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सोमवार, 19 जुलाई 2010

भारत का विदेशी मूल!

कम्पनियों के नतीजे भी अच्छे आ रहे हैं, नौकरियां भी बढ़ी हैं, औद्योगिक विकास दर में भी इज़ाफा हो रहा है, मानसून भी ठीक रहने की उम्मीद है और बाकी तमाम चीज़ें जिन्हें ‘स्थानीय कारण’ माना जाता है, ठीक हैं, बावजूद इसके शेयर बाज़ार ऊपर नहीं जा रहा। जानकार बताते हैं कि जब तक यूरोप में हालात नहीं सुधरते तब तक हमारे यहां भी स्थिति डांवाडोल रहेगी। ग्रीस की अर्थव्यवस्था को जब तक आर्थिक मदद की थोड़ी और ग्रीस नहीं लगाई जाती, भारत में भी हालात सुधरने वाले नहीं है।

ये सब देख-सुन मैं सदमे में चला जाता हूं। देश की इस बेचारगी पर मुझे तरस आता है। हमारे किसी भी अच्छे या बुरे के पीछे कारण के रूप में हम ही पर्याप्त क्यों नहीं है? हर क्षेत्र में एक विदेशी हाथ या वजह का होना क्या ज़रूरी है। कहने को सरकार में एक विदेश मंत्रालय है और एक विदेश मंत्री भी। मगर विदेश नीति क्या होगी ये अमेरिका तय करेगा। साल में कितनी अच्छी फिल्में बनेंगी, ये इस बात पर निर्भर करता है कि नकल किए जा सकने लायक हॉलीवुड में कितनी नई फिल्में बनती हैं। हर खेल में सुधार का एक मात्र मूलमंत्र है-विदेशी कोच की तैनाती।


फैशन से भाषा तक हर शह विदेशी हो गई है। दारू के अलावा इस देश में देसी के नाम पर कुछ नहीं बचा है। देसी कट्टों से लेकर देसी बम तक सब आउटडेटिड हो गए हैं। टोंड दूध के ज़माने में आम आदमी को तो देसी घी तक मयस्सर नहीं है। देश को लूटने वाले नेता भी अपना पैसा विदेशी बैंकों में जमा करवाते हैं। अतीत के अलावा भारत पास कुछ भी भारतीय नहीं बचा है। कुछ लोगों को जैसे ये नहीं समझ आता कि ज़िंदगी का क्या किया जाए, भारत शायद दुनिया का इकलौता देश है जो साठ साल में ये नहीं जान पाया कि आज़ादी का क्या किया जाए!

शुक्रवार, 18 जून 2010

हारा हुआ चिंतन! (व्यंग्य)

औसत भारतीय ज़िंदगी में किस्मत, वक़्त और ईश्वर को कभी नहीं भूलता। किस्मत में हो तो अच्छी नौकरी मिल जाती है, वक़्त आने पर लड़की के लिए अच्छा रिश्ता मिल जाता है और ईश्वर चाहे तो इंसान का ‘नाम’ भी हो जाता है। अब ऐसे समाज में जब लोग इंसाफ की, कानून की बात करते हैं तो लगता है कि संस्कारों से बगावत हो रही है। मेरा मानना है कि दर्शन जब ज़िंदगी के हर पड़ाव पर सहारा बनता है तो फिर न्याय में भी बनता होगा। लिहाज़ा, जब लोग बात करते हैं कि हज़ारों लोगों की मौत के ज़िम्मेदार एंडरसन को भगा कर, उनके साथ अन्याय किया गया तो मुझे कोफ्त होती है। जब संसार में एक पत्ता भी ईश्वर की मर्ज़ी के बिना नहीं खड़कता तो ऐसे में एक शख्स की लापरवाही से हज़ारों लोगों की जान कैसे जा सकती है! लोग मरे... क्योंकि यही ईश्वर की मर्ज़ी थी और एंडरसन फरार हुआ क्योंकि उसमें ईश्वर की सहमति थी। अब ये कहना कि इसके लिए अर्जुन सिंह या राजीव गांधी दोषी हैं, सरासर ग़लत है।

दोषियों का क्या होगा...क्या नहीं होगा...इसकी चिंता हमें छोड़ देनी चाहिए। जब इंसान को उसके कर्मों का फल मिलना तय है और वो फल ईश्वर ने ही देना है और अर्जुन सिंह एंड कंपनी ने जो किया वो ईश्वर की मर्जी़ से ही किया तो फिर क्यों उन्हें बद्दुआएं दे हम अपना वक़्त बरबाद करें? ये लोग तो ईश्वरीय मर्ज़ी की पूर्ति के लिए माध्यम भर थे! जिसने जीवन दिया अगर उसी ने वापिस ले भी लिया तो क्या हर्ज़ है। क्या तुम्हारा था जो छिन गया।

उम्मीद को मरने वाली मैं दुनिया की आख़िरी चीज़ मान भी लूं तो भी इस बात की गुंजाइश बेहद कम है कि भगवान भी आत्मचिंतन करता होगा। ग़लती का एहसास होने पर वो भी प्रायश्चित करता होगा...और अगर आत्मचिंतन ईश्वर के भी संस्कार का हिस्सा है तो यकीन मानिए वॉरन एंडरसन अगले जन्म में एक गरीब के रूप में भारत में ही जन्म लेगा! उसके लिए सज़ा की इससे बड़ी बद्दुआ और क्या हो सकती है!

शुक्रवार, 21 मई 2010

लोकतंत्र की ख़ातिर!

