शुक्रवार, 18 अप्रैल 2008

क्रांतिकारी की चप्पल! (हास्य-व्यंग्य)

वो अलस्सुबह दस बजे उठता है। मुंह-हाथ धोता है, जिसे वो नहाना ही समझता है। केतली-भर चाय बना बिस्तर पर बैठता है। पहले अख़बार पढ़ता है। फिर दर्शन का रुख करता है। गुरजेफ से लेकर जिब्रान तक सब पढ़ता है। वो पढ़ता जाता है और उसका तापमान बढ़ता जाता है।

दोपहर होते-होते भुजायें फ़ड़कनें लगी है। भेजे के कुकर में विचारों की बिरयानी हद से ज़्यादा उबल चुकी है, रग-रग में सीटियां बज उठी हैं। उसे उल्टी करनी है। लेकिन कहां जाये? ढक्कन कैसे खोले ? दोस्त तो सभी नौकरियों (जो उसकी नज़र में छोटी) पर गये हैं।

हताशा में वो टीवी चलाता है। ख़बरिया चैनल पर रुकता है। जहां 'आज़ादी के हासिल' पर चर्चा हो रही है। इसे ख़ुराक मिल गई। लेकिन, दो मिनट में तीनों विचारक खारिज। ये सब किताबी बातें हैं, इनमें से कोई ज़मीनी हक़ीकत से वाक़िफ नहीं। वो गुस्से में 7388 पर एसएमएस करता है। सोचता है एंकर अभी मैसेज पढ़ कहेगा वाह! क्या कसीली बात लिखी है। वो इंतज़ार कर रहा है, बिना जाने की ये रिपीट टेलिकास्ट है!

इस बीच बहस बिजली समस्या की तरफ मुड़ती है। वो सीधा होता है, वॉल्यूम बढ़ाता है....सत्यानाश......तभी बिजली चली जाती है। लानत है....हासिल की बात करते हैं, 'ये' हासिल है ... बिजली की समस्या पर चर्चा सुनने लगो तो बिजली चली जाती है!

ईश्वर, तू ही बता आख़िर क्या कसूर था मेरा ? तेंदूखेड़ा की बजाय मैं टोरांटो में क्यूं नहीं जन्मा ? बर्गर की जगह भिण्डी क्यूं लिखी मेरी किस्मत में ? लेकिन, तभी उसे रंग दे बसंती का डायलॉग याद आता है, सिस्टम से समस्या है तो शिकायत मत करो, उसे बदलने की कोशिश करो। वो खड़ा होता है...सोचता है....बहुत हुआ....मैं जा रहा हूं अज्ञानता का अंधकार मिटाने, ज्ञान के दीप जलाने, होम का मोह छोड़, दुनिया के लिए खुद को होम करने।

लेकिन, ये क्या....कहां हो तुम....यहीं तो थी....कहां चली गई......यहां-वहां हर जगह ढूंढ़ा... नहीं मिल रही...ख़्याल आया..कहीं छोटा भाई तो नहीं पहन गया...हां, वही पहन गया होगा...उसे तो मैं...

देखते ही देखते माहौल और मूड बदलने लगा है। देश को बदल देने की 'महत्वाकांक्षा' , भाई को देख लेने की 'आकांक्षा' में तब्दील हो गई है। क्रांतिकारी का भाई, जो ज़रा नीचे दही लेने गया है, नहीं जानता कि उसने देश की उम्मीदों की दही कर दी। नाउम्मीद हुआ क्रांतिकारी फिर से बिस्तर पर जा लेटा है। तापमान गिरने लगा है, जोश भाप बन उड़ चुका है। और इस मुल्क की तक़दीर 'एक बार फिर' इसलिए नहीं बदल पाई क्योंकि क्रांतिकारी को उसकी चप्पल नहीं मिली!

8 टिप्‍पणियां:

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

lajwaab

गुस्ताखी माफ ने कहा…

वाकई लाजबाब है.
लेकिन आप कमेन्ट्स में से वर्ड वेरिफिकेशन को हटा दें. अनेकों कमेन्ट्स इस कारण से आपके ब्लाग पर नहीं आ पाते हैं.

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

बहुत खूब...

परसाई जी ने लिखा था; "क्रांति की बिल्ली बासी रोटी खा लेती है"...लेकिन बासी रोटी के अलावा चप्पल भी क्रांति के आड़े आता है, ये आज ही पता चला..

Udan Tashtari ने कहा…

अब बताईये-एक चप्पल से!! इसी लिये तो पूजी जाती हैं पादुकायें. :)

राज भाटिय़ा ने कहा…

क्रांतिकारी ? तभी तो मे भी सोचु क्रांतिकारीयो का अकाल क्यो पड गया,जब इतनी बडी बडी रुकाबटे आये गी तो ....

Sapphire ने कहा…

lage raho neeraj bhai.
Achha likhte ho.Taraki karoge

हरिमोहन सिंह ने कहा…

क्‍या आपबीती है मान गये आपको

कुश एक खूबसूरत ख्याल ने कहा…

वाह क्या व्यंग्य है.. लाजवाब..