सिलेंडर पचास रुपये महंगा हुआ और पेट्रोल पांच रुपये। सफाई में प्रधानमंत्री ने कहा कि बड़ी मजबूरी में ये 'मामूली' वृद्धि करनी पड़ी। मतलब, मजबूरी तो बड़ी थी फिर भी वो ज़्यादा मजबूर नहीं हुए। सोचिए, अगर मजबूरी के हिसाब से वो मजबूर हो जाते तो सिलेंडर दो हजार का भी हो सकता था और पेट्रोल पांच सौ का भी। मगर, मजबूरी के अनुपात में मजबूर न होने के श्री सिंह के अदम्य साहस के कारण ऐसा नहीं हुआ।
इस पर भी तारीफ करने के बजाए हम उन्हें कोस रहे हैं। मैं पूछता हूं रसोई गैस महंगी हो भी गई तो क्या? गैस की ज़रुरत तो तब पड़ेगी न जब कुछ पकाओगे और पकाओगे तब जब कुछ खरीद पाओगे।
इस स्तर पर भी सरकार की संवेदनशीलता को समझिए। रसोई गैस महंगी करने से पहले उसने सब्जियां महंगी कर दी। मतलब भूकंप से बचने का कोई रास्ता न दिखे तो मकान तोड़ बेफिक्र हो जाओ। भूकंप आ भी गया तो क्या? गैस महंगी कर सरकार जो भूकंप लाई है उसका क्या अफसोस? महंगाई बढ़ा..उसने चूल्हा तो पहले ही फोड़ दिया था। ताज़ा 'वार' तो मलबा हटाने की कार्रवाई भर है!
और चिल्लाने वाले लोग हैं कौन? देश के अस्सी करोड़ लोग तो दिन के बीस रुपये भी नहीं कमाते। ये लोग तो रसोई गैस यूज़ कर नहीं सकते। पेट्रोल क़ीमतों से इनका क्या सरोकार? इन्हें कौन-सा लॉंग ड्राइव पर जाना है। रही बात आत्महत्या करने की तो गांव-देहातों में पेड़ से लटक मरने का फैशन है, पेट्रोल छिड़क कर आग लगाना तो निहायत ही सामंती और शहरी तरीका है।
बाकी लोगों की तरह मेरी सरकार से कोई शिकायत नहीं है। मै बस यही चाहता हूं कि नासमझ जनता को समझाने के लिए वो कुछ लोकप्रिय कदम उठाए।
मसलन, सबसे पहले सर्वशिक्षा अभियान का ढकोसला ख़त्म हो। लोगों को समझाया जाए भाई लोगों, विकास का जो मॉडल हम अपना रहे हैं उसमें सरकारी स्कूल वालों के लिए कोई जगह नहीं है। पढ़-लिख कर ख़्वामखाह कुंठा पालोगे। खुद को बेरोज़गार मानोगे।
जो दिहाड़ी मज़दूरी तुम्हें अठाराह की उम्र में करनी है वो बारह में करो। हम बाल मज़दूरी से भी रोक हटा देंगे। दुकानों-ढाबों में काम करो। व्यवसायियों की सस्ती लेबर बनो। इससे उत्पाद लागत कम होगी। जनता को फायदा होगा। तुम्हारे मां-बाप को अर्निंग हैंड मिलेगा जिससे इस मंहगाई में उनकी भी कुछ मदद होगी। इस पर भी तसल्ली नहीं हुई तो चलो हम इच्छा मृत्यु की इजाज़त दे देते हैं। अब खुश!
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गुरुवार, 12 जून 2008
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