मंगलवार, 15 अप्रैल 2008

रूकें, पढ़ें और बताएं, क्या आपने इन्हें कहीं देखा है!

हिंदी सीरियल्स देखते वक्त मेरे ज़हन में अक्सर ये बात आती है कि ये परिवार जो यहां दिखाया गया है ये देश के किस राज्य के, किस ज़िले के, किस शहर के, किस मोहल्ले में रहता है। जहां भी रहता है, उससे मिल कर मैं कुछ सवाल करना चाहता हूं। इसी चक्कर में मैंने काफी धक्के भी खाये। मगर परिवार मेरे हाथ नहीं लगा। खैर, ये सवाल आप से शेयर करना चाहता हूं। अगर परिवार या इस का कोई सदस्य आपसे मिले तो उससे ज़रुर पूछियेगा।

पेश हैं कुछ मासूम सवाल-

सच-सच बताना तुम लोग जन्म लेते हो या आर्डर दे कर बनवाये गये हो। लगता तो यही है परिवार के सभी सदस्य आर्डर दे कर बनवाये गये हैं और वो भी किसी कवि की निगरानी में। हमारे यहां तो ढूंढने पर पूरे मुहल्ले में एक ढंग की लड़की नहीं दिखती और तुम्हारे घर में एक से एक..............चलो छोड़ो। और बावजूद उसके घर में कोई ब्लैंक कोल नहीं आती। जहां एक खूबसूरत लड़की रहती है वहां दिन में कम से कम 15-20 ब्लैंक काल्स तो आती ही हैं।


तुम में से कोई मुझे एलजी या जनता फलैट्स में रहता क्यों नहीं दिखता? यहां तो साला दो कमरों का मकान किराये पर लेने में जान निकल जाती है। लेकिन तुम्हारे घर देख विश्वास करना मुश्किल है कि तुम घर में रहते हो या धर्मशाला में ! इतनी लम्बी गैलरी। लोबी के बीचो-बीच सीढ़ियां। जहां देखों कमरे ही कमरें। इसके बावजूद एक भी किरायेदार नहीं। एक-आध कमरा तो कम-से-कम किराये पर चढ़ाओ।

घर की बीचों-बीच जो डाइनिंग टेबल पड़ी रहती है उसे लेकर भी तुम मुझे जवाब दो। जानते हो तुम्हारी इस डाइनिंग टेबल ने हम भारतीय कितनी हीनता का शिकार हुए हैं। जब भी तुम लोगों को वहां खाना खाते देखते हैं तो दिल करता है कि हम भी परिवार के साथ ऐसे ही खाना खायें। मगर क्या करें.....हमारे घर में डबल बैड रखने की जगह नहीं.....डाइनिंग टेबल कहां रखे ? दूसरा डाइनिंग टेबल ले भी आयें तो हमें इतनी तमीज़ नहीं है कि टेबल पर कैसे खाया जाता है ? हमें तो रजाई में बैठ के खाने की आदत है।


बिना किसी काम-धाम के तुम लोग घर में इतने लिपे-पूते क्यों रहते हो ? क्या सोचते हो कि कहीं कोई बारात का न्यौता न आ जाये। घर में औरतें कद्दू भी काटती हैं तो शिफोन की साड़ी में। यार कुछ तो कपड़े की ग्रेस का ख्याल रखो ? कहीं जाना नहीं तो पजामा पहन के बैठो।


प्रिय, क्या तुम्हारे यहां बिजली का बिल नहीं आता। आता है तो इतने फानूश क्यो लगा रखे हैं ? लगा भी रखे हैं तो हर वक्त जला कर क्यों रखते हो ? किसके लिए इतना दिखावा ? मैंने तुम्हें बिजली का बिल भरने जाते भी कभी नहीं देखा। मुझे लगता है तुमने गली के खम्भे में कुंडी मार रखी है। इसीलिए इतने बेफिक हो। वरना तुम कभी तो घर वालों पर चिल्लाते दिखते.....'देख रहो हो इस बार कितना बिल आया है। सौ बार कहता हूं......कमरे से निकलो तो पंखा बंद कर दो।'

