहदाता जिनके पास सलाह देने का लाइसेंस हैं। इनमें करियर काउंसलर हैं, मनोविज्ञानी हैं, डाइटिशयन हैं। लेकिन विडम्बना है कि हम आधों को हिंदी के नाम तक नहीं दे पाये हैं। ये सब पैसे लेकर सलाह देते हैं लेकिन हम अपने मौहल्ले की किसी भी मुफ्त क्लिनिक में अपना इलाज, 'बड़े भाई' या 'दुनिया देख चुके' सरीख़े किसी शख़्स से करवा लेते हैं। लेकिन ये सलाहदाता परवाह नहीं करते। उदारीकरण से लाभान्वित हुए कुछ चुनिंदा लोग इनके 'मोटे ग्राहक' हैं।

दिल कर रहा है सलाह पर और लिखूं मगर मित्र सलाह दे रहा है कि लोगों को बहुत पका लिया इससे पहले की वो झड़ कर गिर पड़े, रुक जाओ। मैं रुकता हूं, आप पढ़ें।

सोमवार, 7 जुलाई 2008

चीनी ग़म है!

इन दिनों दो लोग ख़ासी चर्चा में हैं। डॉक्टर मनमोहन और कम्पांउडर कृष्णा। मगर दोनों के इधर जिन पर सब की निगाहें हैं वो हैं वहम के मरीज़, वहमपंथी। पांचवी पास से तेज़ भी नहीं समझ पा रहा है कि परमाणु डील पर उनका एतराज़ क्या है। वहमपंथी लगातार कह रहे हैं कि डील देशहित में नहीं है। मगर ये नहीं बता रहे, किस देश के हित में? भारत या चीन? जानकारों को वहमपंथियों की मंशा पर श़क है। लिहाज़ा वो सलाह दे रहे हैं कि उनका लाई डिटेक्टर टेस्ट करवाया जाए। वहीं कुछ अति-उत्साहित ब्रेन मैपिंग की बात भी कर रहे हैं। कुल मिलाकर देश नहीं जान पा रहा कि डील पर एतराज़ की असली वजह वहमपंथियों की स्वाभाविक राष्ट्रीय चिंता है, अनुवांशिक अमेरिकी एलर्जी या फिर पैदाइशी चीन प्रेम। ख़ैर, इस मामले पर मैंने एक वरिष्ठ वहमपंथी से बात की। पेश हैं उसके कुछ अंश।

मैं-सर, देश नहीं समझ पा रहा कि डील को लेकर आख़िर आपका एतराज़ क्या है। वहमपंथी-बेटा, जो बात देश नहीं समझ पा रहा, वो तुम्हारे भेजे में क्या बैठेगी। ‘फिर भी कुछ तो बताएं।‘ वहमपंथी-संघी हो क्या? एक बार में समझ नहीं आती। ‘मतलब आप डील पर बात नहीं करेंगे।‘ वहमपंथी-बिल्कुल नहीं। ‘तो फिर ऐसा क्या पूछूं आपसे, जिस पढ़ने में लोग इंटरेस्टेड हों।‘ वहमपंथी- हल्की-फुल्की बात तो हो ही सकती है।

‘अच्छा तो ये बताएं आख़िरी फिल्म कौन-सी देखी आपने।‘ वहमपंथी-चीनी कम। ‘अरे वाह! वो तो काफी बोल्ड सब्जेक्ट पर थी। वहमपंथी-बोल्ड-इटैलिक को गोली मारो, मुझे तो लगा शायद किसी ने चीन के खिलाफ साज़िश की है। चीनी कम है, हमला करो।

‘चलिए, चीनी को छोड़ते हैं। खाने की बात करते हैं। बंगाली फूड के अलावा ज़्यादा क्या पसंद है। वहमपंथी-चाइनीज़! ‘मगर चाइनीज़ का टेस्ट आपने कैसे डिवेलप किया।‘ वहमपंथी- वो मेरी डिवेलपमंट के साथ ही डिवेलप हुआ है। ‘मतलब, मामला स्वाद से ज्यादा संस्कारों का है।‘ वहमपंथी-जी, बिल्कुल।

‘आप बंगाली हैं, फुटबॉल में तो आपकी दिलचस्पी होगी, यूरो देखा?’ देखिए, पश्चिम की तरफ ताकने की आदत हमारी नहीं है। वो तो बीजेपी और कांग्रेस का चरित्र है। ‘फिर भी किसी खेल में तो दिलचस्पी होगी।‘ वहमपंथी- हां, एक इवेंट का मुझे बेसब्री से इंतज़ार है। ‘वो कौन-सा?’ बीजिंग ओलम्पिक!

