मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

सत्ता का सेल्फ-डिफेंस!



इटली के प्रधानमंत्री के एक बयान से इन दिनों काफी खलबली मची हुई है। दरअसल बलात्कार के एक मामले में उनका कहना था कि इटली में लड़कियां इतनी खूबसूरत हैं कि इस तरह के मामलों को रोका नहीं जा सकता! मतलब लड़कियों के लिए संदेश साफ है कि अगर खूबसूरत हो तो प्लास्टिक सर्जरी करवा बदसूरत हो जाओ। तीखी नाक है तो टेढ़ी करवा लो, गोरा रंग है तो सांवलेपन की क्रीम लगाओ। बड़ी आंखे हैं तो वैल्डिंग करवा छोटी करवा लो और मां-बाप से इस आधार पर रिश्ता तोड़ लो कि तुमने हमारे साथ ये क्या किया? आख़िर क्या कसूर था हमारा!
मैं नहीं जानता इटली के प्रधानमंत्री ने ये बयान अनजाने में दिया या सोच-समझकर, मगर मेरे हिसाब से पश्चिमी देश के किसी राष्ट्राध्यक्ष की तरफ से बुर्के या पर्दा प्रथा के पक्ष में दी गई ये सबसे बड़ी दलील है! औरत की खूबसूरती आदमी को भड़का सकती है और आदमी के भड़कने पर औरत का ही नुकसान है इसलिए इससे बचने का उपाय भी वही खोजे। दुनिया समझती थी कि बलात्कार अपराध है....उन्होंने बताया कि वो तो सहज प्रतिक्रिया है!


इसी कड़ी में शीला दीक्षित के बयान को भी जोड़ सकते हैं जिसमें उन्होंने एक लड़की के देर रात को ऑफिस से घर जाने को दुस्साहस कहा था! उसकी मौत की वजह बताया था। मतलब, देश की राजधानी के सबसे पॉश इलाके में अगर किसी की हत्या हो तो वो कुछ हद तक कानून की चूक हो सकती है...मगर इसमें बड़ा कारण लड़की का दुस्साहस ही है!


मुझे याद है कुछ साल पहले राजस्थान से लगातार ये ख़बरे आ रही थीं कि ख़राब पानी पीने से लोगों की मौत हो रही है....सम्बंधित मंत्री से जब इस बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि जो इस दुनिया में आया है एक न एक दिन तो उसे जाना ही है..... इसलिए इस पर इतना हल्ला नहीं होना चाहिए! मुम्बई धमाकों के बाद आर आर पाटिल के भी बड़े शहरों में छोटी घटनाओं के बयान को भी कोई नहीं भूला होगा!


मतलब जब सत्ता निकम्मी हो जाए तो नेता ऐसे तर्क दें कि लोग बहस के लिए तर्क जुटाने में लग जाएं और ये भूल ही जाएं कि असल मामला क्या था.....सवाल ये है कि अगर फर्ज नैतिकता से जुड़ी चीज़ है तो क्या उसके लिए आग्रह किया जाए...आप किसी बच्चे को मजबूर तो नहीं कर सकते कि तुम मां-बाप का ख़्याल रखो...न उससे शास्त्रार्थ कर सकते हैं...मगर राजनीति आग्रह मांगती है....यहां फर्ज़ स्वाभाविक न हो, अहसान मान लिया गया है....नेता वक़्त-बेक़्त बताते हैं कि हमने इन सालों में ये-ये काम किए हैं...जैसे काम करना उनके कार्यक्षेत्र से बाहर हो!....आउट ऑफ सिलेबस हो.....और जब उन्होंने कर दिया है तो जनता माने कि उस पर कितना बड़ा एहसान हुआ है!

6 टिप्‍पणियां:

कुश ने कहा…

शर्मनाक है ये तो..

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बढिया पोस्ट लिखी है।सटीक।बिल्कुल सही व खरी बात।

सागर मंथन... ने कहा…

राजनेताओ के बयानों पर काफ़ी रिसर्च किया है आपने... अब तक तो भारतीय नेताओ से ही ऐसे बयान की उम्मीद हुआ करती थी, लेकिन अब लगता है इंटरनेशनल मंच पर भारत की बढती इमेज को देखते हुए अब भारतीय नेताओ का अनुसरण विदेशी नेता भी कर रहे है....

विनय ने कहा…

बहुत ख़ूब, सुन्दर प्रस्तुति


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गुलाबी कोंपलें | चाँद, बादल और शाम

Fighter Jet ने कहा…

kya khub kaha hai..
tir bilkul nisane par hai..par netao ke liye insabka koi mayne nahi hai..in salo ko ulta latka subah sham 100-100 kore mare jayen to bhi kam hai.

डॉ .अनुराग ने कहा…

कमाल है ..महान लोग हर देश में मिल जाते है ......