मंगलवार, 19 मई 2009

मंदी में नौकरी बचाने के उपाय (हास्य-व्यंग्य)

मंदी में सभी को अपनी नौकरी जाने का ख़तरा सता रहा है। हर वक़्त ये बात ज़ेहन में घूमती है कि नौकरी न रही तो क्या होगा। मकान की पंद्रह साल की किस्त बाकी है। गाड़ी भी साल पहले खरीदी है। पानी, बिजली से लेकर मोबाइल के दसियों बिल भी हैं। ऊपर से सेविंग के नाम पर भी सिर्फ सेविंग अकांउट है और कुछ नहीं। बीवी मैट्रो समाचार भी पढ़ती है तो लगता है मैट्रीमोनियल में खुद के लिए रिश्ता ढूंढ रही है। मोबाइल पर बजी हर घंटी एचआर से आया कॉल लगती है। बॉस के केबिन से निकले पीए की आवारा निगाहें लगता है मुझे ही ढूंढ रही हैं। हर किसी के मन-मस्तिष्क, गुर्दे-घुटने में नौकरी जाने का डर बुरी तरह समा चुका है। लोग अभी से सतर्क हो गए हैं। टूथपेस्ट खरीदते वक्त भी दुकानदार को हिदायत देते हैं भइया छोटा पैकेट देना। वो छोटा दिखाता है और आप कहते हैं इससे छोटा नहीं है क्या। वो खुंदक में तीन लोगों के सामने कह देता है.....इससे छोटा नहीं आता। अकेले में ऑफिस में बैठे पैन का ढक्कन चबाते हुए यही बात आपके कान में ईको कर रही है......इससे छोटा नहीं आता....आप ढक्कन चबा रहे हैं और ख़्यालो में ढक्कन की जगह दुकानदार की गर्दन आ गई है। स्साला बदतमीज़। ऐसे में सवाल यही है कि खुद के ढक्कन समझे जाने और ढक्कन चबाने के अलावा क्या आपके पास कोई रास्ता नहीं है। मेरा मानना है कि अपने रवैए में तब्दीली ला कर हममें से हर कोई अपनी नौकरी बचा सकता है। कुछ ज़रूरी उपाय जो आप कल से ही ऑफिस में ट्राई कर सकते हैं।

1.अनुशासित कर्मचारी की पहली निशानी है कि वो वक़्त पर ऑफिस पहुंचे। अब आपको करना ये है कि पिऊन से पहली ऑफिस पहुंच जाएं। बॉस से शिकायत करें कि पिऊन देर से आता है। मुझे ऑफिस में ज़रूरी काम करना होता है। लिहाज़ा मेन गेट की चाभी मुझे दिलवा दें। कल से मैं ही ऑफिस का गेट खोल दिया करूंगा। बॉस कहे कि बिना डस्टिंग के आप बैठेंगे कैसे? तो फौरन कहिए, सर, उसकी चिंता मत करें। मैं खुद झाड़ू लगा दिया करूंगा। वैसे भी कोई काम छोटा नहीं होता। ऐसा कह कर आप बॉस को ये आइडिया भी दे सकते हैं कि पिऊन को अगर निकाल भी दें तो ये आदमी कम से कम झाड़ू तो लगा ही देगा। इस तरह ऑफिस को आपका 'अन्य इस्तेमाल' भी समझ में आ जाएगा। जबकि इतने सालों की नौकरी में कम्पनी को आपका 'किसी भी तरह का इस्तेमाल' समझ नहीं आया था।

2. काम से ज़्यादा ज़रूरी होता है काम करते प्रतीत होना। ऑफिस में आप भले ही तिनका न तोड़ें, लेकिन लगे ऐसे कि अगर आप एक भी दिन दफ्तर न आए तो पूरी इमारत भरभरा कर गिर पड़ेगी। ऑफिस के पूरे वातावरण में आप ही आप हो। किसी भी तरह की फालतू की फाइल हाथ में ले दिनभर यहां-वहां दौड़िए। अरे सर ये...अरे सर वो....करते यहां-वहां बेमतलब घूमिए। हर वक़्त टेंशन में दिखें। जल्दबाज़ी दिखाएं। दो मिनट से ज़्यादा अपनी सीट पर न बैंठे। पास जाने के बजाए किसी को दूर से पुकारें। इससे ज़बरदस्ती का हल्ला होगा। चार लोग आपकी आवाज़ सुनेंगे। छोटे से छोटा काम कर बॉस को बताएं...सर वो मैंने कर दिया था। ऐसा करने से आप बेहद सक्रिय दिखाई देंगे। बॉस से ज़्यादा बात करते प्रतीत होंगे। कुछ लोग आपसे खौफ भी खाने लगेंगे। इस तरह धीरे-धीरे आपकी झांकी जमने लगेगी।