‘और एक आख़िरी सवाल, घूमने-फिरने का शौक तो होगा, कोई फेवरेट टूरिस्ट प्लेस।‘ वहमपंथी-ऐसी तो एक ही जगह है। ‘वो कौनसी।‘ वहमपंथी- द ग्रेट वॉल ऑफ चाइना। ‘मतलब चीन की महान दीवार।‘ दरअसल वहीं से हमें प्रेरणा मिलती है कि जहां कहीं से चीन को ख़तरा हो वहां दीवार खड़ी कर दो।

सोमवार, 30 जून 2008

लफ़्ज़-ए-मोहब्बत

मुस्कुराहट

अदाएं
मुस्कुराहटें
तो वो हर्फ़ हैं
जिनके सिलसिले
मोहब्बत लफ़्ज़
लिखते हैं

तुम बताओ
अदाओं
मुस्कुराहटों के
इस सिलसिले में
बातों
मुलाकातों
के हर्फ़
कब जुड़ेंगे

कब हम
इश्क की इबारत लिखेंगे
प्यार के झूठे-सच्चे वादे करेंगे
छिपते-छिपाएंगे
आंसू बहाएंगे

बताओ अजनबी
कब तक सिर्फ़
मुस्कुराओगी!


दिलचस्पियां

मेरी दिलचस्पियों को समझाओ
वो नाउम्मीद हो जाएं
क्यों कर वो सोचें
बात का
मुलाकात का
इक लम्स (स्पर्श) के एहसास का!


शुक्रिया

न जाने किसे ढूंढती वो चांदनी
तुम्हारी आखों में आई
और ठहर गई,

किस शबनम को तलाश्ता गुलाब
इन होठों से छूआ
और कुर्बान हुआ,


किस फिज़ा ने क़ाइनात
की कूची से रंग चुराये
और इन अदाओं
में घोल डाले,


अहसान फ़रामोश तुम सही,
मगर मैं तो नहीं,

तलाशता हूं
उस चांदनी
उस गुलाब और
उस फिज़ा को
शुक्रिया कहने!

हिंदी लेखकों से सबक लें! (हास्य-व्यंग्य)

मौसमी बीमारियों की तरह इस देश में बहुत से मौसमी रोने भी हैं। मसलन, हर साल आने वाली बाढ़ के बाद डिज़ास्टर मैनेजमेंट की बात की जाये, हर आतंकी हमले के बाद सुरक्षा एजेंसियों पर जानकारी न होने का इल्ज़ाम लगे, हर विदेशी दौरे में हार के बाद देश में तेज़ पिचें बनाने की ज़रूरत महसूस की जाये और हर रेल हादसे के बाद रेलों की जर्जर व्यवस्था के आधुनिकीकरण की मांग उठे।


मतलब जब कुछ किया जाना चाहिये तब सोए रहें और हादसा हो जाने पर छाती पीटें कि हाय! हमने ये कर लिया होता तो कितना अच्छा होता।

अब सवाल ये है कि किसी भी मसले को लेकर हम प्रो-एक्टिव क्यों नहीं रहते ? आखिर लकीर पिटने को हमने अपना राष्ट्रीय चरित्र क्यों बना लिया है ?

दोस्तों, मुझे लगता है इस मामले में हमें हिंदी लेखकों और उनमें भी व्यंग्यकारों से सबक लेना चाहिये। इस देश का हिंदी व्यंग्यकार जितना प्रो-एक्टिव है उतना अगर सरकार और बाकी संस्थाएं भी हो जाएं तो सारी समस्या हल हो जाये। मैं ऐसे-ऐसे लेखकों को जानता हूं जो मॉनसून आते ही डेंगू पर व्यंग्य लिख लेते हैं और कुछ अतिउत्साहित तो भेज भी देते हैं और फिर फोन कर संपादक को समझाते फिरते हैं कि किस तरह आप इसका इस्तेमाल सितम्बर महीने के तीसरे हफ्ते में कर सकते हैं। क्या हुआ जो अभी जुलाई ही शुरु हुआ है।

अभी कल एक सम्पादक ऐसे एक इक्तीस मार खां लेखक के बारे में बता रहे थे जिसने परमाणु डील पर लेफ्ट के समर्थन को लेकर उन्हें दो लेख भेज दिए और अलग से लिख भी दिया कि अगर लेफ्ट समर्थन वापिस ले और सरकार गिर जाए तो ये वाला लेख छाप सकते हैं और अगर समाजवादी पार्टी के समर्थन से बच जाए तो ये वाला । मैंने पूछा लेकिन इसमें क्या दिक्कत है। संपादक बोले दिक्कत......दिक्कत ये है कि लेख भले ही कितना घटिया हो, लेखक तो मानकर चलता है कि दोनो ही छपने लायक हैं!

