सोमवार, 7 जुलाई 2008

चीनी ग़म है!

इन दिनों दो लोग ख़ासी चर्चा में हैं। डॉक्टर मनमोहन और कम्पांउडर कृष्णा। मगर दोनों के इधर जिन पर सब की निगाहें हैं वो हैं वहम के मरीज़, वहमपंथी। पांचवी पास से तेज़ भी नहीं समझ पा रहा है कि परमाणु डील पर उनका एतराज़ क्या है। वहमपंथी लगातार कह रहे हैं कि डील देशहित में नहीं है। मगर ये नहीं बता रहे, किस देश के हित में? भारत या चीन? जानकारों को वहमपंथियों की मंशा पर श़क है। लिहाज़ा वो सलाह दे रहे हैं कि उनका लाई डिटेक्टर टेस्ट करवाया जाए। वहीं कुछ अति-उत्साहित ब्रेन मैपिंग की बात भी कर रहे हैं। कुल मिलाकर देश नहीं जान पा रहा कि डील पर एतराज़ की असली वजह वहमपंथियों की स्वाभाविक राष्ट्रीय चिंता है, अनुवांशिक अमेरिकी एलर्जी या फिर पैदाइशी चीन प्रेम। ख़ैर, इस मामले पर मैंने एक वरिष्ठ वहमपंथी से बात की। पेश हैं उसके कुछ अंश।

मैं-सर, देश नहीं समझ पा रहा कि डील को लेकर आख़िर आपका एतराज़ क्या है। वहमपंथी-बेटा, जो बात देश नहीं समझ पा रहा, वो तुम्हारे भेजे में क्या बैठेगी। ‘फिर भी कुछ तो बताएं।‘ वहमपंथी-संघी हो क्या? एक बार में समझ नहीं आती। ‘मतलब आप डील पर बात नहीं करेंगे।‘ वहमपंथी-बिल्कुल नहीं। ‘तो फिर ऐसा क्या पूछूं आपसे, जिस पढ़ने में लोग इंटरेस्टेड हों।‘ वहमपंथी- हल्की-फुल्की बात तो हो ही सकती है।

‘अच्छा तो ये बताएं आख़िरी फिल्म कौन-सी देखी आपने।‘ वहमपंथी-चीनी कम। ‘अरे वाह! वो तो काफी बोल्ड सब्जेक्ट पर थी। वहमपंथी-बोल्ड-इटैलिक को गोली मारो, मुझे तो लगा शायद किसी ने चीन के खिलाफ साज़िश की है। चीनी कम है, हमला करो।

‘चलिए, चीनी को छोड़ते हैं। खाने की बात करते हैं। बंगाली फूड के अलावा ज़्यादा क्या पसंद है। वहमपंथी-चाइनीज़! ‘मगर चाइनीज़ का टेस्ट आपने कैसे डिवेलप किया।‘ वहमपंथी- वो मेरी डिवेलपमंट के साथ ही डिवेलप हुआ है। ‘मतलब, मामला स्वाद से ज्यादा संस्कारों का है।‘ वहमपंथी-जी, बिल्कुल।

‘आप बंगाली हैं, फुटबॉल में तो आपकी दिलचस्पी होगी, यूरो देखा?’ देखिए, पश्चिम की तरफ ताकने की आदत हमारी नहीं है। वो तो बीजेपी और कांग्रेस का चरित्र है। ‘फिर भी किसी खेल में तो दिलचस्पी होगी।‘ वहमपंथी- हां, एक इवेंट का मुझे बेसब्री से इंतज़ार है। ‘वो कौन-सा?’ बीजिंग ओलम्पिक!

‘और एक आख़िरी सवाल, घूमने-फिरने का शौक तो होगा, कोई फेवरेट टूरिस्ट प्लेस।‘ वहमपंथी-ऐसी तो एक ही जगह है। ‘वो कौनसी।‘ वहमपंथी- द ग्रेट वॉल ऑफ चाइना। ‘मतलब चीन की महान दीवार।‘ दरअसल वहीं से हमें प्रेरणा मिलती है कि जहां कहीं से चीन को ख़तरा हो वहां दीवार खड़ी कर दो।

6 टिप्‍पणियां:

Ghost Buster ने कहा…

बहुत ही बढ़िया. वहम का कोई इलाज नहीं, वहमपंथियों का है क्या? शायद अगला इलेक्शन.

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन और सटीक!! ज्ञान जी से सहमत!

सुजाता ने कहा…

सही लिखा , सधा -कसा शीर्षक है। आइडियॉलजी के लिए किसी और की समझ के आसरे रहना और अन्धभक्ति करने से ही वाम और वहम का फर्क मिट जाता है ।

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

बहुत शानदार! वहम पंथ में कहीं कोई काँटा नहीं है. काँटा रहे भी तो केवल वहम ही तो होना है कि 'ये काँटा नहीं, बल्कि फूल है.'

नीरज, कमाल का लिख रहे हैं आप.

Mired Mirage ने कहा…

बहुत बढ़िया। थोड़े से शब्दों में आप बहुत कुछ कह गए।
घुघूती बासूती

अभिषेक ओझा ने कहा…

हा हा ! वहमपंथी और चीनी कम खूब जामे !