गुरुवार, 23 जुलाई 2009

लिखना चिट्ठी इंद्र को और आना जवाब वहां से!

बारिश का इंतज़ार बीजेपी के झगड़ों की तरह लगातार बढ़ रहा था। मौसम विभाग की उल्टी-सीधी भविष्यवाणियां सुन, कान टपकने की हद तक पक चुके थे। बादल, मुंह दिखाई की रस्म निभा विदा ले रहे थे और सब्र का बांध, बजट पूर्व की उम्मीदों की तरह टूटने के कगार पर था। तभी मैंने तय किया कि क्यों न सीधे भगवान इंद्र से शिकायत करूं। इसी बाबत मैंने उन्हें ईमेल किया। गौर फरमाएं-

प्रभुवर,
सादर प्रणाम!
तय नहीं कर पा रहा हूं, गुस्सा करूं या गुज़ारिश। आधा जुलाई बीत चुका है मगर नेताओं के ज़मीर की तरह बारिश का अब भी कोई पता नहीं। हफ्ता पहले सुना था, मॉनसून आने को है। चार दिन पहले सुना, ‘बस! आ गया’ और दो रोज़ पहले कहा गया कि ‘बस! आ ही गया’। बताओ प्रभु, उसे रोडवेज़ की किस बस में बिठा आए हो जो वो अब तक नहीं पहुंचा।

बादल न जाने हमसे किस जन्म का बदला ले रहे हैं? क्यों हमें मुंह चिढ़ा रहे हैं? होता ये है कि अक्सर घने बादल गरज़ने लगते हैं। एक-आध बूंद टपक भी जाती है। बाहर सूखते कपड़े अंदर कुर्सियों पर डाल दिए जाते हैं। बीवी पकौड़ों की तैयारी में तेल गर्म करने लगती है। बेसन लाने का आदेश पा पति किराना दुकानों का रुख करते हैं। ‘आलू या प्याज के’ पकौड़ों के लिए बच्चे टॉस करते हैं और ऐसे समय जब कायनात का पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा बारिश के लिए तैयार होता है, इलाके के सारे मोर बारिश से पहले की फाइनल डांस रिहर्सल को भी अंजाम दे चुके होते हैं, बादलों की झीनी चादर फाड़ सूरज सबसे सामने नुमाया हो जाता है। बेसन लेने गए पति का घर पहुंचते-पहुंचते तेल निकल जाता है। कड़ाही में खौलता तेल धरा का धरा रह जाता है। बारिश में नहाने की उम्मीद बांधा आदमी, पसीने से नहा घर लौटता है।
बताओ प्रभु, ये कहां का न्याय है? या तो बारिश दो या फिर मेरे ख़त का जवाब।

वर्षाभिलाषी...

इसके बाद कुछ दिन और बीते। बारिश तो नहीं आई, भगवान इंद्र का जवाब ज़रूर आया। आप भी पढ़िए।

वत्स,

तुम्हारा मेल मिला। तुमने बताया कि किस तरह बारिश न होने से बुरा हाल है। चारों तरफ हाहाकार मचा है। जन-जन बारिश के लिए तरस रहा है। मगर तुम ही बताओ, मैं क्या करूं? जिन इलाकों में बारिश की है, वहां के हालात देख सहमा गया हूं। कहीं दस मिनट बारिश हुई और दस घंटे के लिए बिजली चली गई। सड़क पर मौजूद मामूली खड्डे, चार बाई छह के गड्ढों में तब्दील हो गए। खुले गटर राहगीरों के लिए जल समाधि बन गए। चार मिलिमीटर की बारिश में दस-दस किलोमीटर के ट्रैफिक जाम लग गए।

न जाने कितनी निचली बस्तियों में पानी भर गया। कितने ही लोग तेज़ धाराओं में बह गए। ऊपर से न तो तुम्हारी सरकार के पास जल नीति है और न ही डिज़ास्टर मैनेजमेंट। उसे सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट की तो चिंता है मगर बारिश में डूबते शख्स की सुरक्षा की कोई चिंता नहीं। तुम्हारे कृषि मंत्री कहते हैं कि देश में अनाज रखने की जगह नहीं है। सोचो, ऐसे में मेघ बरस गए तो क्या होगा? गरीबों की हालत मेघनाद की ताकत से घायल लक्ष्मण सरीखी हो जाएगी और आज की सरकारों में तो ऐसा कोई हनुमान भी नहीं जो उनके लिए संजीवनी ला सके।

यही सब सोच और देख मैं सिहर गया हूं। तय नहीं कर पा रहा क्या करूं...तुम्हें मौसमी बारिश दूं या बारिश न दे मुसीबतों की बारिश से बचाऊं!

इति अलम्!
तुम्हारा इंद्र

10 टिप्‍पणियां:

AlbelaKhatri.com ने कहा…

gazab ki baarish
hasya vyangya ki
ha ha ha ha

Arvind Mishra ने कहा…

बहुत सुन्दर ,प्रभावपूर्ण -प्रवाहपूर्ण -कौन कहता है ब्लॉगजगत साहित्य से रीता है ?

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

भास्‍कर में पढ़ लिया था सुबह ही
पर आपने इन्‍द्र जी का ई मेल पता तो दिया ही नहीं है
उसकी हमको ही नहीं
सबको जरूरत है नीरज जी।
हम भी भेजेंगे मेल उन्‍हें।

कुश ने कहा…

फेंटास्टिक पोस्ट.. ये वाकई में मास्टरपीस है..
वर्षाभिलाषी... तो अल्टीमेट है..

डॉ .अनुराग ने कहा…

लो जी चौथी चिट्ठी है ये इन्द्र महाराज को..आपने लिखी ओर तुंरत जवाब भी मिल गया .

संगीता पुरी ने कहा…

गजब की चिट्ठी .. और गजब का जवाब भी !!

अनूप शुक्ल ने कहा…

जय हो!

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

बहुत खूब्!!!!

मधुकर राजपूत ने कहा…

इंद्र महाराज से बोलो कि सरकार क्या करेगी डिजास्टर मैनेजमेंट, खुद आम आदमी असासिनेशन का ठेका लेकर बैठी है सरकार। प्रभो आप यूं करो की सूखों और भूखों मरने से बेहतर पानी पिला पिला कर मार डालो। सूखे गटर में मरने से बेहतर तो बूंदो की छम छम में मर जाना है।

Fighter Jet ने कहा…

behtarin!