बुधवार, 19 अगस्त 2009

असहनीय सम्मान!

अगर आप सम्मान के लायक हैं और सम्मान पाते रहते हैं तो कुछ वक़्त बाद इसकी लत पड़ जाती है। पैर, हर वक़्त छूए जाने के लिए फड़फड़ाते रहते हैं। हाथ, आशीर्वाद देने के लिए मचलते हैं। कान के पर्दे, तारीफ के बूटों से सजने के लिए बेकरार होते हैं। शहर से बाहर जाते समय ऐसे लोग तारीफ के ऑडियो कैसेट साथ ले जाते हैं। तारीफ न होने पर इनके मुंह से झाग आने लगता है। तारीफ के नशेड़ियों को हर घंटे उसकी निश्चित डोज़ चाहिए ही होती है।

मगर वहीं समाज में एक तबका मुझ जैसों का भी है जिनका कभी इज्ज़त से वास्ता नहीं पड़ता। इज्ज़तविहीन जीवन जीनें की जिन्हें आदत सी पड़ जाती है। मगर पिछले दिनों कुछ ऐसा हुआ की इज्ज़त न होने के बावजूद मैंने खुद को बेइज्ज़त महसूस किया। हुआ ये कि मुझे एक पोस्टकार्ड मिला। जिसका मजमून था, महोदय, आपकी साहित्यकला सेवा पर आपको हिंदी भाषा आचार्य की वृहद् मानद उपाधि देने हेतु विषय-विचाराधीन है। आपका परिचय, 2 चित्र रंगीन पासपोर्ट साइज, 2 रचना तथा ‘500 रूपये सहयोग शुल्क’ एमओ द्वारा भेजें। भवदीय...फलाना ढिमकाना।

पहली बात जो पोस्टकार्ड पढ़ मेरे ज़हन में आई वो ये कि ‘हिंदी भाषा आचार्य’ पुरस्कार की बात अगर मेरी दसवीं की हिंदी टीचर को पता लग जाए तो वो संस्था पर राष्ट्रभाषा के अपमान का केस कर दे। मेरी हिंदी का स्थिति तो ऐसी है कि शुरूआती रचनाएं इस खेद के साथ वापिस लौटा दी गई कि हम केवल हिंदी में रचनाएं छापते हैं!

दूसरा जो संस्था मेरी साहित्यकला सेवा (ऐसा गुनाह जो मैंने किया नहीं) के लिए मुझे सम्मानित करना चाहती है उसे मेरी दो रचनाएं क्यों चाहिए! क्या हिंदी भाषा आचार्य की यही पात्रता है कि जिस किसी ने भी हिंदी में दो रचनाएं लिखी हैं, वो इसका हक़दार है। इसके अलावा जो संस्था मुझे सम्मानित करने का दुस्साहस कर रही है आख़िर वो पांच सौ रूपये का सहयोग क्यों मांग रही है? किसी को व्हील चेयर का वादा कर आप उससे बैसाखियों के लिए उधार क्यों मांग रहे? मैं जानना चाहता हूं कि ‘तुम मुझे सहयोग(राशि) दो, मैं तुम्हें सम्मान दूंगा’ ये नारा आख़िर किस क्रांति के लिए दिया जा रहा है।

कहीं ऐसा तो नहीं कि जो कुछ और जैसा कुछ मैंने आज तक लिखा है उससे उन्होंने यही निष्कर्ष निकाला कि इतना घटिया लिखने वाला आदमी ही सम्मान के झांसे में पांच सौ रूपये दे सकता है! सोचता हूं कि मेरे लिखे से जिन्होंने मेरे चरित्र का अंदाज़ा लगाया अगर वो आर्थिक स्थिति का भी लगा पाते तो कम से कम उनके पोस्टकार्ड के पैसे तो बचते।

6 टिप्‍पणियां:

बी एस पाबला ने कहा…

ये भी खूब रही :-)

अर्शिया ने कहा…

Chintaneey.
( Treasurer-S. T. )

मधुकर राजपूत ने कहा…

भाई साहब आपने ज़ुर्म किया है घटिया लिखने का इसलिए आपसे बतौर ज़ुर्माना पांच सौ रुपये वसूले जा रहे हैं। क्योंकि आप घटिया लेखन से लोगों को हंसने पर मजबूर कर रहे हैं जिससे परोशानियों का महत्व कम हो रहा है। आदमी के जीवन से चिंतन शब्द हट रहा है और बिना चिंतन के विकास संभव नहीं है। पिछले बासठ साल से सरकारें चिंतन कर रही हैं और इस शब्द को जीवन चक्र से डिलीट करना चाहते हैं। आपसे तो करोड़ों की डिमांड करनी चाहिए थी।

रंजना ने कहा…

पांच सौ रुपये में आचार्यपाद.... सौदा बुरा नहीं है.......हाँ इसकी तफसीस जरूर कर लें कि कहीं ये रुपये गरम तवे पर पड़े पानी के पांच बूँद बन गायब न हो जाय....

वैसे सम्मान के भूख की जो बात आपने कही ,वह व्यंग्य नहीं व्यंग्यात्मक लहजे में कही गयी सच्चाई है....

बहुत बहुत आनंद आया पढ़कर....आभार आपका..

डॉ .अनुराग ने कहा…

सौदा बुरा नहीं फिर आप भी अपनी गाडी के आगे एक नेम प्लेट टांग सकते है ..या फिर ब्लॉग की साइड में...कुछ लोग तो रौब खा ही जायेगे

Udan Tashtari ने कहा…

पोस्टकार्ड इधर री-डायरेक्ट कर दो.. :)