बुधवार, 15 अक्तूबर 2008

पुरस्कार का एंटी क्लाइमैक्स

पुरस्कार समिति से जुड़े शख़्स का कहना था लोग ख़्वामखाह चिंता करते हैं कि फलां लेखक उम्रदराज़ हो रहा है, डिज़र्व भी करता है, लेकिन अकादमी ध्यान नहीं दे रही। लेखक को वक़्त पर पुरस्कार न मिलना, और मरने से पहले मिल जाना महज़ इतेफ़ाक नहीं है। बहुत कम लोग जानते हैं इस मामले में हमारी तैयारी कॉरपोरेट कम्पनियों से भी अच्छी होती है।
हमने बाकायदा मेडिकल जासूसों की एक टीम तैयार कर रखी है। हर जासूस 70 की उम्र पार कर चुके तीन ब़ड़े लेखकों पर निगरानी रखता है। ये जासूस अलग-अलग तरीकों से हमें रिपोर्ट देते हैं कि फलां लेखक का स्वास्थ्य कैसा चल रहा है। इन तरीकों में लेखक के फैमिली डॉक्टर को खरीद लेना, उससे वक़्त-वक़्त पर लेखक की डॉयबिटिक रिपोर्ट लेना, ब्लड प्रेशर की स्थिति जानना, पता लगाना कि लेखक को कोई बड़ी तक़लीफ तो नहीं है? है तो वो कितनी गंभीर है?
अब इसी रिपोर्ट के आधार पर अकादमी तय करती है कि लेखक को अभी कितना और लटकाया जा सकता है?
मैंने कहा, श्रीमान लेकिन यही तो सवाल है कि आख़िर आप लटकाते क्यों हैं? सारी जवानी लेखक दो पैंटों में निकाल देता है, सौ-सौ रुपये के लिए संपादकों से उलझता रहता है। कुल्फी वाले की घंटी को, ग़फ़लत में डाकिये की घंटी समझ कर दरवाज़ा खोलता है। तब तो उसकी सुध लेते नहीं, फिर अस्सी की उम्र में उसकी उस रचना को सम्मान दे देते हैं जो उसने चालीस में लिखी थी।
बात काटते हुए समिति सदस्य बोले, इसके पीछे भी हमारा अपना दर्शन है। दरअसल समिति मानती है कि 'व्यवस्था से नाराज़गी' ही लेखक की सबसे बड़ी ताकत होती है। अब लेखक की नाराज़गी कोई आशिक की नाराज़गी नहीं कि वो गुस्से में शराब पीने लगे या फांसी पर लटक जाए। इसी नाराज़गी से रचनात्मक ऊर्जा मिलती है। वो उम्दा रचनाएं लिखता है।
हमें लगता है वक़्त पर अगर लेखक को सम्मान और पैसा दोनों मिल जाएगा तो वो 'जीवन के द्वंद्व' को कैसे समझेगा?
मैंने कहा, श्रीमान वो तो ठीक है, लेकिन उस पर भी लेखक की सर्वश्रेष्ठ रचना को पुरस्कार न दिया जाना भी क्या इतेफ़ाक है? उपन्यासकार की कहानी को पुरस्कार दे दिए जाते हैं, और कहानीकार के उपन्यास को, और वो भी ऐसी रचना पर जो खुद लेखक की नज़र में सर्वश्रेष्ठ नहीं होती।
देखिये... चौधराहट का उसूल है कि आप ऐसा कुछ करते रहें जो लोगों की समझ से परे हो। अगर हमें भी उसी पर मुहर लगानी है, जिसकी दुनिया तारीफ कर रही है तो हमारी क्या रह जाएगी? आख़िर हमें भी तो 'अपनी वाली' दिखानी होती है।
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3 टिप्‍पणियां:

कुश एक खूबसूरत ख्याल ने कहा…

bahut achhe neeraj bhai.. dhardhar vyangy kiya hai is baar

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

कमाल का लिखा है, नीरज. अद्भुत लेखन है.
आपकी पोस्ट का यूं ही इंतजार नहीं रहता.

Zakir Ali 'Rajneesh' ने कहा…

बहुत धारदार व्यंग्य है। इस पैनी लेखनी को मैं अपना सलाम भेजता हूं।