देश में अगर बहुत-सी बुरी चीज़ें हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि हम कुछ अच्छी चीज़ें न होने दें और अगर कुछ अच्छी चीज़ें हो रही हैं तो ये भी ज़रूरी नहीं कि बुरा होना रूक जाए। अच्छाई-बुराई के इस सह-अस्तित्व को भारत से अच्छा और किसी ने नहीं समझा। दिल्ली में वर्ल्ड क्लास मैट्रो है ये अच्छी बात है, हम चाहते हैं कि हमारे यहां बुलेट ट्रेन चले, ये भी अच्छा है। मगर देश की राजधानी में गाडी पकड़ने में मची भगदड़ में अगर दो-चार लोग मारें जाएं तो इसमें भी कोई बुराई नहीं है। इंडिया होने के चक्कर में भारत अपनी पहचान नहीं गंवा सकता है।

भले ही आज तक हम ड्रेनेज लाइन और पीने के पानी की पाइप लाइन को मैनेज न कर पाएं हो, मगर हिंदुस्तान से ईरान के बीच गैस पाइप लाइन बिछाने की तो सोच ही सकते हैं। हमारे खिलाड़ी भले ही राष्ट्रीय कैंपों में अपने बर्तन तक खुद धोएं मगर राष्ट्रमंडल खेलों के खिलाड़ियों को विश्वस्तरीय सुविधाएं देने के प्रति तो हम वचनबद्ध हैं हीं। तो क्या हुआ जो हमने आज तक पब्लिक टॉयलेट्स को साफ रखना नहीं सीखा, मगर कार्बन उत्सर्जन में कटौती का वादा कर हमने ग्लोबल वॉर्मिंग के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी तो निभा ही दी है। हमारा पब्लिक ट्रांसपोर्ट भले ही कितना घटिया हो मगर ताज़ा ऑटो सेल नतीजे बताते हैं कि गाड़ियों की बिक्री में हमने सबको पीछे छोड़ दिया है। गरीब बढ़े हैं तो क्या फोर्ब्स की सूची में भारतीय अरबपति भी तो बढ़े हैं। और ये विरोधाभास यूं ही नहीं है। खाते-कमाते लोग तो वोट देते नहीं। रही बात साफ पानी और बढ़िया पब्लिक ट्रांसपोर्ट की तो जो स्टेशनों में मची भगदड़ में मारे जाते हैं उन्हीं से साफ पानी और पब्लिक ट्रांसपोर्ट के नाम पर वोट मांगा जा सकता है। लोकतंत्र बचा रहे उसके लिए ज़रूरी है कि थोड़ी बहुत अव्यवस्था भी बची रहे।

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

महंगाई के रास्ते मोक्ष! (व्यंग्य)

सरकारों को लेकर हमारी नाराज़गी हमेशा बनी रहती है। महंगाई से लेकर भ्रष्टाचार तक हर चीज़ के लिए हम उसे ज़िम्मेदार मानते हैं। हर पार्टी हमें अपनी दुश्मन लगती है। अपनी हर तकलीफ का श्रेय हम उसे देते हैं। मगर ये सब कहतें वक़्त हम शायद ये भूल जाते हैं कि सरकार जो कुछ करती है, हमारी बेहतरी के लिए करती हैं। हर संभव तरीके से हमारा जीना हराम कर दरअसल वो इस जीवन से ही हमारा मोहभंग करवाना चाहती है!

नाम न छापने की शर्त पर एक नेता ने कहा भी कि दरअसल हम चाहते हैं कि आम आदमी जीवन की व्यर्थता को समझे। इसलिए अपने स्तर पर हमसे जो बन पड़ता है, हम करते हैं। भले ही वो सब्ज़ियों से लेकर रसोई गैस के दाम बढ़ाने हों या फिर पानी-बिजली की कटौती हो। हमारी कोशिश रहती है कि आम आदमी का वो हाल करें कि उसे अपने पैदा होने पर अफसोस हो और जिस पल उसके अंदर ये भाव जागृत उसी क्षण उसे मोक्ष का ख्याल आएगा। जन्म-मरन के झंझट से मुक्ति का, मोक्ष ही उसका एक रास्ता दिखेगा। वो सद्कर्मों की तरफ मुड़ेगा, ईश्वर में उसकी आस्था गहरी होगी।

मैंने बीच में टोका, नेताजी आप कैसी बात करते हैं, समाजशास्त्र का नियम है कि समस्या बढेंगी तो समाज में अपराध भी बढ़ेगा। फिर आप कैसे कह सकते हैं कि भूखा और बेरोज़गार इंसान ईश्वर की तलाश में घर से निकलेगा। भूखे पेट तो आदमी शर्ट के बटन नहीं बंद कर सकता वो भला मोक्ष की क्या सोचेगा? नेताजी- तो तुम्हें क्या लगता है हम यहीं उसका जीवन स्वर्ग कर, उसे धर्म के रास्ते से हटा दें। मोक्ष की तलाश तो आम आदमी को करनी ही होगी...यही उसके लिए बेहतर है मगर इससे पहले उसे जीवन से मुक्ति कैसे मिले, उसका इंतज़ाम हम कर देंगे!

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

भारतीय होने की सुविधा!

टाइगर वुड्स के माफ़ीनामे के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों में ‘सच के सामने घुटने टेकने’ की कमज़ोरी एक बार फिर उजागर हुई है। समाजशास्त्रियों को ज़रूर विचार करना चाहिए कि आखिर क्यों ये लोग वे सब बातें सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लेते हैं, जो हम बंद कमरे में खुद के सामने भी स्वीकार नहीं कर पाते। ऐशो-आराम और तमाम व्यसनों का आख़िर मतलब क्या है, जब उनके इस्तेमाल पर इतना हंगामा होना है? इतना नाम-दाम क्या आदमी इसलिए कमाता है कि सिर्फ वो काम करे, जिसके बूते उसे ये सब मिला है। कतई नहीं!

