बुधवार, 10 अक्तूबर 2012

आलसियों से बची है दुनिया की शांति!


अगर आप बेहद आलसी हैं और हर वक्त इस गिल्ट में जीते हैं कि आपका सारा दिन पड़े रहने में बीतता है और कोई भी काम आप वक्त पर नहीं करते तो आपको ज़रा-भी शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं है। मेरा मानना है कि मौजूदा समय में दुनिया में जो थोड़ी-बहुत शांति बची है, उसका सारा क्रेडिट आलसियों को जाता है। रजनीश ने कहा भी है, पश्चिम का दर्शन कर्म पर आधारित है और भारतीय दर्शन अकर्मण्यता पर। और अगर आप इतिहास पर नज़र दौड़ाएं तो पाएंगे कि दुनिया का इतना कबाड़ा ‘न करने वालों’ ने नहीं किया, जितना ‘करने वालों ने’ किया है। दरअसल कर्म इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा संकट है और वैश्विक शांति को लेकर आलसी; इक्कीसवीं सदी की आख़िरी ‘होप’ है। लिहाज़ा आलसियों को कोसने के बजाए, मानव व्यवहार के अध्येताओं को इन शांति दूतों को समझना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां इनसे सबक ले अमन के रास्ते पर आगे बढ़ पाएं। दरअसल ज़्यादातर आलसी बचपन से ही मानकर चलते हैं कि उनका जन्म कुछ महान करने के लिए हुआ है। नहाने के बाद तौलिये को रस्सी पर सुखाने और खाने के बाद थाली को रसोई में रखने जैसे मामूली काम करने के लिए वो पैदा नहीं हुए। इसलिए वो हमेशा कुछ ‘अलग’ करने की सोचते हैं। मगर इस ‘सोचने’ में उन्हें इतना आनन्द आने लगता है कि वो ‘सोचने’ को ही अपना पेशा बना लेते हैं। घरवालों की नज़र में जिस समय एक आलसी ‘पड़ा’ होता है, उस समय वो दूसरी दुनिया से कनेक्ट होता है। वो कुछ सोच रहा होता है। उसे साफ-साफ कुछ दिखाई दे रहा होता है। घरवाले सोचते हैं कि उसने चाय पीकर गिलास जगह पर नहीं रखा, मगर वो ये नहीं देख पाते कि ‘शून्य’ में ताकता उनका लाडला उस समय किसी महान नतीजे पर पहुंच रहा होता है। दुनिया की किसी बड़ी समस्या का हल निकाल रहा होता है। अब सोचना चूंकि इत्मीनान का काम है, इसलिए वो कोई डिस्टरबैंस नहीं चाहते। यही वजह है कि ज़्यादातर आलसी बहस और झगड़े अवोयड करते हैं। उन्हें लगता है कि झगड़ने से सोचने का क्रम टूटेगा। बीवी से झगड़ा होने पर अपनी ग़लती न होने पर भी आलसी माफी मांग लेता है। इस तरह आसानी ने हथियार डालने पर आलसियों की बीवियां अक्सर नाखुश रहती हैं। पति से झगड़ों में कोई चैलेंज न मिलने पर उनमें एक अलग किस्म का डिप्रेशन आने लगता हैं। इस बारे में मैंने प्रसिद्ध मनोवैग्यानिक चिंटू कुमार से बात की तो उनका कहना था कि दरअसल झगड़ा एक ऐसी क्रिया है जिसके लिए किसी भी व्यक्ति को अपने कम्फर्ट ज़ोन से निकलना पड़ता है। उसके लिए या तो आपको अपना बिस्तर छोड़ना होगा या फिर अपने डेली रूटीन से समझौता करना होगा और दोनों ही बातें आलसी के बस की नहीं। चिंटू कुमार आगे कहते हैं “हम सभी ये तो कहते हैं कि मोटे लोग स्वभाव से बड़ा मज़ाकिया होते हैं मगर क्या कभी सोचा है, ऐसा क्यों है। दरअसल मोटे लोगों को उनका भारी भरकम शरीर झगड़ने की इजाज़त नहीं देता। ज़्यादा वजन के चलते वो न तो किसी को मार के भाग सकते हैं और न ही किसी के मारने पर भागकर खुद को बचा सकते हैं। इसलिए मोटा व्यक्ति या तो झगड़े की स्थिति पैदा ही नहीं होने देता और अगर कोई और बदतमीज़ी करे, तो बड़ा दिल दिखाते हुए उसे माफ कर देता है। इस तरह अपवाद को छोड़ दें तो पहले आप अपनी अकर्मण्यता की वजह से मोटे हुए और फिर इस मोटापे की वजह से शांतिप्रिय बनें और समाज में ये ख्याति बटोरी कि ‘भाईसाहब तो बड़े मज़ाकिया हैं’, सो अलग!” मुझे याद है दलाई लामा ने एक दफा कहा था कि ज़्यादातर भारतीय नई जगहों को इसलिए नहीं खोज पाएं क्योंकि वो स्वभाव से आलसी हैं। इसका दूसरा पहलू ये है कि जो लोग नई जगह खोजने गए भी, उन्होंने भी वहां जाकर स्थानीय लोगों को लूटने और उनसे झगड़ने के अलावा क्या गुल खिलाया। सोचें ज़रा...अगर कोलम्बस ज़रा भी आलसी होता तो ये दुनिया आज उससे कहीं अधिक शांत होती, जितनी आज ये है। सच... कोलम्बस की सक्रियता ने हमें मरवा दिया।

5 टिप्‍पणियां:

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

हाहाहहाहा
बढिया,

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सच कहा, इतनी सक्रियता रही तो माथा पीट लेंगें।

Pawan Sharma ने कहा…

Mast Sir. :P

Arvind Mishra ने कहा…

कुम्भकरण सम सोवत नीके

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

सही बात है, हमारा अहसान मानना चाहिये दुनिया को:)