शुक्रवार, 18 जून 2010

हारा हुआ चिंतन! (व्यंग्य)

औसत भारतीय ज़िंदगी में किस्मत, वक़्त और ईश्वर को कभी नहीं भूलता। किस्मत में हो तो अच्छी नौकरी मिल जाती है, वक़्त आने पर लड़की के लिए अच्छा रिश्ता मिल जाता है और ईश्वर चाहे तो इंसान का ‘नाम’ भी हो जाता है। अब ऐसे समाज में जब लोग इंसाफ की, कानून की बात करते हैं तो लगता है कि संस्कारों से बगावत हो रही है। मेरा मानना है कि दर्शन जब ज़िंदगी के हर पड़ाव पर सहारा बनता है तो फिर न्याय में भी बनता होगा। लिहाज़ा, जब लोग बात करते हैं कि हज़ारों लोगों की मौत के ज़िम्मेदार एंडरसन को भगा कर, उनके साथ अन्याय किया गया तो मुझे कोफ्त होती है। जब संसार में एक पत्ता भी ईश्वर की मर्ज़ी के बिना नहीं खड़कता तो ऐसे में एक शख्स की लापरवाही से हज़ारों लोगों की जान कैसे जा सकती है! लोग मरे... क्योंकि यही ईश्वर की मर्ज़ी थी और एंडरसन फरार हुआ क्योंकि उसमें ईश्वर की सहमति थी। अब ये कहना कि इसके लिए अर्जुन सिंह या राजीव गांधी दोषी हैं, सरासर ग़लत है।

दोषियों का क्या होगा...क्या नहीं होगा...इसकी चिंता हमें छोड़ देनी चाहिए। जब इंसान को उसके कर्मों का फल मिलना तय है और वो फल ईश्वर ने ही देना है और अर्जुन सिंह एंड कंपनी ने जो किया वो ईश्वर की मर्जी़ से ही किया तो फिर क्यों उन्हें बद्दुआएं दे हम अपना वक़्त बरबाद करें? ये लोग तो ईश्वरीय मर्ज़ी की पूर्ति के लिए माध्यम भर थे! जिसने जीवन दिया अगर उसी ने वापिस ले भी लिया तो क्या हर्ज़ है। क्या तुम्हारा था जो छिन गया।

उम्मीद को मरने वाली मैं दुनिया की आख़िरी चीज़ मान भी लूं तो भी इस बात की गुंजाइश बेहद कम है कि भगवान भी आत्मचिंतन करता होगा। ग़लती का एहसास होने पर वो भी प्रायश्चित करता होगा...और अगर आत्मचिंतन ईश्वर के भी संस्कार का हिस्सा है तो यकीन मानिए वॉरन एंडरसन अगले जन्म में एक गरीब के रूप में भारत में ही जन्म लेगा! उसके लिए सज़ा की इससे बड़ी बद्दुआ और क्या हो सकती है!

7 टिप्‍पणियां:

कुश ने कहा…

हो सकता है कि बद्दुआ देने में भी ईश्वर की मर्जी रही हो.. वरना हम कौन होते है बद्दुआ देने वाले..

इस बार भी मस्त कहा नीरज भाई

Shiv ने कहा…

चलिए मान लें कि राजीव गाँधी और अर्जुन सिंह ने ही एंडरसन को छोड़ा. इसका मतलब क्या? इसका मतलब यह कि राजीव गाँधी और अर्जुन सिंह ही हमारे ईश्वर हैं.

एंडरसन अमेरिका चला गया, यह ईश्वर की 'मर-जी' थी. वह अगर कल भारत आ भी जाए तो भी ईश्वर की ही 'मर-जी' होगी.

दर्शन जिंदाबाद. ईश्वर तो हमेशा ही जिंदाबाद हैं.

Shiv ने कहा…

चलिए मान लें कि राजीव गाँधी और अर्जुन सिंह ने ही एंडरसन को छोड़ा. इसका मतलब क्या? इसका मतलब यह कि राजीव गाँधी और अर्जुन सिंह ही हमारे ईश्वर हैं.

एंडरसन अमेरिका चला गया, यह ईश्वर की 'मर-जी' थी. वह अगर कल भारत आ भी जाए तो भी ईश्वर की ही 'मर-जी' होगी.

दर्शन जिंदाबाद. ईश्वर तो हमेशा ही जिंदाबाद हैं.

SadeRa盈君iford0412 ने कहा…

看看blog放鬆一下,工作累死了....<.................................................................

Virender Rawal ने कहा…

नीरज भाई ,
क्या पता भोपाल गैस त्रासदी हमारे पूर्वजन्म के पापो कर परिणाम हो . हमें तो वैसे ही हर चीज़ धर्म ईश्वर या पुनर्जन्म के बहाने रुपी चश्मे से देखनी पढ़ती हैं . मेरा बॉस का ख़राब होना , सेलरी ना बढ़ना, शादी ना होना , मकान ना होना , महंगाई , भारत का फिसड्डी फूटबाल प्रदर्शन , आतंकवादी घटनाये , पाकिस्तान जैसे घाघ पडोसी सब पुनर्जन्म या ईश्वर या किस्मत वाली कैटेगरी में आते हैं .

यही चिंतन तो हमारे जीवन का आधार हैं . सच मानिये नहीं तो इस चिंतन के बिना तो हमारे देश में जीना असंभव हैं . सरकारे अब तक इसीलिए तो जिन्दा हैं कि हम इसी चिंतन में सोये हैं .
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

Email:virender.zte@gmail.com
Blog:saralkumar.blogspot.com

रंजना ने कहा…

लाजवाब दर्शन...लाजवाब चिंतन...

भोर ने कहा…

अद्भुत कटाक्ष