ये समझना बहुत ज़रूरी है कि किसी भी सफल पुरूष के लिए अपनी प्रतिभा के दम पर किया गया सबसे बड़ा हासिल ‘औरत’ है! भले ही उसे रिझाना हो या किसी भी तरह पाना हो। आपने जो किया उस पर दोस्तों ने तारीफ कर दी, पैसा भी मिल गया, सम्मान भी ले लिए...अब? और जैसा कि खुद वुड्स ने अपने माफीनामे में कहा कि उन्हें लगता था कि जो सब उन्होंने हासिल किया उसके लिए उन्होंने काफी मेहनत की है, इसलिए उन्हें पूरा हक़ है अपनी ‘टेम्पटेशन्स’ को पाने का! और यहीं अमेरिका का दोगलापन साफ हो जाता है। आप उन ‘टेम्पटेशन्स’ की सुविधा तो देते हैं, जैसा कि वुड्स को दी, मगर पकड़े जाने पर ज़लील भी करते हैं। यहीं भारत पूरे अमेरिकी और यूरोपीय समाज पर लीड करता है। बात चाहे मीडिया की हो या फिर उन लोगों की जो ऐसे मामलों में शामिल होते हैं, कभी सेलिब्रिटी को शर्मिंदा नहीं होने देते!

इक्के-दुक्के मामलों को छोड़कर कभी किसी ने नहीं कहा कि फलां से मेरे नाजायज़ सम्बन्ध हैं। ये जानते हुए की फलां शादीशुदा है, सम्बन्ध तो बनाए जा सकते हैं, मगर इतना नहीं गिरा जा सकता कि दुनिया को बता दें। ऐसा नहीं है कि इतना गिरने पर कोई सरकारी रोक है मगर चरित्रहीनता, दुस्साहस मांगती है और वो किसी भी समाज में आते-आते ही आता है। पर्दा हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा है इसलिए तमाम कुकर्म भी भी यहां पर्दे के पीछे ही रह जाते हैं। लिहाज़ा, ऐसे मामलों से कभी घूंघट नहीं उठता!

रही बात मीडिया की, तो वो अपने व्यावसायिक हितों के चलते ऐसा कोई रिस्क नहीं लेता। कालांतर में ये साबित भी हो चुका है कि कैसी भी सनसनी की तलाश में रहने वाले चैनल, राजनीतिक दबाव के चलते हाथ में सीडी होने के बावजूद उसे नहीं चलाते। चैनल चालू रहे इसलिए कभी-कभी किसी के चालू होने को नज़रअंदाज़ भी किया जा सकता है!

वैसे भी आइकॉन्स को हमारे यहां ईश्वर का दर्जा हासिल है, इसलिए उनसे जुड़ी ऐसी कोई बात हम सार्वजिनक करने से परहेज़ करते हैं, जिससे ईश्वर को शर्मिंदा होना पड़े। लिहाज़ा, ऐसे माहौल में सेलिब्रिटी को कभी पकड़े जाने का डर नहीं रहता। और यही एक प्रतिभाशाली व्यक्ति के साथ सही सलूक भी है। ऐसी शोहरत का आख़िर फायदा ही क्या जो आदमी को इतना ‘स्पेस’ भी न दे! तभी तो चाहे शेन वॉर्न हों, बिल क्लिंटन हों या टाइगर वुड्स, सभी के लिए मुझे बहुत बुरा लगा। वक़्त आ गया है कि योग के बाद पश्चिम अब सेलिब्रिटी आरक्षित भारत के इस ‘भोग’ को भी समझे।

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

री-लॉन्चिंग की आउटसोर्सिंग!

वैसे तो यह ट्रेंड गाड़ियों में ज़्यादा देखने को मिलता है। किसी कम्पनी ने कोई मॉडल लॉन्च किया। उसकी खूबियों को लेकर बड़े-बड़े दावे किए, मगर जब गाड़ी बाज़ार में उतरी तो उसे वैसा रिस्पॉन्स नहीं मिला। जानकारों ने ख़ामियां बताईं और वो मॉडल वैसा परफॉर्म नहीं कर पाया जैसी उम्मीद थी। लिहाज़ा, कम्पनी तय करती है कि गाड़ी को री-लॉन्च किया जाए। कुछ नए फीचर्स के साथ। पुरानी ख़ामियों को दूर करते हुए।
ठीक इसी तर्ज़ पर अब वक़्त आ गया है कि हम भारत को भी री लॉन्च करें। भारत का नया इम्प्रूव्ड वर्ज़न लाएं, जिसमें पुरानी कमियां न हो, ताकि भारत नामक 'महान् विचार' में लोगों की आस्था फिर से लौटाई जा सके।
जब मैंने अपना ये विचार एक मित्र को बताया तो उनका कहना था कि इसमें कई तकनीकी ख़ामियां हैं। पहली तो ये कि भारत को लेकर दुनिया को जो-जो समस्याएं हैं जैसे, इसका माइलेज, इंजन, सीट-कवर, हैडलाइट, पिकअप अगर सभी सुधार दी गईं तो इस नए मॉडल में ढूंढने पर भी भारत नहीं मिलेगा। तब दुनिया को पता कैसे चलेगा कि ये भारत का ही नया वर्ज़न है या फिर किसी देश ने हाल ही में स्वायत्तता हासिल की है। दूसरा, जब कोई ब्रांड एक बार बदनाम हो जाता है तो उसे फिर से उसी नाम से लॉन्च करने में दिक़्कत आती है। इसके अलावा इन ख़ामियों को दूर करेगा कौन? हम जब इतने सालों में इस देश को नहीं सुधार पाए तो री-लॉन्चिंग के बाद क्या उखाड़ लेंगे।
मैंने कहा, वो कोई इश्यू नहीं है। हम री-लॉन्चिंग का काम आउटसोर्स कर सकते हैं। हम जिस क्षेत्र में जिस भी देश पर निर्भर हैं, उसमें सुधार का काम पूरी तरह से उसी देश को सौंप सकते हैं। भारतीयों को नौकरी कैसे मिले, ये काम हम अमेरिका और ब्रिटेन को आउटसोर्स कर सकते हैं। सुरक्षा को लेकर हमें चीन से सबसे ज़्यादा ख़तरा है लिहाज़ा सुरक्षा का ठेका हम चीन को दे सकते हैं। शिक्षा और खेलों की दशा-दिशा सुधारने के लिए ऑस्ट्रेलिया से कॉन्ट्रेक्ट कर सकते हैं। मनोरंजन उद्योग के लिए अमेरिका में हॉलीवुड से संधि की जा सकती है। कुछ मामलों में अलग-अलग देशों के लोग मिलकर कमेटी भी बना सकते हैं।
तभी मित्र बोला, मगर तुम भूल रहे हो भारत एक लोकतांत्रिक देश है...ऐसे में सरकार का क्या होगा? मैंने कहा...अगर हमें वाकई सुधरना है तो हमें अपना लोकतंत्र भी आउटसोर्स कर देना चाहिए। वैसे भी हर ओर किफायत की बात हो रही है। विदेशी हमें उतने महंगे तो नहीं पड़ेंगे जितने ये देसी पड़ रहे हैं!