ये तो हुई बात सम्पादक की। फिर मैं एक ऐसे ही एक इक्तीस मार खॉ प्रो-एक्टिव लेखक से मिला। मैंने उनके इस नज़रिये की वजह पूछी तो बोले डियर, आज के दौर में सब कुछ इंस्टेंट कॉफी की तरह है। अब सरकार इंस्टेंट कार्रवाई करे न करे, एक लेखक के लिए ज़रूरी है कि वो इंस्टेंट रिएक्शन के लिए तैयार रहे। आपको हमेशा एंटीसिपेट करते रहना पड़ता है कि क्या हो सकता है ? लेखक की इस सोच से मैं काफी प्रभावित हुआ। मैंने कहा अच्छा सर, अब जाने से पहले ये भी बता दीजिये हाल- फिलहाल आपने क्या लिखा है? हाल-फिलहाल तो मैंने एशिया कप के फाइनल में भारतीय टीम की हार पर लिखा है.....फिर थोड़ा रूककर बोले हैरान मत हो....जीत पर भी लिखा है।

गुरुवार, 26 जून 2008

ठाकरे ले लो, सरबजीत दे दो! (हास्य-व्यंग्य)

तमाम कोशिशों के बावजूद सरबजीत की रिहाई होते न देख भारत ने मुशर्रफ को दिल्ली आने का न्यौता दिया। भारतीय अधिकारी-मुशर्रफ साहब रिहाई को लेकर हम पर लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है, अब तो कोई रास्ता निकालना ही होगा। मुशर्रफ-देखिए, दबाव तो मुझ पर भी कम नहीं है। वैसे भी आगरा वार्ता के बाद खाली हाथ लौट, एक बार मैं अपनी फजीहत करवा चुका हूं। भा.अधि-मतलब? मुशर्रफ-मतलब साफ है। सरबजीत के बदले आप अपना सबसे काबिल, चर्चित और होशियार आदमी हमें दे दें। भा.अधि-तो आप सौदेबाज़ी करना चाहते हैं......... ठीक है अगर ऐसी ज़िद्द है तो आप सरबजीत हमें सौंप दें और उसके बदले.......मुशर्रफ-उसके बदले क्या? भा.अधि-उसके बदले राज ठाकरे ले जाइये। मुशर्रफ चिल्लाते हुए खड़े हो जाते हैं-लाहौल विलाकुव्वत, इस वाहियात बात के लिए आपने हमें दिल्ली बुलाया है, अब हम यहां एक पल भी नहीं रूक सकते, टेम्पो बुलाओ।
भारतीय अधिकारी-आप बैठिये तो सही। अगर राज मंजूर नहीं तो हम और ऑप्शन दे सकते हैं। हमारे यहां 'नगीनों' की कमी नहीं है। ऐसा करें आप सरबजीत दे दें, और राखी सावंत ले लें।

मुशर्रफ-देखिए, मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आप समझौता करना चाह रहे हैं या ज़्यादती? राज ठाकरे या राखी सावंत लेने से अच्छा है आप हमें शक्ति कपूर दे दें। भारतीय अधिकारी-सीरियसली! मुशर्रफ-आप मज़ाक भी नहीं समझते। आपकी तरह हमारे यहां भी सर्कस का धंधा चौपट हो चुका है, चिड़ियाघरों पर ताले लगे हैं, ऐसे में आप ही बताएं, भला क्या करेंगे हम शक्ति कपूर का?
मुशर्रफ(थोड़ा रुककर)- देखिए, इंडियन म्यूज़िक की पाकिस्तान में बड़ी धूम है, उसकी कोई हस्ती हमें ऑफर करें, लता मंगेशकर या सोनू निगम..... उनके बारे में सोचिए। भा.अ.-देखिए, उन्हें तो हम आपके बदले भी नहीं देंगे। आपको अच्छी आवाज़ से मतलब है न, ऐसा करें आप हिमेश रेशमिया ले लें। मुशर्रफ-देखिए, हमें नगमे सुनने हैं, मस्जिदों से कौए नहीं उड़वाने। चलिए, आप हमें अमिताभ बच्चन दे दीजिए। भा.अ-मुशर्रफ साहब, अमिताभ को दे भी दिया तो आप लेंगे नहीं। मुशर्रफ-वो क्यों?

