शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

राजनीति के अपराधीकरण के फायदे!

पिछले दिनों हुई राजनीतिक हत्याओं के बाद राजनीति में अपराधीकरण का मुद्दा फिर से गर्माने लगा है। लोग सवाल करने लगे हैं कि क्या इन्हीं लोगों को हम संसद में पहुंचाना चाहते हैं। क्या यही लोग महान भारतीय लोकतंत्र की परम्परा को आगे बढ़ाऐंगे। मगर मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि लोगों को आपत्ति क्या है। अपराधियों के राजनीति में आने और सासंद बनने में मुझे तो फायदे ही फायदे नज़र आ रहे हैं।

फायदा नम्बर एक-पाकिस्तान में इतने दिनों से जो कुछ चल रहा है लगता है उससे हमने कोई सबक नहीं लिया। लिया होता तो ऐसी बातें नहीं करते। तालिबान हर रोज़ पाकिस्तान के नए इलाकों पर कब्ज़ा कर रहा है। दुनिया थू-थू कर रही है। लेकिन वहां के सरकारी हुक्मरान तो मानो हिंदी फिल्मों की पायरेटिड डीवीडी देखने में मशगूल हैं। ऐसे में क्या बचेंगे लोग, और क्या बचेगा लोकतंत्र। ऐसे 'बनाना रिपब्लिक' में लोगों का 'बनाना' बनना तय है जिन्हें कोई भी आसानी से छील कर खा सकता है, सरेआम कोड़े मार सकता है।

अब भारत में अगर ऐसी ही तालिबानी सोच और कर्म वाले लोग सासंद बनना चाहते हैं तो आपत्ति क्या है। अपराधियों के हाथों सरकार के सतारूढ़ से सत्ताविहीन होने अच्छा है, क्यों न उन्हें ही सत्तासीन होने दिया जाए। कम से कम दुनिया ये तो नहीं कहेगी कि देखो, वहां सरकार को बेदखल कर आतंकियों ने कब्ज़ा कर लिया। हम शान से कह सकते हैं हम व्यर्थ की प्रक्रिया से नहीं गुज़रते। किसी का हक़ नहीं मारते। ज़्यादा से ज़्यादा होगा क्या ...तालिबान ने अगर 'शरीया कानून' लागू किया तो सत्ता में आने के बाद ये 'सरिया कानून' लागू कर देंगे। लेकिन इससे 'लोकतांत्रिक देश' होने के हमारे गौरव पर तो कोई आंच नहीं आएगी। वैसे भी हमारे यहां मान्यता है कि शासन करने के किसी और तरीके में सफल होने से कहीं बेहतर है कि लोकतांत्रिक रह भ्रष्ट और असफल हो जाना। अब इस लोकतंत्र की रक्षा अगर अपराधियों को ही करनी है तो ये ईश्वर की मर्ज़ी है!

फायदा नम्बर दो- जब सारे गुंडे-मवाली सत्ता में भागीदार हो सम्मानित जीवन बिताएंगे तो देश के बाकी अपराधियों की अक़्ल को क्या पाला मार जाएगा जो वो परम्परागत पेशे से चिपके रहेंगे। वो भी राजनीति में आ समाज की मुख्य धारा से जुड़ने की कोशिश करेंगे। वही ताकत, वही पैसा, वही रसूख जब कम झंझट में मिले, तो कोई अपराधी क्यों बने, सांसद न बने। राजनीतिक निरमा के डिटर्जेंट में नहाकर जब सफेदपोश होने का विकल्प मौजूदा होगा तो भला कौनसा अपराधी दागदार वस्त्र पहन शर्मिंदा होना चाहेगा। इस तरह जल्द ही राजनीति, जनसेवा के एक माध्यम से आगे बढ़कर, सुधार आश्रम में तब्दील हो जाएगी। ऐसा आश्रम, जहां प्रवेश कर गुंडे-मवाली आने वाले सालों में अपराधबोध से मुक्ति पाएंगे।

फायदा नम्बर तीन- अपराधियों के राजनीति में आने का सबसे बड़ा फायदा होगा क्रिकेट प्रेमियों को। आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवार अपनी इसी पृष्ठभूमि को 'यूएसपी' के तौर पर पेश करेंगे। जनता को समझाऐंगे कि 'संभावित ख़तरा' जब खुद सत्ता में आ जाएगा तो सुरक्षा कारणों से कोई टूर्नामेंट बाहर नहीं करवाना पड़ेगा। जनता भी जान जाएगी कि जो शख़्स सारी उम्र दूसरों के लिए ख़तरा रहा हो, वो खुद को ख़तरा बता कर कभी सुरक्षा की मांग नहीं करेगा। इससे उसी की मार्केट वैल्यू कम होगी।