शनिवार, 8 अगस्त 2009

नैतिकता का इस्तीफा!

बूटा सिंह कह रहे हैं कि उन पर इस्तीफे का दबाव डाला गया तो वे जान दे देंगे। वैसे ही, जैसे लड़की के घरवालों से परेशान लड़का धमकी देता है कि अगर किसी ने उन्हें अलग करने की कोशिश की तो वो अपनी जान दे देगा। प्रेमी की जान लड़की में बसती है। बूटा सिंह की जान कुर्सी में। उनका कहना है कि वे ऐसे नैतिकतावादी नहीं हैं कि इस्तीफा दे दें। पर, यही तो आपत्ति है। आख़िर वो ऐसे नैतिकतावादी क्यों नहीं हैं? और अगर वो ऐसे या वैसे, कैसे भी नैतिकतावादी नहीं हैं तो क्यों न बेटा और बूटा पर लगे आरोप सच माने जाएं! लोग तो कहने भी लगे हैं, बेटा-बेटा, बूटा-बूटा हम हाल तुम्हारा जाने हैं, माने न माने तुम ही न माने, संसार तो सारा माने हैं।

अपने बचाव में उनका कहना है कि उनके ख़िलाफ राजनीतिक साज़िश की जा रही है। ये बात भी अपने आप में शोध का विषय है। शोध इस पर नहीं होना चाहिए कि साज़िश किसने की, बल्कि इस पर होना चाहिए ‘मेरे खिलाफ साज़िश का बयान’ भारतीय राजनीति में आज तक कितनी बार दिया गया है। इस वाक्य के विन्यास और अर्थ में आख़िर कौनसी मिश्र धातु लगी है जो इसे हर नेता की पसंदीदा ढाल बनाता है। उस घटना का भी पता लगाना चाहिए जिसके बाद नेताओं की अदृश्य शक्तियों के खिलाफ खानदानी दुश्मनी शुरू हुई। तभी तो हर बार पकड़े जाने पर अदृश्य शक्तियों की चुगली की जाती है। मामला ठेकेदार का था। निपटाना बूटा ने था। दलाली बेटे ने की। गिरफ्तारी सीबीआई ने और इल्ज़ाम लगा अदृश्य शक्तियों पर। सुभानअल्लाह!

अभी लोग इन अदृश्य शक्तियों को ढूंढ ही रहे थे कि वीर भद्र सिंह की वीरता सामने आ गई। वीर भद्र ने भी भद्रता दिखाते हुए अपने कांडों का श्रेय राजनीतिक साजिश को दे दिया। उनके मुताबिक हिमाचल के मुख्यमंत्री धूमल उनकी छवि धूमिल करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि वे महज़ आरोपों के आधार पर इस्तीफा नहीं देंगे। ये सुन मुझे बड़ी तसल्ली हुई।

दरअसल संक्रमण काल से गुज़रने का एहसास सबसे बुरा होता है। इस दौरान बड़ी माथा-पच्ची करनी पड़ती है। हर घटना के पीछे के कारण को समझना होता है। बदलाव की दिशा जाननी होती है। इसलिए जब श्रीधरन और उमर अब्दुल्ला ने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दिया तो भम्र हुआ कि शायद हम संक्रमण काल से गुज़र रहे हैं। ईमानदारी के नए दौर में प्रवेश कर रहे हैं। मगर नहीं...बूटा और वीर भद्र ने इस आशंका को नकार दिया। इस्तीफे से इंकार किया। हमें संक्रमण काल में जाने से बचा लिया। आइए, इसके लिए दोनों का शुक्रिया अदा करें!

शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

राजनीति का मुआवज़ा!

‘संयम’ की आंखें नम हैं। वो दसियों सालों से विस्थापन की मार झेल रहा है। राजनीति की ज़रूरत बता एक बार किसी नेता ने उससे जगह खाली करवाई थी, मगर तब से उसे न मुआवज़ा मिला, न मकान। वो न जाने कब से राजनीति की चौखट पर ‘अंदर आ जाओ’ सुनने की उम्मीद में बैठा है। इस बीच बहुतों ने समझाया कि व्यर्थ का आशावाद मत पालो। तुम ‘आउट ऑफ फैशन’ हो गए हो। मगर वो नहीं मानता। उसे लगता है कि वो तो संस्कारों का हिस्सा है और संस्कार कभी आउट ऑफ फैशन नहीं होते।

‘संयम’ का विश्वास अपनी जगह है मगर मुझे भी लगने लगा है कि संस्कार कहीं ‘आउट ऑफ फैशन’ ही तो नहीं हो गए। ‘संयम’ और ‘शुचिता’ कहीं सत्तर के दशक की बैल बॉटम तो नहीं हो गई जिसका ट्रेंड अब नहीं रहा। फिर सोचता हूं कि शायद ये अलग-अलग सभ्यताओं की एक पैमाने पर तुलना जैसा है। मसलन, निर्वस्त्र रहना सभ्य समाज में बुरा माना जा सकता है मगर कई आदिवासी समाजों में नहीं। और जिस तरह ‘पहनावा’ सभ्यता से जुड़ा है उसी तरह ‘भाषायी संस्कार’ भी। गाली देना सभ्य समाज में बुरा हो सकता है मगर राजनीतिक समाज में नहीं। मतलब तो भावनाओं के इज़हार से है। किसी विद्वान ने कहा भी है कि ‘अभिव्यक्ति’ आपके एहसास की सर्वोत्तम वेशभूषा है। अब ये हमारा दोष है अगर हमें उस वेशभूषा में फटा नज़र आता है, उस पर गंदगी दिखती है। यहां एक का वजूद, दूसरे के विनाश पर टिका है इसलिए भाषा के मर्तबन में मिठास कैसे हो सकती है?