वैसे तो तुम हर मुद्दे पर झगड़ते दिखते हो। लेकिन मैंने तुम लोगों को कभी रिमोट के लिए झगड़ते नहीं देखा। जबकि हर भारतीय घर में 69 फीसदी झगड़े तो रिमोट और पसंद का चैनल देखने के लिए ही होते हैं। तुम्हारे पति को भी तुम्हें कभी इस बात पर डांटते नहीं देखा कि क्या ये हमेशा रोने-धोने वाले नाटक देखती हो। ये सब लो-आईक्यू वाले लोग देखते हैं। चलो डिस्कवरी चैनल लगा दो।

अपने बुज़ुर्गों को सुन्दरता और अमरता का तुम कौन-सा घोल पिलाते हो। किस कम्पनी का च्वयनप्रास खाते हैं वो। प्लीज़ मुझे बताओ। न मैने उन्हें कभी खांसते देखा, न हांफते। न किसी की ज़बान लड़खड़ाती है न किसी को ऊंचा सुनता है। सब एक दम हट्टे-कट्टे। हफ्ते-दर-हफ्ते और निखरते जाते हैं। सब की डॉयलग डिलीवरी भी कमाल की है। किसी के एक्सैंट से नहीं पता चलता कि ये पंजाबी है ? मराठी है ? या बंगाली ? सब शुद्ध ख़ालिस नुक्तों की ज़बान बोलते हैं।

स्वामी दयानंद सरस्वती आज ज़िदा होते तो खूब नाराज़ होते। विधवा विवाह को लेकर जो लिबर्टी उन्होंने तुम्हें दिलवाई, उसका तुम ऐसा हश्र करोगी ये उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा। पति की कार अगर खाई में गिरी है, पहले कम-से-कम कन्फर्म तो कर लो कि वो मरा के नहीं। इधर वो मरा नहीं, उधर लगी तुम अखबारों में वर ढूंढनें। तुम शादी कर लेती हो। सम्पूर्ण श्रद्धा से नये पति की हो जाती हो। बच्चा भी होने को है। और ठीक उसी समय तुम्हारा पहला पति, जो लगता है ये सब होने के इंतज़ार में बैठा था, उसी वक़्त आ धमकता है। हैरानी की बात ये है कि तुम हर सीरियल में ये ग़लती करती हो।

बड़े घर, बड़ी गाडी और बड़े मुंह के अलावा तुम लोगों के घाटे भी बड़े-बड़े होते हैं। मिस्टर कपूर और मिस्टर थापा को कभी 5 करोड़ से कम का घाटा नहीं लगता। केबल वाला ढाई सौ से तीन सौ रूपये कर देता है हम लोग केबल कटवा लेते हैं। रिक्शे वाले से दो-दो रूपये के मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। मगर तुम्हारी....तुम्हारी तो बात ही निराली है। हाय! क्या हमे भी कभी पांच करोड़ का घाटा होगा या हम यूं ही आलू-प्याज के मौल-भाव में ही मर जायेंगे !

13 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत अच्छी पोस्ट लिखी हे हम तो सिर्फ़ सोचते ही हे, कि यह सब कोन सी दुनिया के जानवर हे, ओर आप ने दिल खोल कर लेख भी लिख दिया, सच बहुत अच्छा लगा, आंईदा भी ऎसे धासू लेखः लिखते रहे, वेसे मेने आज तक एक भी नाटक नही देखा.

neeraj badhwar ने कहा…

राज भाई पोस्ट पसंद करने के लिए शुक्रिया। ईमानदारी की बात तो ये है कि मैंने भी ये नाटक कभी नहीं देखे। बस-चलते फिरते जो इम्प्रेशन मिला उसी पर लिखा है।

आनंद ने कहा…

इनके घर देखकर तो मैं भी बड़ा हैरत में पड़ जाता हूँ। नौकरानी एक ही होती है वह भी घरेलू पॉलीटिक्‍स में इंगेज रहती है फिर इस घर की साफ सफाई कौन करता होगा?