भा.अ- वो इसलिए क्योंकि उनके साथ अमरसिंह फ्री है। मुशर्रफ-तौबा, तौबा, तौबा....खैर छोड़ें....ये बताएं हिंदुस्तानी क्रिकेट टीम आजकल काफी अच्छा खेल रही है, ..सचिन, सौरव या द्रविड़ में से कोई मिल जाए तो...भा.अ-जिन खिलाड़ियों के आप नाम ले रहे हैं ये सब तो एक-आध साल में रिटायर हो जाएंगे, मेरी मानें आप आशीष नेहरा ले लें, उसके साथ कॉम्बो ऑफर में मुनाफ पटेल भी ले सकते हैं....आप भी क्या याद रखेंगे चलिए बालाजी भी दिया।
मुशर्रफः(जो अब तक आपा खो चुके थे) मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आप खिलाड़ियों के नाम गिना रहे हैं या मरीज़ों के। इन खिलाड़ियों के साथ तो आपको एक डॉक्टर भी देना पड़ेगा। भा.अ.-हां दे देंगे न, आप भारत के सबसे मशहूर डॉक्टर को ले लीजिए। मुशर्रफ-कौन, डॉक्टर त्रेहन? भारतीय अधिकारी-नहीं, डॉक्टर तलवार!

मंगलवार, 24 जून 2008

सड़क पर लोकतंत्र! (व्यंग्य)

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में आम शिकायत है कि कहीं भी लोकतंत्र नहीं है। हर जगह ताकतवर और भ्रष्ट लोग भरे हैं। बात ठीक है। मगर मेरा मानना है कि इस देश में एक जगह ऐसी है जहां पूरी तरह लोकतंत्र है और वो है सड़क!

सड़क में जिस जगह मैं रूका हूं वहां मर्सिडीज़ के बगल में एक मोटरसाइकिल वाला, उसके बगल में साइकिल सवार, बीच में एक बैलगाड़ी, कुछ हाथ रिक्शा और आगे नगर निगम का कचरा ढोने वाला एक ऐसा ट्रक खड़ा है, जिसे देख लगता है कि उसका इस्तेमाल द्वितिय विश्व युद्ध के वक़्त से किया जा रहा है! बहरहाल, आसपास खड़े हम तमाम लोगों के लिए ये कुछ मीटर का दायरा इस मुल्क में इकलौता मंच है जिसे हम एक साथ शेयर कर पा रहे हैं!

ये मंच एक मायने में लोकतंत्र ही नहीं, खुला लोकतंत्र है, क्योंकि ये किसी भी तरह के लेन के बंधन से मुक्त है। आप जहां चाहे गाड़ी चला सकते हैं, जहां चाहे गाड़ी घुसा सकते हैं, और जहां चाहे गाड़ी चढ़ा भी सकते हैं! इसके अलावा जितनी फ्रस्टेशन हो, वो आप सड़क पर निकाल लें। मसलन, आप मोटरसाइकिल पर हैं और सोच रहे हैं कि स्साला, इतनी जगह अप्लाई कर दिया आज तक कहीं से कोई कॉल नहीं आया, ये कम्पनी वाले पता नहीं खुद को क्या सोचते हैं ? तभी आप देखते हैं सामने एक लम्बी काली गाड़ी चल रही है, अब सोचिये हो न हो उन्हीं कम्पनियों में से किसी एक का सीईओ इस गाड़ी में सवार है। अब उस गाड़ी के आगे से एक गंदा कट मारिये, फिर उस कार के आगे आ जाइये और उसे काफी देर तक साइड मत दीजिये। वो भले ही कितने हॉर्न दे, मगर नीचा दिखाने के इस मिशन से आपको पीछे नहीं हटना है। हो सकता है इस दौरान ये सोच शर्म भी आये कि ये सब करने के लिए तो भगवान ने मुझे धरती पर नहीं भेजा, मगर शर्मिंदा न हों। साहित्य की ज़बान में इसे भावानात्मक विस्फोट कहते हैं, और ऐसा कर आप कविता रच रहे हैं। लिहाज़ा, छंद पर यानि हैंडल पर ध्यान दें!

इसके अलावा आपको ये शिकायत भी रही है कि भ्रष्टाचार को लेकर हमारा लोकतंत्र समान अवसर नहीं देता। मगर, सड़क का लोकतंत्र ये शिकायत भी दूर करता है। सामने रेड लाइट है। चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस वाला भी नहीं। आप बिना सोचे समझे रेड लाइट तोड़ दें। अवसर के मामले में रेड लाइट तोड़ने के भ्रष्टाचार पर जितना हक़ एक कार वाले का है, उतना ही आपका भी।

कुल मिलाकर सड़क लोकतंत्र की इस हद तक सच्ची नुमाइंदगी करती है कि लोकतंत्र को चलाने वाले नेताओं ने आम आदमी को सड़क पर ला दिया है, और वो भी सिर्फ इसलिए ताकि वो उस लोकतंत्र का सही मज़ा ले पाए।