अब कोई इज़राइली आप से शिकायत करे कि आप हिंदी में क्यों बात करते हैं, हिब्रू में क्यों नहीं, तो आप क्या कहेंगे? यही ना कि भाई, हिब्रू तुम्हें आती होगी, हमें नहीं, हम तो हिंदी जानते हैं, उसी में बात करेंगे। इसलिए जब कोई रीता बहुगुणा जोशी किसी मायावती से और कोई मायवती किसी मुलायम सिंह से बात करे तो आप बुरा न मानें कि वो हिब्रू में बात क्यों कर रहे हैं। अरे भाई, राजनीतिक प्रदेश की यही भाषा है।

रही बात इस भाषा के अभद्र होने की तो इस पर मेरी अलग सोच है। विज्ञान कहता है कि आदमी मूलत: जानवर है, मगर वो इंसान होने की कोशिश करता है। ऐसे में अगर आपको नेताओं की हरक़ते और बातें ग़ैर इंसानी लगती हैं तो उसका यही अर्थ है कि इन लोगों ने अपने मूल के प्रति आत्मसमर्पण कर दिया है। पर अफसोस...यही लोग राजनीति के प्रतिनिधि भी हैं, और गुनाहगार भी...आख़िर राजनीति मुआवज़ा मांगे भी तो किससे? उसके लिए तो एक करोड़ भी कम हैं!

शनिवार, 31 जनवरी 2009

आत्महीन का गौरव (व्यंग्य)

गणतंत्र दिवस के मौके पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत को दिए बधाई संदेश में कहा कि अमेरिका भारत का सबसे अच्छा दोस्त है। अमेरिका इज़ इंडियाज़ बेस्ट फ्रेंड! तमाम अख़बारों ने इसे प्रमुखता से जगह दी। ज़्यादातर लोगों ने माना कि ओबामा की ये घोषणा छब्बीस जनवरी पर मिला सबसे शानदार तोहफा है। मगर आप फिर पढ़िए उस स्टेटमेंट को....अमेरिका भारत का सबसे अच्छा दोस्त है। उन्होंने ये कतई नहीं कहा कि अमेरिका का सबसे अच्छा दोस्त भारत है। ओबामा ने तो भारत को बताया है कि उसका सबसे अच्छा दोस्त कौन है!

जहां तक मेरी समझ है चौथी क्लास में पढ़ने वाले बच्चों को भी टीचर खड़ा कर ये पूछती है कि बताओ चिंटू तुम्हारा बेस्ट फ्रेंड कौन है....आठ साल का चिंटू धर्म संकट में पड़ जाता है...मोनू को बताया तो सोनू नाराज़ हो जाएगा...सोनू का नाम लिया तो.....टिंकू बुरा मान जाएगा। फिर भी....अपनी समझ से पोलिटिकली सही जवाब देने की कोशिश करता है। निर्णय लेने की अपनी क्षमता पर गर्व करता है। अब सवाल ये है कि भारत की स्थिति क्या चौथी क्लास में पढ़ने वाले उस आठ साल के चिंटू से भी गई-गुज़री है।

अमेरिका हमसे पूछ नहीं रहा....बता रहा है कि हम तुम्हारे सबसे बढ़िया दोस्त हैं। बावजूद इसके हम गौरवान्वित हैं। इतना फूल गए हैं कि कभी भी फट सकते हैं! स्कूल में पढ़ने वाली सबसे खूबसूरत लड़की अगर ये घोषणा कर दे कि मैं तुम्हारे साथ डेट पर जाऊंगी तो आप निहाल हो जाते हैं। बिना ये सोचे कि उसने मेरी मर्ज़ी तो जानी नहीं...उसने कैसे मान लिया उसकी ये घोषणा मेरा सौभाग्य है.... अभ्यस्त बताएंगे कि ये सब लड़की के सोचने का विषय ही नहीं है...... बकौल प्रधानमंत्री जब गोरे बुश के साथ पूरा हिंदुस्तान प्यार कर सकता है तो हमरंग सांवले ओबामा से तो करेगा ही।

हम एतराज़ करते हैं कि फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर में भारत की ग़लत छवि दिखाई है....मगर खुश होते हैं गोल्डन ग्लोब लेने वाले ए आर रहमान पहले भारतीय हैं। हम तड़पते हैं जब अमेरिका के मुंह से कश्मीर निकलता है.....हम गुज़ारिश करते हैं अमेरिका से कि वो पाकिस्तान पर दबाव बनाए...हम फक्र करते हैं जब हमारी फिल्म ऑस्कर के लिए नॉमिनेट होती है....और जब वो नहीं जीतती पुरस्कार तो कहते हैं वो हमारी संस्कृति को समझते नहीं.....सोनिया गांधी के विदेशी मूल से हम एडजस्ट नहीं कर पाते...और सगर्व बताते हैं कि ओबामा कि टीम में कितने लोग भारतीय मूल के हैं...बाज़ार में लोकल, घटिया का पर्याय हो गया है, इम्पोर्टिड शान का...आत्महीनता का मारा, मान्यता का मुंतज़िर शख्स ताली भी पीटता है तो नहीं जान पाता ये विषय गर्व का है या शर्म का!