मज़ा आ गया पढ़कर :)

Udan Tashtari ने कहा…

आनन्द आ गया पढ़कर, बढ़िया.

Rajesh Roshan ने कहा…

हँसी आ रही है नीरज भाई. कमाल की पोस्ट है.

Dr.Parveen Chopra ने कहा…

नीरज जी, आप का लेख पढ़ कर बहुत ही अच्छा लगा। सचमुच आप ने जो कुछ आज हम लोगों को परोसा जा रहा है उस का सजीव चित्रण कर दिया है। मैं यही सोच रहा था कि जल्दी जल्दी से भी सोचूं तो मुझे हम लोग जैसा कोई सीरियल बाद में कभी दिखा ही नहीं। उस के सभी किरदार हमारे अपने घरों में, हमारे ऱिश्तीदारी में , हमारे अड़ोस-पड़ोस में ... सभी जगह दिखते हैं. उन से हम लोग आइंडैंटीफाय़ कर सकते थे। लेकिन अब तो क्या लिखें.....वैसा आप का लेख पढ़ने के बाद और कुछ लिखने को रह ही नहीं गया...सोच रहा हूं इतना बढ़िया लेख है कि प्रिंट आउट निकाल कर सब को पड़वाऊंगा........समस्या आज कल से सीरियल्स में यह भी तो हो गई है कि हीरो के साथ जो औरत चल रही होती है ....यही समझ में नहीं आता कि उस की अम्मा है कि जोरू !! दादीयां भी कौन सी कम चिकनी दिखती हैं....हर एपिसोड में निखरती जाती हैं....आप ने सही पूछा कि आखिर कौन सा कावा इन बुजुर्गौ को पिलाते हो कि ना तो ये कभी खांसे,और न ही ये कभी अपने मेक-अप को ज़रा सा भी हिलने दें।
तो, आप की इस पोस्ट ने इस दुपहिरी में खूब हंसाया। धन्यवाद।

rakhshanda ने कहा…

ekdam sahi likha hai,mujhe to nafrat hai in bakvaas draamon se...

निशाचर ने कहा…

भाई जान एक बात और- न तो कभी इनका पेट ख़राब होता है और ना ये कभी संडास जाते है , और अगर कभी जाते भी होंगे तो शायद ये सूट बूट में ही फारिग होते होंगे. इनका नौकर भी मुझसे अच्छे कपडे पहनता है. इनके शहरों के अस्पताल पांच सितारा होटल लगते हैं और रेल में सफर करते तो इन्हें कभी देखा ही नहीं........... और क्या - क्या बताऊँ बस जी चाहता है कि टी. वी. पटक दूं........... या कहीं से एक बंदूक मिल जाये तो............

भुवनेश शर्मा ने कहा…

भौत सही लपेटा है गुरू

मेरा बस चले तो एकता कपूर की सुपारी दे दूं और जी, सोनी और स्‍टार पर बैन लगा दूं.

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

सारे के सारे सही सवाल हैं, नीरज. बहुत खूब लिखा है. वाह!

सागर नाहर ने कहा…

कमाल कर दिया आपने... मैने भी इस विषय पर एक लेख लिखा था परन्तु आप जिस तरह लिख सके मैं नहीं।
एक बार इसे भी देखें
हमारे धारावाहिक

हरिमोहन सिंह ने कहा…

गुरू दिमाग चूमने का मन कर रिया है

कुश एक खूबसूरत ख्याल ने कहा…

ये लेख पढ़ते ही मैने खोजना शुरू किया.. अभी तक तो मिला नही ऐसा परिवार.. मिलते ही पहली फुर्सत में आपको सूचित करूँगा.. गुदगूदाया लेख ने.. बधाई