3. दोस्तों कार्यक्षेत्र में छवि का विशेष महत्व होता है। मगर जान लें कि आपकी छवि का इस बात से कोई सरोकार नहीं होता कि आप ऑफिस में कैसा काम करते हैं। आपकी छवि बिल्कुल अलग कारणों से बनती हैं। जैसे भूल कर भी किसी से शास्त्रार्थ न करें। आपके ज्ञान की किसी को कोई ज़रूरत नहीं है। कभी ये बताने की कोशिश न करें कि मैं इतना जानता हूं। समझदार और जानकार लोगों को कोई पसंद नहीं करता। हर कोई अपने से मूर्ख के साथ रहकर खुश होता है। वो उनमें कभी हीनता का बोध पैदा नहीं करते। ये सोचने को मजूबर नहीं करते कि प्यारे इस दुनिया में ऐसा बहुत कुछ है जो अभी भी तुम्हें नहीं पता। इसके अलावा अच्छी छवि के लिए बहेद ज़रूरी है कि हर किसी से प्यार से बात करें। बदतमीज़ से बदतमीज़ आदमी के नाम के आगे 'जी' लगाएं। बोलें तो लगे कि जलेबियां तल रहे हैं। ज़ुबान में इतनी मिठास हो डायबिटिक लोग आपको देख रास्ता बदल लें। हर शब्द में इतना रस घोले कि आपके बोलते ही मक्खियां भिनभिनाने लगे, जैसे गन्ने के जूस की मशीन के पास भिनभिनाती हैं। ध्यान रहे कि ज़रूरी नहीं है कि बदतमीज़ के मुहं पर भी उसे बदतमीज़ कहा जाए। पीठ पीछे भी कहा जा सकता है।

4. हर कम्पनी ऐसे कर्मचारी को पसंद करती है जो ऑफिस के हित की सोचें। इसलिए हर समय ऐसे विचारों पर काम करें जिससे ऑफिस का भला हो सके। बॉस को कहिए सर सुबह-शाम की चाय बंद कर दीजिए। इससे भारी बचत होगी। लोगों परेशान न हो इसके लिए मैं ऑफिस आते समय केतली भर चाय साथ ले आऊंगा। मेरे साले की फैन की फैक्ट्री है। सस्ते फैन भी दिलवा दूंगा। बॉस कहेगा मगर रोज़-रोज़ तुम क्यों लाओगे। इतने में बाकी साथी नम्बर बनाने कूद पड़ेंगे। तय होगा कि हर बंदा हफ्ते में एक दिन चाय लाएगा। मगर आप सोच रहे हैं कि बीवी एक बार कहने पर मेरे लिए चाय नहीं बनाती तो पूरे ऑफिस के लिए क्यों बनाएगी। ऐसा है तो उसे समझाइए कि मासिक आय आती रहे इसलिए ज़रूरी है कि तुम साप्ताहिक चाय बनाती रहो। उम्मीद है आपकी ये बात तो वो मान ही जाएगी।

11 टिप्‍पणियां:

Nirmla Kapila ने कहा…

vyang badiya hai comment de hi doon kahin meri bhi apke blog se chhuti na ho jaye ab comments ki mandi me hame bhi sajag hona hi padega aabhar

कुश ने कहा…

dhansu idea diya hai neeraj bhai..

Udan Tashtari ने कहा…

haa haa!! मस्त सलाह है..मंदी के इस दौर में आप जैसे सलाहकारों की कितनी जरुरत आन पड़ी है एकाएक.

Udan Tashtari ने कहा…

बीवी मैट्रो समाचार भी पढ़ती है तो लगता है मैट्रीमोनियल में खुद के लिए रिश्ता ढूंढ रही है।

--बहुत कठिन निगाह है भाई!!

Udan Tashtari ने कहा…

३ साल पहले कुछ इन्हीं सलाहों पर कुण्डली रची थी, जब कभी फुरसत में हो (वैसे मंदी में फुरसत कैसी) तो देखना:

http://udantashtari.blogspot.com/2006/11/blog-post_10.html


:)

रंजना ने कहा…

हा हा हा हा.....क्या कहूँ...आनंद आ गया....लाजवाब लिखा है आपने.....यह व्यंग्य सही पर सत्य के बहुत निकट है....

लेकिन एक बात है ,आपके नायब नुस्खों को आजमाकर सचमुच आदमी नफे में रहेगा...

आलोक सिंह ने कहा…

हाहा बहुत अचछे मजेदार
:)

डॉ .अनुराग ने कहा…

देर से आने के लिए मुआफी....पर सच कहे.....कुछ आईडिया बड़े धाँसू है....

अनूप शुक्ल ने कहा…

शानदार उपाय! अब लगता है मंदी झेल ले जायेंगे। :)

Fighter Jet ने कहा…

bahut badhiya...behatarain !!!

Rakesh Jain ने कहा…

पहले पढ़ ली होती ये पोस्ट तो उस मंदी में कम से कम ५-६ की नौकरी तो बचा ही लेता..वैसे मैंने खुद की भी इन उपायों से ही बचाई थी..:)..