बुधवार, 28 जनवरी 2009

हंगामा यूं है बरपा! (व्यंग्य)

ऐसे लोगों के प्रति मेरे मन में गहरी आस्था है जो विरोध ज़ाहिर करने के लिए सड़क पर आ जाते हैं। ट्रैफिक जाम करते हैं, तोड़फोड़ करते हैं। यहां तक की लड़कियों पर हाथ उठाने में भी पीछे नहीं रहते। मैं भी इनके जैसा बनना चाहता है। लेकिन 'मैनेज' नहीं कर पा रहा। अपने ब्लॉग के माध्यम से ऐसे लोगों से कुछ सवाल करना चाहता हूं, अगर जवाब दे पाएं तो भला होगा।

1. सरोजनी नगर के 'चिंगारी सिंह' की किसी मामले पर अगर भावना आहत हुई, रोहिणी में भी किसी 'फसाद कुमार' का दिल दुखा, शाहदरा में भी 'विस्फोट सम्भव' को उसी बात पर ठेस पहुंची, बावजूद इसके तुम लोग इतना दूर-दूर रहते हो,एक-दूसरे को ढूंढ कैसे लेते हो? अरे, तुम्हारा भी इस मामले पर दिल दुखा है, मेरा भी दुखा है आओ भाई चलो चल कर विरोध करें।
2. विरोध पर जाने के लिए तुम्हें क्या फौरन ऑफिस से छुट्टी मिल जाती है। बॉस कुछ पूछता नहीं ? पूछता है तो क्या कहते हो.. सर, फलां मामले पर विरोध ज़ाहिर करने जाना है.... प्लीज़.... ये ऐप्लिकेशन साइन कर दो। और बॉस कहता होगा, बहुत बढ़िया। चलो मैं भी चलता हूं। मेरा साला कुछ दिनों से पटना से आया हुआ है, उसे भी साथ ले लेता हूं। कल ही वो कह रहा था जीजा जी दिल्ली घुमाओ। विरोध का विरोध हो जाएगा। साला दिल्ली घूम लेगा। बीवी खुश हो जाएगी। और जंतर-मंतर पर धूप भी सेक लेंगे। स्साला! एक तो इस नौकरी में धूप देखने को नहीं मिलती।


3. प्रिय विरोध-प्रदर्शनों में जो पूतले तुम फूंकते हो क्या ये बाज़ार से रेडिमेड लेकर आते हो, या खुद तैयार करते हो ? बाज़ार से लेकर आते हो तो ठीक है। खुद तैयार करते हो तो सलाह दूंगा कि इस काम को सीरियसली लो। तुम्हारे काम में क्रिएटिविटी की भारी कमी है। मैंने अक्सर देखा जिस नेता का तुम पूतला फूंक रहे होते हो, उसकी शक़्ल असली नेता से कम, और तुम्हारी ही पार्टी के नेता से ज़्यादा मिलती है। और जनता में संदेश जाता है कि तुम फलां पार्टी के कार्यकर्ता न हो कर बागी हो और किसी बात पर अपने ही नेता से नाराज़ हो!
4. घर जाकर तुम उस तोड़फोड़ की ख़बर भी देखते हो जिसमें तुम शामिल थे। देश भर में मौजूद रिश्तेदारों को फोन कर क्या तुम बताते हो देखो.. फलां चैनल पर पीले रंग की शर्ट में पुलिस जिसको दौड़ा-दौड़ा कर पीट रही है वो मैं हूं।
और आख़िर में ईमानदारी से बताना क्या ये इतेफाक है कि किसी एक-आध मामले पर तुम्हारी भावना आहत होती है। या फिर तुम पेशेवर असंतुष्ट हो। ऐसे पेशेवर, जो पचास-सौ रूपये लेकर असंतुष्ट और उग्र रहता है ?

सोमवार, 19 जनवरी 2009

फिर न कहना सॉफ्ट नेशन ! (व्यंग्य)

साफ हो गया है कि आवाम चाहें तो भी सरकार और अदालतें उसे सुधरने नहीं देंती। बरसों से हमारे माथे पर एक कंलक लगा था। हमने सोचा.... बहुत हुआ... चलो अपने 'पुरुषार्थ' से इसे धोया जाये। ये राष्ट्रीय सम्मान का मामला था। कोई भला कैसे कह सकता है कि हम 'सॉफ्ट नेशन' हैं।

हर क्रांति की तरह इसकी शुरुआत भी हमने घर से की। पहले हमने बीवियों को पीटना शुरु किया। बीवियों को पीटने के दौरान हमने पाया कि सॉफ्ट नेशन के इल्ज़ाम की 'मुख्य अभियुक्त' तो वहीं है। बीवी तो एक सामाजिक सम्बन्ध का नाम है, असल में वो हमारे लिए 'मुफ़्त की नौकरानी' बनी रहती है। जो न रोटी बनाने का पैसा ले, न सफाई करने का। बहरहाल, शाम होते ही वो पति का इंतज़ार करती हैं कि वो आयें तो उन्हें खाना खिलाये। पति आता है साथ ही कई कुंठायें भी लाता है। काम की कुंठा है, तनख्वाह का रोना है, बॉस की ज़्यादती । क्या करें कोई रास्ता नहीं दिखता। चलो बीवी को पीटा जाये। वैसे भी उसे शरण दे कर जो एहसान उस पर किया है उसके लिए हज़ार पिटाइयां भी कम हैं।

बीवियां पिटती हैं और खुश रहती हैं। पिछले रोज़ एक बड़ी पत्रिका के सर्वे में ये बात सामने आयीं कि ज़्यादातर औरतों को पति की पिटाई से एतराज़ नहीं, इसे तो वो रिश्तों का हिस्सा मानती हैं।

अब आप बतायें ऐसी औरत जात का भला क्या किया जाये। जो खटती भी है, पिटती भी है और खुश रहती है। ऐसे में 'सॉफ्ट नेशन' के इल्ज़ाम की 'मुख्य अभियुक्त' उन्हें क्यों न कहा जाये। लिहाज़ा पुरुषों ने तय किया कि घर में औरत नाम का एक ही प्राणी काफी है। फिर हमने कन्या भ्रूण हत्याओं का दौर शुरु किया। न लड़की पैदा हो, न बड़ी हो, न किसी की बीवी बने, और न ही किसी के हाथ पिट कर देश को बदनाम करवाये!

