मंगलवार, 7 जुलाई 2009

जो ज़्यादा आसान है!

उम्मीद, मेरा प्रिय कर्म है। जब चाहें, जहां चाहें, जितनी चाहें और जिससे चाहें आप मुझसे उम्मीद करवा सकते हैं। मैं वक़्त और सीज़न के हिसाब से लोग चुनता हूं। उनके लिए मापदंड तय करता हूं और बताता हूं कि वो मेरी उम्मीदों पर ख़रे उतरे या नहीं। अभी-अभी बजट का सीज़न ख़त्म हुआ है। ट्रेन बजट से पहले ममता बैनर्जी से उम्मीद थी और आम बजट से पहले प्रणव मुखर्जी से। न बैनर्जी मेरी उम्मीदों पर खरी उतरीं, न ही मुखर्जी। ममता जी से उम्मीद थी कि वो फर्स्ट क्लास में डबल बैड लगवाएंगी, सैकिंड क्लास में एसी और साधारण डिब्बे में कूलर। मुझे पक्का यकीन था कि वो पच्चीस रूपये के पास में पैलेस ऑन व्हील्स का सफर भी शामिल करेंगी। सामान्य किराए पर तत्काल का टिकट देंगी! हर यात्री को मुफ्त खाना देंगी और ऐसा खाना खा बीमार पड़ने वालों की दवा भी करवाएंगी, मगर नहीं हुआ। किया उन्होंने ये कि पत्रकारों को टिकट में पचास फीसदी की छूट दे दी। ऐसा कर उन्होंने पत्रकारों पर अहसान नहीं किया, बल्कि रेलवे का ही पचास फीसदी नुकसान कम किया है!

वहीं, प्रणव दा से उम्मीद थी कि वो कर मुक्त आय की सीमा बीस लाख कर देंगे। कर चोरी से सीमा हटा देंगे। मेरे प्रिय फ्रूट लीची पर सब्सिडी दिलवाएंगे। उसकी कीमत पांच रूपये किलो कर देंगे। होटलों में पनीर बटर मसाला की फुल थाली बीस रूपये करा देंगे। मल्टीप्लैक्स का टिकट दस का करवा देंगे और तीस रूपये के महंगे मिनरल वॉटर से बचाने के लिए पिक्चर हॉल में ही हैंडपंप लगवा देंगे, मगर ऐसा भी नहीं हुआ।

मुझे उम्मीद थी कि अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद उत्तर कोरिया परमाणु परीक्षण नहीं करेगा, शादी से पहले सानिया मिर्जा विम्बल्डन के सेमीफाइनल में पहुंचेंगी, प्रीतम अपनी फिल्मों में कुछ अपना भी संगीत देंगे। पडौ़सी मंगलू की नई जरसी गाय बीस लीटर दूध देगी, उसका बेटा आड़ूराम दसवीं में नब्बे फीसदी अंक लाएगा, उसकी बहन कचरा देवी अपने ससुराल से मेरे लिए नया स्वेटर लाएगी, मगर ये भी नहीं हुआ।

मन भारी हो गया है। गुस्से और अवसाद से घिर गया हूं। दिल कर रहा है मिट्टी का तेल डाल पूरी दुनिया को आग लगा दूं और सारे अग्निशमन यंत्र दरिया में फेंक दूं। क्यों...आख़िर क्यों...ये दुनिया मेरी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती। परेशान हूं। नहीं जानता क्या करूं। कभी-कभी सोचता हूं कि दुनिया को छोड़, खुद से कुछ उम्मीद कर लूं। फिर ख़्याल आता है कि नहीं, मैं आम आदमी हूं। मुझे सारी उम्मीदें दूसरों से ही करनी है। वैसे भी दुनिया को आग लगाना, आत्मदाह करने से कहीं ज़्यादा आसान है!

10 टिप्‍पणियां:

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

आम आदमी के लिए

बजट में आम सस्‍ते

होने की खट खट

आहट मन मोह लेती।

कुश ने कहा…

बाकी दुनिया का तो पता नहीं पर आपकी नयी पोस्ट को पढना शुरू करने से पहले जो उम्मीद होती है वो आप हमेशा ही पूरी करते है..

ये करार व्यंग था.. जब हम जानते है कि कुछ बदलने वाला नहीं फिर भी उम्मीद लगा बैठते है..

संगीता पुरी ने कहा…

इतनी उम्‍मीद न ही करें तो अच्‍छा हो !!

ओम आर्य ने कहा…

सही है उम्मीद पर ही दुनिया कायम है..........सुन्दर

ओम आर्य ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Udan Tashtari ने कहा…

टिकाये रहो उन उम्मीदों पर आसमान,
गधों से उम्मीद करते हो पहलवान!!

-बहुत उम्दा!

AlbelaKhatri.com ने कहा…

gazab klarte ho ji.........

bahut khoob !

umda aalekh...maza aa gaya !

badhaai aapko !

मधुकर राजपूत ने कहा…

उम्मीद तो मुझे भी बहुत थी लेकिन सब पर पानी फिर गया। सोचा था जेट और किंगफिशर को हफ्ते में एक दिन किरायामुक्त कर मेरे जैसे बीपीएल आदमी को सैर कराई जाएगी, और भी बहुत कुछ, लेकिन सब आह हो गया। भाई उम्मीद से बढ़िया कुछ नहीं है। टूटे तो ठेस नहीं लगती और फिर से तुरंत लग जाती है।

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

बहुत बढ़िया.

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

उम्मीद न हारें...बजट का क्या है, हर साल आंएंगे.