शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

द ग्रेट इंडियन वेडिंग तमाशा!

ये मेरे मित्र की मति का शहादत दिवस है। आज वो शादी कर रहा है। मैं तय समय से एक घंटे बाद सीधे विवाह स्थल पहुंचता हूं, मगर लोग बताते हैं कि बारात आने में अभी आधा घंटा बाकी है। मैं समझ गया हूं कि शादी पूरी भारतीय परम्परा के मुताबिक हो रही है। तभी मेरी नज़र कन्या पक्ष की सुंदर और आंशिक सुंदर लड़कियों पर पड़ती है। सभी मेकअप और गलतफहमी के बोझ से लदी पड़ी हैं। इस इंतज़ार में कि कब बारात आए और वर पक्ष का एक-एक लड़का खाने से पहले, उन्हें देख गश खाकर बेहोश हो जाए।

इस बीच ध्वनि प्रदूषण के तमाम नियमों की धज्जियां उड़ाती हुई बारात पैलेस के मुख्य द्वार तक पहुंचती है। ये देख कि उनके स्वागत में दस-बारह लड़कियां मुख्य द्वार पर खड़ी हैं, नाच-नाच कर लगभग बेहोश हो चुके दोस्त, फिर उसी उत्साह से नाचने लगते हैं। किराए की शेरवानी में घोड़ी पर बैठा मित्र पुराने ज़माने का दरबारी कवि लग रहा है। उम्र को झुठलाती कुछ आंटियां सजावट में घोडी को सीधी टक्कर दे रही हैं। और लगभग टुन्न हो चुके कुछ अंकल, जो पैरों पर चलने की स्थिति में नहीं हैं, धीरे-धीरे हवा के वेग से मैरिज हॉल में प्रवेश करते हैं।


अंदर आते ही बारात का एक बड़ा हिस्सा फूड स्टॉल्स पर धावा बोल देता है। मुख्य खाने से पहले ज़्यादातर लोग स्नैक्स की स्टॉल का रुख करते हैं। मगर पता चलता है कि वो तो बारात आने से पहले ही लड़की वालों ने निपटा दीं। ये सुन कुछ रिश्तेदारों को आनन्द आ जाता है। इतना मज़ा शायद उन्हें गोभी मंचूरियन खाने में नहीं आता, जितना ये सुन कर आया। बाकी लोग खाने की स्टॉलस की तरफ लपकते हैं। एक प्लेट में सब्ज़ियां, एक में रोटी। फिर भी चेहरे पर अफसोस है कि ये प्लेट इतनी छोटी क्यों है? कुछ का बस चलता तो घर से परात ले आते। कुछ पेंट की जेब में डाल लेते।

खाते-खाते कुछ लोग बच्चों को लेकर परेशान हो रहे हैं। भीड़ की आक्रामकता देख उन्हें लगता है कि पंद्रह मिनट बाद यहां कुछ नहीं बचेगा। बच्चा कहीं दिखाई नहीं दे रहा। मगर उसे ढूंढने जाएं भी तो कैसे...कुर्सी छोड़ी तो कोई ले जाएगा। या तो बच्चा ढूंढ लें या कुर्सी बचा लें। इसी कशमकश में उन्हें डर लगने लगा है कि कहीं वो सगन के पैसे पूरे कर भी पाएंगे या नहीं। उनका नियम है हर बारात में सौ का सगन डाल कर दो सौ का खाते हैं। मगर लगता है कि आज ये कसम टूट जाएगी।

वहीं कोने में दो आंटियां हाथ में अमरस का गिलास थामे निंदा रस का आनन्द ले रही हैं। वो चुन-चुन कर व्यवस्था में से कीड़े निकाल रही हैं। एक को मैरिज हॉल पसंद नहीं आया तो दूसरी को खाना। वो भारी गुस्से में हैं। उनका बस चले तो अभी लड़की वालों को खा जाएं। मगर मैं देख पा रहा हूं कि इस बुराई में वो एक सुकून भी महसूस कर पा रही हैं। जिस अव्यवस्था से उन्हें तकलीफ हुई है...लगता है वो उस तकलीफ के लिए अरसे से तरस रही थीं।

तभी अचानक कुछ लोग गेट की तरफ भागते हैं। पता चलता है कि लड़के के फूफा किसी बात पर नाराज़ हो गए हैं। दरअसल, उन्होंने वेटर को पानी लाने के लिए कहा था, मगर जब दस मिनट तक पानी नहीं आया तो वो बौखला गए। दोस्त के पापा, चाचा और बाकी रिश्तेदार फूफा के पीछे पानी ले कर गए हैं। इधर मैं देखता हूं कि लड़की के परिवारवाले बिना किसी कसूर के ही शर्म से पानी-पानी हो रहे हैं।

8 टिप्‍पणियां:

Raviratlami ने कहा…

आज सुबह भास्कर में इसे पढ़ा. कल ही एक शादी से लौटा था,
इसलिए इसका जीवंत चित्रण पढ़ कर और मजा आया. बेहद कसा हुआ, तरलता से चलता हुआ, मगर बांध कर रखने वाला व्यंग्य.

A. Arya ने कहा…

वाह, मज़ा आगया, एक सजीव चित्रण

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

sach ko vyangya ka roop dekar achchha kataksha kiya hai, bahut sajeev aur sateek vyangya prastut karne ke liye badhai.

निर्मला कपिला ने कहा…

आज कल शादियों का सीजन चल रहा है रोज़ यही कुछ देखते हैं हद तो तब हो गयी जब ब्लोग पर भी यही पढना पड रहा है वैसे मस्त पोस्ट है शुभकामनायें

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

लाउडस्पीकर बंद ही कर देने चाहिए.
लाउडस्पीकर से बड़ी nuisance कोई और नहीं हो सकती.
यह AIDS और कैंसर से भी घातक है.
सुबह-सुबह पगलाए से धार्मिक उन्मादी इनमें चिल्लाने लगते हैं.
अखंड-जागरण टाइप लोग जीना दूभर कर देते हैं.
पंडालिए मौज करते हैं.
टुन्न बाराती इनके शोर में धमाचौकड़ी करते हैं...मरीज और विद्यार्थी जाएं भाड़ में..
लाउडस्पीकर यदि किसी को प्रयोग करना ही हो तो हाई-कोर्ट से आदेश लेकर आना चाहिए.

Fighter Jet ने कहा…

ha ha ha ha ....bahut badhiya..maza aa gaya

रंजना ने कहा…

Aapse aisi ummeed na thi...lagta hai ekdam hadbadi me the ise likhte samay tabhi to itne sankshep me ise nipta diya...are aapke kalam se to poora byora aan chahiye tha....aanandm aanandam ho jata fir to...

Chaliye fir bhi itne ke liye bhi kam dhanyawaad ke paatra aap nahi hai....lajawaab vivran prastut kiya hai...waah !!!

नीरज बधवार ने कहा…

रंजना जी कॉलम की शब्द-सीमा के चलते मजबूर था। यकीनन इस विषय पर और भी काफी कुछ लिखा जा सकता है। खैर कभी और किसी और रूप में विस्तार दूंगा।

नीरज बधवार