शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

एंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी चाहेगा!

यह रविवार की एक औसत सुबह है। रिमोट को सारथी बना मैं टीवी पर कुछ सार्थक ढूंढ़ रहा हूं। पर ज़्यादातर टीवी कार्यक्रम मेरी सुबह से भी ज़्यादा औसत हैं। धार्मिक चैनलों पर बाबा महिलाओं को शांति और संयम का पाठ पढ़ा रहे हैं। न्यूज़ चैनल बता रहे हैं कि कैसे एक बाबा ने संयम का पाठ पढ़ने आई शिष्या को एक्सट्रा क्लास देने की कोशिश की। वहीं मनोरंजन चैनल्स पर सास-बहुएं एक-दूसरे को नीचा दिखाने के ऊंचे काम में लगी हैं, दूसरों का खून पी अपना हीमोग्लोबीन बढ़ा रही हैं। कल्पना के कैनवस पर हर क्षण षड्यंत्रों के दृश्य उकेर रही हैं। कभी-कभी हैरानी होती है कि धारावाहिकों में जिन परिवारों की कहानी देख हम अपना मनोरंजन करते हैं, खुद उन परिवारों में कितना तनाव है! आखिर क्या वजह है कि दूसरे का तनाव हमें आनन्द देता है। किसी का झगड़ा देख हम एंटरटेन होते हैं। क्या हम इतना गिर गए हैं...हमारे पास कुछ और काम नहीं बचा...इससे पहले कि मैं किसी महान् नतीजे पर पहुंचता, मुझे बाहर से झगड़ने की आवाज़ सुनाई देती है।

टीवी बंद कर मैं बालकनी में आता हूं। सोसायटी के दूसरे छोर पर एक महिला ज़ोर-ज़ोर से चीख रही है। उसके सास-ससुर बालकनी में चिल्ला रहे हैं तो वो अपार्टमेंट के नीचे। झगड़े के सुर के साथ-साथ दर्शकों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। शादी के निमंत्रण पत्र की तर्ज पर लोग ‘सपरिवार’ बालकनी में आ गए हैं। बीवी भी गैस बंद कर बाहर आ गई है। मैं कॉन्‍संट्रेट करता हूं मगर कुछ समझ नहीं पा रहा हूं। जो शब्द कान में पड़ रहे हैं, उनसे मेरी पहचान नहीं है। बीवी कहती है...साउथ इंडियन हैं... तमिल या तेलुगू में झगड़ रहे हैं। मुझे खीझ चढ़ती है। अपनी बेबसी पर रोना आता है। ऐसा लगता है कि बिना सबटाइटल के रजनीकांत की कोई एक्शन फिल्म देख रहा हूं। मैं आपा खोने लगता हूं। सोचता हूं कि नीचे जाकर उनसे इसी बात पर झगड़ूं। कहूं कि इतने लोग बीवी-बच्चों समेत तुम्हारा झगड़ा देख रहे हैं। खुद मेरी बीवी ने दो बार अपनी मां तक का फोन नहीं उठाया। बच्चा आधे घंटे से नाश्ते के लिए रो रहा है। हम लोग क्या पागल हैं जो तुम्हारे चक्कर में अपना संडे ख़राब कर रहे हैं। झगड़ना है तो हिंदी में झगड़ो। वरना अंदर जाकर लड़ो-मरो।

मगर इससे पहले कि मैं नीचे जाने के लिए चप्पल खोजता, महिला गाड़ी स्टार्ट कर वहां से चली गई। ये देख पूरी सोसायटी में निराशा छा गई। मैं भी भारी अवसाद में था। अंदर आया। टीवी चलाया। वही सास-बहू के सीरियल वाले झगड़े। फिर वही ख़्याल...यार, ये लोग हमेशा झगड़ते क्यों रहते हैं...लोगों को इनका झगड़ा देखने में मज़ा भी क्या आता है मगर मन में यही बात फिर दोहराई तो शर्म आने लगी।

