सोमवार, 17 अगस्त 2009

मशीनों की इंसानियत!

एक ज़माना था जब लोग मुझे पलट-पलट कर देखते थे और अब हालत ये है कि मैं खुद को अलट-पलट कर देखता हूं। गाल इतने फूल गए हैं कि आइने में सामने देखने पर कान नहीं दिखते और तोंद इतनी बढ़ गई है कि सीधे खड़े हो कर नीचे देखने पर पैर नज़र नहीं आते। डबल चिन कब की ट्रिपल चिन हो चुकी है। शरीर की ज्यामिति छिन्न-भिन्न हो चुकी है। सम्पूर्ण काया चिल्ला-चिल्लाकर खुद के कायाकल्प की मांग कर रही है। हुलिया न बदलने पर बीवी, पति बदलने की धमकी दे रही है। आख़िरकार काया की मांग और बीवी की धमकी से घबरा मैं जिम पहुंचता हूं।

जिम में जिस मशीन पर मैं दौड़ रहा हूं, उसके परिजनों ने उसका नाम ट्रेड मिल रखा है। इस पर दौड़ते आज मेरा छठा दिन है। पहले पांच दिन इस पर मैं पंद्रह से बीस मिनट दौड़ चुका हूं। हर बार दौड़ ख़त्म करने पर इसकी स्क्रीन पर लिखा आता है-कूल। मशीन के इस शिष्टाचार पर मुझे खुशी होती है। वह दौड़ने वाले को अपनी तरफ से कॉम्पलीमेंट देती है। उसका हौसला बढ़ाती है। मगर आज मैं दो-चार मिनट में ही रुक जाता हूं। डर है कि आज वो लानत देगी। पर आश्चर्य...दो मिनट दौड़ने के बावजूद सामने लिखा आता है-कूल। मुझे हैरानी है कि उसने बैड या पुअर जैसा कुछ नहीं कहा। बुरी परफॉरमेंस के बावजूद मेरा हौसला बढ़ाया। कोई फिटनेस ट्रेनर होता तो झाड़ लगाता। मगर मशीन ने ऐसा नहीं किया। मशीन ने क्या... उसे बनाने वालों ने उसे ऐसा करने की इजाज़त नहीं दी। उसकी प्रोग्रामिंग के समय इंसानी भावनाओं का ख़्याल रखा गया। हैरानी इस बात की है कि ऐसे समय जब हम इंसान के लगातार संवेदनाशून्य होने की बात कर रहे हैं, मशीनें बनाते समय ये ख़्याल रखा जाता है कि वो सभ्य बर्ताव करें। दो मिनट दौड़ने वाले शख़्स का भी ‘कूल’ कहकर हौसला बढ़ाएं।


ट्रेड मिल ही नहीं संस्कारों की ऐसी ही नुमाइश रेलवे स्टेशनों पर खड़ी वज़न तोलने वाली मशीनें भी करती हैं। वज़न के बारे में सच बोलना उनकी मजबूरी है। मगर आपके चरित्र-चित्रण से पहले वो ऐसी किसी मजबूरी को नहीं मानतीं। मेरा मानना है कि ऐसे लोग जिनके कान अपनी तारीफ सुनने को शताब्दियों से तरस रहे हैं वे शताब्दी एक्सप्रेस पकड़ने से पहले रेलवे स्टेशन पर वज़न कर लें। निजी जीवन में आप कितने भी घटिया, मक्कार और लीचड़ क्यों न हो, मगर वज़न का टिकट बताएगा कि आप एक नेकदिल,खुशदिल और अक्लमंद इंसान हैं। एक रूपये के एवज़ में ऐसी चापलूसी आपको पूरी दुनिया में कहीं सुनने को नहीं मिलेगी। आपके बारे में ऐसे विशेषणों का इस्तेमाल किया जाएगा जिनके इस्तेमाल की आपके दोस्तों ने कभी ज़रूरत महसूस नहीं की। एक पल के लिए आप भी इन विशेषणों को सच मान बैठते हैं। महाआलासी खुद की तारीफ में अनुशासित पढ़ बौरा जाता है। उसे लगता है कि मशीन के अलावा उसे आज तक किसी ने पहचाना ही नहीं।

यकीन मानिए दोस्तों, इसी तारीफ के लालच में गाडी का इंतज़ार करते हुए बचपन में मैंने एक साथ दस-दस बार अपना वजन किया। वज़न तो हर बार एक निकला मगर तारीफ अलग-अलग थी। कुछ बड़ा हुआ तो अक्ल आई कि मशीन ट्रेड मिल की हो या वज़न की, हौसला-अफज़ाई इसके संस्कारों का स्थायी हिस्सा है। भूलकर भी ये नहीं कह सकती कि तुम्हारे जैसा वाहियात आदमी मैंने आज तक नहीं देखा।

ऐसा ही कुछ हाल एटीएम मशीनों का भी है। इंसानों से पैसे लेते समय आप दसियों बार गिनने के बाद भी आश्वस्त नहीं हो सकते, मगर एटीएम मशीनें ऐसी गड़बडी नहीं करतीं। कम से कम मेरे साथ तो ऐसा आज तक नहीं हुआ। ईमानदारी इनके चरित्र की मुख्य विशेषता है। हो सकता है दस बार कहने पर बीवी आपको सुबह उठाना भूल जाए मगर अलार्म क्लॉक ऐसा आलस नहीं करती। मैट्रो में लगा ऑटोमैटिक सिस्टम कभी याद दिलाना नहीं भूलता कि अगला स्टेशन तीस हज़ारी है...दरवाज़े बाईं ओर खुलेंगे। सच...ये मशीनें संवेदनशीलता, ईमानदारी और अनुशासन का पर्याय बन गई हैं। लोग शिकायत करते हैं कि इंसान मशीनी हो गया है...पर मैं इंतज़ार कर रहा हूं कि इंसान ऐसा मशीनी कब होगा?

8 टिप्‍पणियां:

बी एस पाबला ने कहा…

भई ये तो हास्य-व्यंग्य नहीं है। इसलिए मैं भी गंभीरता से सोचते हुए बिना टिप्पणी के लौट रहा हूँ

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

सच है. अब इंसानियत मशीनों में मिलती है.
बहुत शानदार पोस्ट!

AlbelaKhatri.com ने कहा…

HA HA HA
MAZA AAYA.........
WAAH !

रंजना ने कहा…

बहुत बहुत सही कहा नीरज जी.....

लाजवाब !! विचारणीय,बहुत ही उम्दा पोस्ट के लिए आपका आभार.

Ram ने कहा…

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राकेश जैन ने कहा…

bandhu ! aapne sach kahaa ki machines are better than human now a days. responsibilities of courtesies also handed over to machines either it is true or false, machine always tells gud for human.

achha vishay. achha vyangya!Badhai

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

लेकिन इंसान है कि मशीनों से सीखने में विश्वास नहीं रखता.

मधुकर राजपूत ने कहा…

बहुत उम्दा, हास्य के माध्यम से सही विचार निकला है। उलटबांसी है। आधुनिक मशीन की तरह इंसान बनेगा तो विनम्र ज़रूर हो जाएगा।