यकीन मानिए दोस्तों इस देश में क्रिकेट की जैसी दीवानगी है उसे देखते हुए भविष्य में हर पार्टी चुन-चुन कर अपराधियों को टिकट देगी। संगीन अपराधों में जेल में बंद अपराधियों की लिस्ट मंगवायी जाएगी। अपराध की गंभीरता के आधार पर उम्मीदवारों की प्राथमिकता तय की जाएगी। चोर-लूटरों जैसे को तो दरवाज़े से ही भगा दिया जाएगा। हत्यारों, बलात्कारियों के पास प्रस्ताव ले पार्टी अध्यक्ष खुद थाने जाएंगें। टिकट के दावेदार झूठे मामलों की एफआइआर बनवा खुद को नामी अपराधी बताने की कोशिश करेंगे। प्रभाव पैदा करने के लिए वो नाम बदलने लगेंगे। जीवन बाबू, जलजला सिंह हो जाएंगे। गोवर्धन लाल खुद को गब्बर सिंह बताएंगे। पार्टियां स्टिंग ऑपरेशन कर विपक्षी उम्मीदवार के 'बेदाग' होने का भंडाफोड़ करेंगी। बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस एक सीडी जारी की जाएगी। आरोपित अपनी सफाई में 'खुद को बेदाग कहे जाने को' विपक्ष की साजिश बताएगा। ऐसे दौर में पार्टियों के नारे भी कुछ इस तरह होंगे..खूंखार नेता, बेरहम सरकार। ज़ालिम चेहरा, ज़ोरदार आवाज़....नेता चाहिए ऐसा आज।

ऐसा हुआ तो जल्द ही संसद में अपाराधिक पृष्ठभूमि वाले सांसदों की तादाद सौ फीसदी हो जाएगी। सांसद-विधायक से लेकर पंच-सरपंच तक सभी पदों पर भूतपूर्व गुंडे, लठैत, हत्यारे बलात्कारी विराजमान होंगे। तब सुरक्षा कारणों से कोई घरेलू टूर्नामेंट बाहर नहीं करना पड़ेगा। कोलकाता की टीम केपटाउन और जयपुर की टीम जोहानसबर्ग में नहीं खेलेगी। इसलिए राजनीतिक पार्टियां अगर आज अपराधियों को टिकट दे रही हैं तो इसके पीछे उनके बेशर्म स्वार्थ नहीं बल्कि दूरदर्शिता है, उनका बेपनाह क्रिकेट प्रेम है। इसलिए जो हो रहा है, होने दो। हम सही रास्ते पर जा रहे हैं।

6 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

ज़ालिम चेहरा, ज़ोरदार आवाज़....
नेता चाहिए ऐसा आज।


--बहुत गजब और सटीक कटाक्ष.

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

नमस्कार,
इसे आप हमारी टिप्पणी समझें या फिर स्वार्थ। यह एक रचनात्मक ब्लाग शब्दकार के लिए किया जा रहा प्रचार है। इस बहाने आपकी लेखन क्षमता से भी परिचित हो सके। हम आपसे आशा करते हैं कि आप इस बात को अन्यथा नहीं लेंगे कि हमने आपकी पोस्ट पर किसी तरह की टिप्पणी नहीं की।
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सहयोग करने के लिए अग्रिम आभार।
कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
शब्दकार
रायटोक्रेट कुमारेन्द्र

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

बहुत गजब.
केसरिया की जगह 'सरिया' ने ले ली है.

Fighter Jet ने कहा…

bus isswar ne chaha to a ye din bhi hum log jald hi dekh lenge..aakihir hamari daskao ki koisis ab rang laa hi degi...duniya ko dikha denga denge.hum apni mahanta...aur mahan sanskriti...akhir Gandhi ji bhi bol geye..'apraadhi se prem kro...apradh se nahi ! :)

डॉ .अनुराग ने कहा…

एक ओर फायदा है जेल की भी जरुरत नहीं होगी......बिना जेल का समाज.....वैसे आई पी एल यूँ ही चलता रहा तो देखिये कबड्डी इस देश का पसंदीदा गेम हो जायेगा

कुश ने कहा…

बिलकुल सही कहा नीरज भाई ..