शनिवार, 13 दिसंबर 2008

शर्म की भाषा!(व्यंग्य)

याद नहीं आता दिल्ली आने पर किस के कहने पर अंग्रेज़ी का अख़बार लगवाया। मुश्किल शब्दों का अर्थ लिखने के लिए एक रजिस्टर खरीदा। कुछ दिनों तक सिलसिला चला। फिर रजिस्टर में नोट किए शब्दों के साथ-साथ रजिस्टर भी खो गया। अख़बार फिर भी आता रहा। मैंने उसे उसके हाल पर छोड़ दिया। न पढ़ा, न हटाया। हॉकर रबड़ लगाकर बॉलकॉनी में फेंकता है। महीने-दो महीने बाद कबाड़ी के हवाले किए जाने तक रबड़ नहीं खुलता। दिल दुखता है जब पढ़ना नहीं तो लगवा क्यूं रखा है। सोचता भी हूं इसे हटाकर और एक हिंदी का अख़बार लगवा लूं। लेकिन हिम्मत नहीं होती। सोच कर दहल जाता हूं ऐसा कर दिया तो इस जन्म में अंग्रेज़ी सीखने का चांस ख़त्म हो जाएगा। ऐसा सिरेंडर मुझे मज़ूर नहीं। नहीं, मैं कदम पीछे नहीं हटाना चाहता।
बहरहाल, अख़बार आ रहा है। रबड़ नहीं खुल रहा। कभी-कभी तरस भी आता है। रिपोर्टर ने कितनी मेहनत की होगी, सब-एडिटर ने भी ज़ोर लगाया होगा, प्रूफ रीडर ने भी छत्तीस बार पढ़ा होगा, कम्पनियों ने भी पाठक को लुभाने के लिए लाखों का विज्ञापन दिया है। मगर ये 'बेशर्म पाठक' (मैं) अख़बार खोलता तक नहीं। और कुछ नहीं उस बेचारे हॉकर का तो ख़्याल कर जो तीसरी कोशिश में तीसरी मंज़िल की बॉलकॉनी में अख़बार फेंक पाता है।
ख़ैर, ग़लती से कभी अख़बार खोल भी लिया। कुछ पन्ने पलट भी लिये लेकिन बिज़नेस स्पलीमेंट देख मैं डिप्रेशन में चला जाता हूं। सोचता हूं कब तक इसका इस्तेमाल खाते वक़्त बिस्तर पर बिछाने के लिए करता रहूंगा। कब तक इसके पन्ने अलमारी के आलों में ही बिछते रहेंगे। और इस विचार से तनाव में आकर पढ़ने की कोशिश भी करता हूं तो लगता है शायद पाली भाषा में लिखा कोई शिलालेख पढ़ रहा हूं। तनाव और बढ़ जाता है। अख़बार छूट जाता है।
इस सबसे खुद पर गुस्सा भी आता है। मगर खुद की कमज़ोरी के बारे में सोचने पर आत्मविश्वास टूटता है। लिहाज़ा आज कल अंग्रेज़ी का ही विरोध करने लगा हूं। मुझे लगने लगा है कि अंग्रेजी सीखने या सुधारने की मजबूरी क्या है। पश्चिमी देशों ने क्या अंग्रेज़ी के दम पर तरक्की की है, चीन ने भी ऐसी किसी मजबूरी को नहीं माना। तो फिर हम क्यूं ऐसा सोचते हैं। ऐसा सोचने से मुझे हिम्मत मिलती है। इस तरह से हिम्मत जुटाने में मुझे शर्म भी आती है। मगर ये नहीं समझ पाता कि ये शर्म भाषा न सीख पाने की है या उस भाषा के अंग्रेज़ी होने की!

9 टिप्‍पणियां:

कुश ने कहा…

नीरज भाई.. ये तो मेरी पोल खोल दी आपने.. बिजनेस सपलिमेंट बिछे हुए है आलो में.. और खुदा की कसम रोज़ उस अख़बार को बिछाकर उसपे खाना ख़ाता हू..

पर मैने तीन दिन पहले होकर को आज़ाद कर दिया.. इंग्लिश अख़बार बंद करवा दिया.. और हिन्दी शुरू करवा दिया.. पर आज सुबह जब नाश्ता करने बैठा तो सपलिमेंट की बहुत याद आई..

Mired Mirage ने कहा…

यदि मैं प्रतिदिन न जाने कितने शब्दों का अर्थ शब्दकोष में ढूँढकर लोगों के चिट्ठे पढ़ती हूँ तो निश्वय ही आप भी कर सकते हैं । उम्र के साथ स्मृति भी धोखा दे रही है तब भी । मुझे उर्दु शब्द नहीं आते । आपसे अनुरोध है कि समाचार पत्र पढ़िए, कुछ समय में सारी कठिनाई दूर हो जाएगी ।
घुघूती बासूती

अंशुमाली ने कहा…

काफी मजे से मजेदार बात कही है। पढ़कर मजा आया।

Shashwat Shekhar ने कहा…

शीर्षक बहुत अछा है.

Pt.डी.के.शर्मा "वत्स" ने कहा…

बहुत खूब.

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

अँग्रेज़ी अख़बार न भी पढ़ें तो भी उसका सप्पलिमेंट खोल कर ज़रूर देख लिया करें... उसमें सुंदर (और कभी कभी तो अधनंगी भी) महिलाओं की फोटुएँ डिप्रेशन से उबारने के नज़रिए से ही छापी जाती हैं :)

neeraj badhwar ने कहा…

kajal ji,
samjhdar vahi hai jo doosron ke anubhav se sikhe. mai taiyar hoon.
shukriya (anubhav bantne ke liye)

dr. ashok priyaranjan ने कहा…

good satire.
जीवन की िस्थितयों को सुंदरता से शब्दबद्ध किया है । मैने अपने ब्लाग पर एक लेख िलखा है-आत्मिवश्वास के सहारे जीतें िजंदगी की जंग-समय हो तो पढें और प्रितिक्रया भी दें-

http://www.ashokvichar.blogspot.com

Fighter Jet ने कहा…

bhai jo bhi kahen...kisi bhasa ka gyan wyarth nahi jata....chahe wo english ho ya urdu.