लेकिन इस देश की सरकार और अदालतें न जानें क्या चाहती हैं। सरकार कहती है कि कन्या भ्रूण हत्या अपराध है। अदालत कहती है कि बीवी को पीटा.. तो जुर्माना होगा।

ठीक है नहीं पीटते। लेकिन सरकार हमारी मजबूरी भी तो समझे। आख़िर क्यों पैदा होने दो हम बच्चियों को? क्यों पढायें लिखायें? पढ़-लिख कर नौकरी भी करेंगी तो हमारे किस काम की? और फिर शादी पर दहेज का बंदोबस्त कौन करेगा? आख़िर इतने 'आक्रमक' तो हम हो नहीं पाये कि अपने स्वार्थों और सामाजिक रुढ़ियों से लड़ पायें। इतना आत्मबल तो हममें अभी नहीं आया कि अपनी कुंठाओं से ऊपर उठ पायें। तो आप ही बतायें एक रुढ़िवादी, कुंठित, दिशाहीन और दम्भी पुरुष न पीटे बीवियों को, न करें भ्रूण हत्याएं तो आख़िर क्या करे? हमें लड़ना होगा। लेकिन.......... हम तो सॉफ्ट नेशन हैं। क्या करें.... सरकार और अदालतें हमें आक्रमक भी तो नहीं होने देती!

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गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

अपराधी की सहमति! (व्यंग्य)

पाकिस्तान का कहना था, पहले सबूत दो। भारत ने कहा, ये लो। पाकिस्तान ने कहा, मिले नहीं। भारत ने कहा, भेज तो दिए। हमें और चाहिए....अरे और भिजवाए तो थे....क्या बकवास कर रहे हो...हमें कोई सबूत नहीं मिले।

तीन हफ्ते हो गए, दो देश ऐसे लड़ रहे हैं जैसे खाने का ऑर्डर दे कर आप रेस्टोरेंट वाले से लड़ते हैं। आधा घंटा हो गया अब तक खाना नहीं आया। सर, लड़का निकल चुका है, बस पहुंचता ही होगा। क्या पाकिस्तान के मामले में भी ऐसा ही है। लड़का निकल चुका है मगर पहुंचा नहीं।

एक नज़रिया ये है कि जिन ‘माध्यमों’ से सबूत मंगवाए जा रहे हैं कहीं उन्हीं में तो खोट नहीं। मसलन, जिस नम्बर पर सबूत फैक्स करवाए गए वो एमइए का न हो कर, रावलपिंडी के किसी पीसीओ बूथ का हो, जो ईमेल आईडी बताई गई, उसका इनबॉक्स फुल हो या जिस पते पर सबूत कूरियर करने को कहा गया हो वो किसी किराना स्टोर का हो। इधर सबूत का बंडल पहुंचा, उधर किराने वाले ने बंडल से पन्ने अलग कर उसमें खुला राशन बेचना शुरू कर दिया। काले चिट्ठे में काली मिर्च लपेट दी गई।

भारत ने भले ही पाकिस्तान के साथ क्रिकेट सीरीज़ खेलने से मना कर दिया हो लेकिन वो उससे ‘सबूत मिले नहीं, दे दिए’ टाइप एक बेतुके मैच में ज़रूर उलझा हुआ है, ऐसा मैच जो हर दिन नीरस होने के साथ-साथ ड्रा की ओर बढ़ रहा है।

सबूत के इस पूरे एपीसोड में कुछ बातें बहुत दिलचस्प हैं। पहला- ये मानना कि जो लोग (पाकिस्तान सरकार) कहते हैं हम आतंकवाद ख़त्म करना चाहते हैं, वो वाकई कुछ कर सकने की स्थिति में हैं! दूसरा-ऐसा करने के लिए उन्हें सबूत चाहिए। तीसरा-जो सबूत भारत उन्हें देगा वो उन्हें उत्तेजित करेंगे, वजह-उससे ज़्यादा सबूत तो खुद उनके पास है! किसी मां को ये बताना कि उसके बच्चे के दाएं कंधे पर तिल है और फिर उम्मीद करना कि वो इस जानकारी पर हैरान होगी, ये वाकई उच्च दर्जे का आशावाद और निम्न दर्जे की मूर्खता है।

आतंकी कहां से आए, किसने भेजा, कहां से पैसा आया, किसने ट्रेनिंग दी, क्या हम इतने दिनों से इस सबके सबूत पाकिस्तान को दे रहे हैं! उसकी आत्मकथा से उसका लाइफ स्कैच तैयार कर उसे पढ़ने के लिए दे रहे हैं।

अगर यही न्याय है तो बलात्कारियों और हत्यारों को भी ये छूट दी जाए। उनके अपराध के खिलाफ सबूत जुटा, उनके ही सामने पेश किए जाएं और सज़ा से पहले ये देखा जाए कि वो इन सबूतों से संतुष्ट हैं या नहीं। सबूतों से संतुष्टि अगर अपराधी की मौत है तो इस संतुष्टि का इंतज़ार आपकी मूर्खता!

शनिवार, 13 दिसंबर 2008

शर्म की भाषा!(व्यंग्य)