यह सच है कि सीरियल के न सही, पर असल झगड़े देखने में मुझे भी खूब आनन्द आता है। मगर गुस्सा तब आता है, जब ये झगड़े अंजाम तक नहीं पहुंचते। दिल्ली में ब्लू लाइन के सफर के दौरान मैंने सैंकड़ों झगड़े देखे। कंडक्टर ‘सवारी’ से टिकट लेने के लिए कहता। वो बाद में लेने की ज़िद्द करती। फिर लम्बी बहस होती। सामर्थ्य के मुताबिक सुर ऊंचा किया जाता। संस्कारों और सामान्य ज्ञान के आधार पर बेहिसाब गालियां दी जाती। ये देख रूटीन लाइफ से बोर हो चुकी ‘सवारियों’ की आंखों में चमक दौड़ जाती। सब को लगता कि अब झगड़ा होगा। कुछ एक्साइटिंग देखने को मिलेगा। दोस्त-यारों को सुनाने के लिए एक किस्सा मिलेगा। मगर अफसोस...तभी नई सवारियां चढ़ने के साथ बात आई-गई हो जाती। इन सालों में न जाने ऐसी कितनी ही बहसें, जिनमें झगड़ा बनने की पूरी संभावना थी, मेरी आंखों के सामने आई-गई हुई हैं। मगर मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी है। यह स्वीकारने में मुझे कोई शर्मिंदगी भी नहीं है। आख़िर इंसान मूलतः है तो जानवर ही जो सभ्य बनने की कोशिश कर रहा है। अब इस कोशिश से बोर हो, वो और उसके भीतर का जानवर कभी-कभार झगड़ा देख, मनोरंजन करना चाहें, तो क्या बुराई है! एंटरटेनमेंट के लिए जब कुछ भी करने में हर्ज नहीं, तो चाहने में क्या प्रॉब्लम है!

(नवभारत टाइम्स 10,सितम्बर,2010)

9 टिप्‍पणियां:

कुश ने कहा…

नवभारत पे ही पढ़ लिए थे नीरज भाई.. गज़ब धांसू कहूँगा इसे तो..
अच्छा हुआ कि आप तेलेगु में नहीं लिखते.. वरना हमारे मनोरंजन का क्या होता..?

Majaal ने कहा…

एक नुक्कड़ नुमा ब्लॉग में आपने, आपकी ही रचना, अपने ही नाम से, ठीक इसी समय छपवा मारी है. ज्यादा फुर्सत हो तो अपने आप पर ही कॉपीराईट का मुकदमा दायर कर दोनों तरफ से खुद की लड़ मरे. समय भी अच्छा कटेगा और नया अनुभव भी प्राप्त होगा...

मधुकर राजपूत ने कहा…

झगड़ों ने इतिहास रचा है। इंसान की फितरत रही है कि झगड़ों का विश्लेषण और उनकी युद्ध कला के नक्शे खींचकर वो झगड़ों के बाद भी उनका आनंद लेता रहता है। फिर आप तो लाइव देखने वालों को लताड़ रहे हो। मानवीय स्वभाव कैसे बदलेगा।

मधुकर राजपूत ने कहा…

सही कहा, लेकिन झगड़ों ने इतिहास रचा है। मानव आज तक उन ऐतिहासिक झगड़ों का विश्लेषण कर युद्ध कला के नक्शे खींचकर उनका आनंद आज तक लेता है और आप लाइव देखने वालों को लताड़ रहे हो, उनकी हरकतों से हैरत में हो। मानवीय स्वभाव झगड़रस लेने का है, बदलेगा नहीं। हां युद्धों की परिणति के कमजोर होते जाने पर खेद जताया जा सकता है।

AlbelaKhatri.com ने कहा…

waah !

SKT ने कहा…

बहुत ही बढ़िया व्यंग्य लिखा है नीरज भाई...पढ़ कर आज तो सच में पेट का पानी हिल गया!

नीरज बधवार ने कहा…

अच्छे शब्दों के लिए सभी का शुक्रिया...कुछ दोस्तों ने यहां भी अपनी राय दी हैhttp://nukkadh.blogspot.com/2010/09/blog-post_2592.html#comments

भोर ने कहा…

सुबह चाय की दुकान पर नवभारत टाईम्स पढ़ने को मिल गया था. सचमुच कितनी सधी धार है न, आपकी लेखनी की।

Virender Rawal ने कहा…

mazedar post neeraj bhai