शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

राजनीति का मुआवज़ा!

‘संयम’ की आंखें नम हैं। वो दसियों सालों से विस्थापन की मार झेल रहा है। राजनीति की ज़रूरत बता एक बार किसी नेता ने उससे जगह खाली करवाई थी, मगर तब से उसे न मुआवज़ा मिला, न मकान। वो न जाने कब से राजनीति की चौखट पर ‘अंदर आ जाओ’ सुनने की उम्मीद में बैठा है। इस बीच बहुतों ने समझाया कि व्यर्थ का आशावाद मत पालो। तुम ‘आउट ऑफ फैशन’ हो गए हो। मगर वो नहीं मानता। उसे लगता है कि वो तो संस्कारों का हिस्सा है और संस्कार कभी आउट ऑफ फैशन नहीं होते।

‘संयम’ का विश्वास अपनी जगह है मगर मुझे भी लगने लगा है कि संस्कार कहीं ‘आउट ऑफ फैशन’ ही तो नहीं हो गए। ‘संयम’ और ‘शुचिता’ कहीं सत्तर के दशक की बैल बॉटम तो नहीं हो गई जिसका ट्रेंड अब नहीं रहा। फिर सोचता हूं कि शायद ये अलग-अलग सभ्यताओं की एक पैमाने पर तुलना जैसा है। मसलन, निर्वस्त्र रहना सभ्य समाज में बुरा माना जा सकता है मगर कई आदिवासी समाजों में नहीं। और जिस तरह ‘पहनावा’ सभ्यता से जुड़ा है उसी तरह ‘भाषायी संस्कार’ भी। गाली देना सभ्य समाज में बुरा हो सकता है मगर राजनीतिक समाज में नहीं। मतलब तो भावनाओं के इज़हार से है। किसी विद्वान ने कहा भी है कि ‘अभिव्यक्ति’ आपके एहसास की सर्वोत्तम वेशभूषा है। अब ये हमारा दोष है अगर हमें उस वेशभूषा में फटा नज़र आता है, उस पर गंदगी दिखती है। यहां एक का वजूद, दूसरे के विनाश पर टिका है इसलिए भाषा के मर्तबन में मिठास कैसे हो सकती है?

अब कोई इज़राइली आप से शिकायत करे कि आप हिंदी में क्यों बात करते हैं, हिब्रू में क्यों नहीं, तो आप क्या कहेंगे? यही ना कि भाई, हिब्रू तुम्हें आती होगी, हमें नहीं, हम तो हिंदी जानते हैं, उसी में बात करेंगे। इसलिए जब कोई रीता बहुगुणा जोशी किसी मायावती से और कोई मायवती किसी मुलायम सिंह से बात करे तो आप बुरा न मानें कि वो हिब्रू में बात क्यों कर रहे हैं। अरे भाई, राजनीतिक प्रदेश की यही भाषा है।

रही बात इस भाषा के अभद्र होने की तो इस पर मेरी अलग सोच है। विज्ञान कहता है कि आदमी मूलत: जानवर है, मगर वो इंसान होने की कोशिश करता है। ऐसे में अगर आपको नेताओं की हरक़ते और बातें ग़ैर इंसानी लगती हैं तो उसका यही अर्थ है कि इन लोगों ने अपने मूल के प्रति आत्मसमर्पण कर दिया है। पर अफसोस...यही लोग राजनीति के प्रतिनिधि भी हैं, और गुनाहगार भी...आख़िर राजनीति मुआवज़ा मांगे भी तो किससे? उसके लिए तो एक करोड़ भी कम हैं!

4 टिप्‍पणियां:

डॉ .अनुराग ने कहा…

वैसे पूरे तमाशे में ये समझ नहीं आ रहा किसकी भाषा भद्र है ?

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

संयम का यम
राजनीति में
गया है जम।

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

बहुत बढ़िया लेख है. 'संयम' को घर-निकाला मिल गया है. जिनलोगों ने दिया है, उनकी बातों को दिल से लगाये ही क्यों? उनका 'संयम' था. उन्होंने निकाल दिया.

मधुकर राजपूत ने कहा…

संयम शब्द एड्स के साथ ऐसा जुड़ गया कि उसकी खुद ही शुचिता जाती रही। संयम बरतें एड्स को थामें। हर बार इस शब्द को सुनते ही शोहदों की ज़ुबान पर और दिल में गुदगुदी होने लगी है। संयम में खुद इतना संयम नहीं बचा कि किसी कामपिपासु की मन में घुसा रहे और एड्स की रोकथाम कर सके। तो भला इतने पतित शब्द का हमारी पावन राजनीति में क्या काम। अगर किसी को पता लगा कि इनका संयम के साथ संबंध है तो विरोधी लोग उनके नाम के साथ सेक्स स्कैंडल, रैकेट, एड्स और न जाने क्या-क्या जोड़ देंगे। बला से दूर ही भले।