याद नहीं आता दिल्ली आने पर किस के कहने पर अंग्रेज़ी का अख़बार लगवाया। मुश्किल शब्दों का अर्थ लिखने के लिए एक रजिस्टर खरीदा। कुछ दिनों तक सिलसिला चला। फिर रजिस्टर में नोट किए शब्दों के साथ-साथ रजिस्टर भी खो गया। अख़बार फिर भी आता रहा। मैंने उसे उसके हाल पर छोड़ दिया। न पढ़ा, न हटाया। हॉकर रबड़ लगाकर बॉलकॉनी में फेंकता है। महीने-दो महीने बाद कबाड़ी के हवाले किए जाने तक रबड़ नहीं खुलता। दिल दुखता है जब पढ़ना नहीं तो लगवा क्यूं रखा है। सोचता भी हूं इसे हटाकर और एक हिंदी का अख़बार लगवा लूं। लेकिन हिम्मत नहीं होती। सोच कर दहल जाता हूं ऐसा कर दिया तो इस जन्म में अंग्रेज़ी सीखने का चांस ख़त्म हो जाएगा। ऐसा सिरेंडर मुझे मज़ूर नहीं। नहीं, मैं कदम पीछे नहीं हटाना चाहता।
बहरहाल, अख़बार आ रहा है। रबड़ नहीं खुल रहा। कभी-कभी तरस भी आता है। रिपोर्टर ने कितनी मेहनत की होगी, सब-एडिटर ने भी ज़ोर लगाया होगा, प्रूफ रीडर ने भी छत्तीस बार पढ़ा होगा, कम्पनियों ने भी पाठक को लुभाने के लिए लाखों का विज्ञापन दिया है। मगर ये 'बेशर्म पाठक' (मैं) अख़बार खोलता तक नहीं। और कुछ नहीं उस बेचारे हॉकर का तो ख़्याल कर जो तीसरी कोशिश में तीसरी मंज़िल की बॉलकॉनी में अख़बार फेंक पाता है।
ख़ैर, ग़लती से कभी अख़बार खोल भी लिया। कुछ पन्ने पलट भी लिये लेकिन बिज़नेस स्पलीमेंट देख मैं डिप्रेशन में चला जाता हूं। सोचता हूं कब तक इसका इस्तेमाल खाते वक़्त बिस्तर पर बिछाने के लिए करता रहूंगा। कब तक इसके पन्ने अलमारी के आलों में ही बिछते रहेंगे। और इस विचार से तनाव में आकर पढ़ने की कोशिश भी करता हूं तो लगता है शायद पाली भाषा में लिखा कोई शिलालेख पढ़ रहा हूं। तनाव और बढ़ जाता है। अख़बार छूट जाता है।
इस सबसे खुद पर गुस्सा भी आता है। मगर खुद की कमज़ोरी के बारे में सोचने पर आत्मविश्वास टूटता है। लिहाज़ा आज कल अंग्रेज़ी का ही विरोध करने लगा हूं। मुझे लगने लगा है कि अंग्रेजी सीखने या सुधारने की मजबूरी क्या है। पश्चिमी देशों ने क्या अंग्रेज़ी के दम पर तरक्की की है, चीन ने भी ऐसी किसी मजबूरी को नहीं माना। तो फिर हम क्यूं ऐसा सोचते हैं। ऐसा सोचने से मुझे हिम्मत मिलती है। इस तरह से हिम्मत जुटाने में मुझे शर्म भी आती है। मगर ये नहीं समझ पाता कि ये शर्म भाषा न सीख पाने की है या उस भाषा के अंग्रेज़ी होने की!

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2008

पिक्चर अभी बाकी है...(व्यंग्य)

मेरा मानना है कि हर समझौते में बराबर न्याय होना चाहिए। मतलब किसी सांसद को ख़रीदते वक़्त अगर कहा गया कि तुम हमें वोट दो, हम तुम्हें नोट देंगे, नोट नहीं तो पद देंगे। तो उसे टाइमली पेमेंट होनी चाहिए। इएमआई का कोई टंटा नहीं, एक मुश्त, लम-सम जितना बने, दे के नक्की करो। वैसे भी ऐसा सांसद जो किसी लालच में पार्टी से विश्वासघात कर आया हो, पैसे न मिलने पर किसी और पर विश्वासघात का इल्ज़ाम नहीं लगा सकता। जैसे झारखंड के राजनीतिक विवाद में भी मेरी पूरी हमदर्दी आदरनीय सोरेन के साथ थी। मैं बराबर तिलमिलाता रहा कि भाई उन्हें मुख्यमंत्री बना क्यों नहीं रहे। उन्होंने 'देश हित' को देखते हुए सरकार के पक्ष में वोट दिया और मधु कोड़ा थे कि 'देश हित' सधने नहीं दे रहे। आख़िर में देशभक्त सोरने की जीत हुई और वो मुख्यमंत्री बने।

मगर ये कहानी एक हिस्सा था। जिनको पद, पैसा मिलना था मिला। पर सवाल ये था कि जिस महान उद्देश्य के लिए ये सब किया जा रहा था उसकी प्राप्ति तो बाकी थी। मेरी हमदर्दी अब कांग्रेस के साथ हुई। बेचारी ने क्या नहीं किया। कितने ईमान खरीदे, कितने घर उजाड़े, कितना निवेश किया, कितने सपने तोड़े(पीएम बनने के), कितनों से धमकी देने का सुख छीना, कितनी लानतें झेलीं सिर्फ इसलिए कि परमाणु डील कर देश तरक्की कर पाए।

ये सोच कर ही मैं कांप जाता था कि इस सबके बावजूद अगर डील नहीं हुई तो कांग्रेस कैसे अपना मुंह, जो पहले ही दिखाने लायक नहीं बचा था, किसी को दिखाएगी। शिबू सोरेने का देश हित तो सध चुका अब किस मुंह से उन्हें उनके पद से हटाते। न ही सांसदों से अपील की जा सकती थी कि चूंकि डील नहीं हुई इसलिए 50 परसेंट पैसे वापिस दो। ये वाकई उसके लिए कष्टदायक होता। लेकिन जैसा कि सब जानते हैं ऊपर वाला किसी के साथ अन्याय नहीं करता। अगर कांग्रेस ने अपने सारे वादे पूरे किए तो उसको भी मनचाहा नतीजा मिला। वैसे भी कहानी फिल्मी हो या असली हम भारतीय विपरित अंत नहीं चाहते। एंटी-क्लाइमेक्स से हमें सख़्त नफरत है। हम सुखांत के आदी हैं। और हमें एनएसजी के देशों, अमेरिकी कांग्रेंस और अमेरिकी दबदबे का शुक्रिया अदा करना चाहिए जिन्होंने ये सुखांत दिखाया। और रही बात सबक की। तो तब तक ख़ैर मनाए जब तक कोई अमेरिकी राष्ट्रपति ये न कह दे..... पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त....