बुधवार, 28 जनवरी 2009

हंगामा यूं है बरपा! (व्यंग्य)

ऐसे लोगों के प्रति मेरे मन में गहरी आस्था है जो विरोध ज़ाहिर करने के लिए सड़क पर आ जाते हैं। ट्रैफिक जाम करते हैं, तोड़फोड़ करते हैं। यहां तक की लड़कियों पर हाथ उठाने में भी पीछे नहीं रहते। मैं भी इनके जैसा बनना चाहता है। लेकिन 'मैनेज' नहीं कर पा रहा। अपने ब्लॉग के माध्यम से ऐसे लोगों से कुछ सवाल करना चाहता हूं, अगर जवाब दे पाएं तो भला होगा।

1. सरोजनी नगर के 'चिंगारी सिंह' की किसी मामले पर अगर भावना आहत हुई, रोहिणी में भी किसी 'फसाद कुमार' का दिल दुखा, शाहदरा में भी 'विस्फोट सम्भव' को उसी बात पर ठेस पहुंची, बावजूद इसके तुम लोग इतना दूर-दूर रहते हो,एक-दूसरे को ढूंढ कैसे लेते हो? अरे, तुम्हारा भी इस मामले पर दिल दुखा है, मेरा भी दुखा है आओ भाई चलो चल कर विरोध करें।
2. विरोध पर जाने के लिए तुम्हें क्या फौरन ऑफिस से छुट्टी मिल जाती है। बॉस कुछ पूछता नहीं ? पूछता है तो क्या कहते हो.. सर, फलां मामले पर विरोध ज़ाहिर करने जाना है.... प्लीज़.... ये ऐप्लिकेशन साइन कर दो। और बॉस कहता होगा, बहुत बढ़िया। चलो मैं भी चलता हूं। मेरा साला कुछ दिनों से पटना से आया हुआ है, उसे भी साथ ले लेता हूं। कल ही वो कह रहा था जीजा जी दिल्ली घुमाओ। विरोध का विरोध हो जाएगा। साला दिल्ली घूम लेगा। बीवी खुश हो जाएगी। और जंतर-मंतर पर धूप भी सेक लेंगे। स्साला! एक तो इस नौकरी में धूप देखने को नहीं मिलती।


3. प्रिय विरोध-प्रदर्शनों में जो पूतले तुम फूंकते हो क्या ये बाज़ार से रेडिमेड लेकर आते हो, या खुद तैयार करते हो ? बाज़ार से लेकर आते हो तो ठीक है। खुद तैयार करते हो तो सलाह दूंगा कि इस काम को सीरियसली लो। तुम्हारे काम में क्रिएटिविटी की भारी कमी है। मैंने अक्सर देखा जिस नेता का तुम पूतला फूंक रहे होते हो, उसकी शक़्ल असली नेता से कम, और तुम्हारी ही पार्टी के नेता से ज़्यादा मिलती है। और जनता में संदेश जाता है कि तुम फलां पार्टी के कार्यकर्ता न हो कर बागी हो और किसी बात पर अपने ही नेता से नाराज़ हो!
4. घर जाकर तुम उस तोड़फोड़ की ख़बर भी देखते हो जिसमें तुम शामिल थे। देश भर में मौजूद रिश्तेदारों को फोन कर क्या तुम बताते हो देखो.. फलां चैनल पर पीले रंग की शर्ट में पुलिस जिसको दौड़ा-दौड़ा कर पीट रही है वो मैं हूं।
और आख़िर में ईमानदारी से बताना क्या ये इतेफाक है कि किसी एक-आध मामले पर तुम्हारी भावना आहत होती है। या फिर तुम पेशेवर असंतुष्ट हो। ऐसे पेशेवर, जो पचास-सौ रूपये लेकर असंतुष्ट और उग्र रहता है ?

9 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

पेशेवर असंतुष्ट-ये नया आयाम जुड़ा मेरे शब्दकोष में. कैसे आभार कहूँ मित्र ..बेहतरीन कटाक्ष. :)

अबयज़ ख़ान ने कहा…

अच्छे सवाल हैं दोस्त! और ये नज़ारे तो आम हैं। शानदार लेख है।

कुश ने कहा…

पेशेवर असंतुष्ट..

बहुत खूब नीरज भाई... करारा कटाक्ष है ये तो..

डॉ .अनुराग ने कहा…

हमने कलकात्ता में ऐसे साहब देखे थे जो ऐसी एजेंसी चलाते थे जो बैनर -झंडे -तख्तिया सप्लाय करते थे ऊपर सिर्फ़ पार्टी बदलने से कम चल जाता था .इन्दोर में भी एक ऐसी एजेंसी पर निगाह पड़ी थी....तो भाई नीरज सबका अपना अपना धंधा है.

Mired Mirage ने कहा…

बहुत क्षुब्ध करने वाली बात पर भी मुस्कान लाने और अपनी बात इतने से शब्दों में कहने के लिए धन्यवाद।
घुघूती बासूती

अभिषेक ओझा ने कहा…

बहुत खूब ! आप तो लिखते हैं हैं कमाल. बस थोडी व्यस्तता रही तो इधर बहुत दिनों बाद आना हुआ!

Fighter Jet ने कहा…

ha ha ha...bahut badhiyaan...bus thoda aise peshewar asantusta logo ki zamat zara aur badh jaye..hum log nazi Germany ke daur me pahuch jayenge....waise bhi MNS,Shive Sena,SIMI,Bajrang Dal..etc..etc jor to bahut laga rahi hai..dekhte hai kitni jaldi safal ho pate hai.

नारदमुनि ने कहा…

do not worry . we r sailing in the same boat. narayan narayan

govind goyal sriganganagar

Rakesh Jain ने कहा…

नीरज भाई...पिछले दो दिनों से आपका ब्लॉग पढ़ रहा हूँ...समझ नहीं आता की कोई इतनी सूक्ष्म बातो में इतना व्यंग्य कैसे ढूँढ सकता है ???...यह रोजमर्रा की बातें हम सभी देखते है..पर इनमे इतना हास्य और व्यंग्य हो सकता है...अब पता चला...धन्यवाद..इतना अच्छा लिखने के लिए...शानदार...बहुत बढ़िया...