शुक्रवार, 5 मार्च 2010

लिपस्टिक की लेडीफिंगर समझने की मुश्किल!

आम आदमी और आम बजट की शायद यही नियति है। हमेशा उम्मीद की जाती है कि शायद अब ये संघर्ष कर खुद को ख़ास बना लें, लेकिन नहीं। बजट और आदमी ने खुद के आम होने को स्वीकार कर लिया है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है। इतनी बार छले जाने के बावजूद आम आदमी ने बजट से फिर उम्मीद लगा खुद को आम साबित किया, और बजट ने फिर से आम आदमी को कुछ न दे, खुद को ख़ास होने से बचा लिया। वहीं, आम आदमी के नाते बजट की इस बेरूखी पर मैं भारी गुस्से में हूं। समझ नहीं पा रहा हूं क्या करूं? फिर सोचा क्यों न सीधे वित्त मंत्री से मुलाकात कर उनसे अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करूं। लिहाज़ा वक्त लेकर मैं उनसे मिलने पहुंचा...उनसे जो बातचीत हुई उसका ब्यौरा नीचे दे रहा हूं। गौर फरमाएं-

मैं- सर,जो बजट आपने दिया है उससे आम आदमी की हालत पहले से कहीं ज्यादा ख़राब हो गई है...वो मरणासन्न हालत में पहुंच गया है। वित मंत्री-देखिए, मुझे पता था ऐसा होने वाला है तभी हमने दवाओं के दाम कम कर दिए हैं, चिकित्सा उपकरण सस्ते कर दिए हैं इसलिए आम आदमी बेफिक्र हो अपना इलाज करवाए और इलाज के बाद अगर उसे कमज़ोरी महसूस हो तो वो घर बैठे जितना चाहे उतना जूस पीए, हमने जूसर भी सस्ते कर दिए हैं।

मैं-वो क्या जूस पीएगा सर, जूस तो आपने उसका निकाल दिया है पैट्रोल महंगा कर के? वित्त मंत्री-देखिए, भारत की सत्तर फीसदी आबादी आज भी गांवों में रहती है और जहां तक मेरी जानकारी है खेत तक जाने के लिए किसान कार या मोटसाइकिल का इस्तेमाल तो करते नहीं, लान्ग ड्राइव पर जाने का उन्हें कोई शौक है नहीं, और रही बेकारी और भूखमरी से परेशान होकर आत्महत्या करने की बात, तो गांवों में आज भी पेड़ से लटक कर मरने का रिवाज़ है। पैट्रोल छिड़क कर प्राण देना तो निहायत ही सामंती और शहरी तरीका है!


मैं- और एक इल्ज़ाम आप पर ये भी है कि राहत देना तो दूर आपने आम आदमी से उसका फर्स्ट्रेशन निकालने का हक़ भी छीन लिया है। वित्त मंत्री-समझा नहीं। मैं- सर, आप शायद जानते नहीं इस देश में आम आदमी सालों से तम्बाकू, गुटखा खाकर अपनी कुंठा निकाल रहा है...नेताओं को ज़रदा समझ उन्हें दांतों तले कच्चा चबा रहा है और सिगरेट के धुंए में हर फिक्र धुंआ कर उसे उड़ाता आ रहा है, मगर आपने तो फिक्र को धुंए में उड़ाना तक महंगा कर दिया है! वित्त मत्री-ये इल्ज़ाम भी सरासर ग़लत है। मुझे नहीं लगता कि बातें करने से ज़्यादा किसी और तरीके से कुंठा निकली जा सकती है, इसीलिए हमने मोबाइल फोन सस्ते किए हैं। हर तरफ से थका-हारा इंसान दोस्तों से गपबाज़ी कर अपना मन हल्का कर सकता है, कॉ़ल रेट्स तो कम हैं ही, ऐसे में यारों के साथ पुराने दिन रीकॉल कर खुश हुआ जा सकता है!

मैं-मगर सर, ऊपर से इंसान खुश होने का कितना भी दिखावा क्यों न करे, मगर दिल का दर्द तो चेहरे पर आ ही जाता है। वित्त मंत्री-आपको क्या लगता है मुझे इन बातों का ख़्याल नहीं। क्या आपने मुझे इतना नौसीखिया समझ लिया है। आप फिर से सस्ती चीज़ों की लिस्ट देंखें, हमने कॉस्मेटिक का सामान भी सस्ता किया है। अंडरआई ब्लैक सर्किल्स को मेकअप से छिपाएं। पिचके गालों को पेनस्टिक से उभारिए। सडांध मारती ज़िंदगी पर डीओ छिड़किए। मैं-मगर सर, भूख का क्या करें, अब वो पाउडर को मिल्क पाउडर समझकर पी तो नहीं सकते! लिपस्टिक को लेडीफिंगर समझ भी लें, फिर भी उसकी सब्ज़ी तो नहीं बनेगी! सर, आदमी अगर कुछ खाएगा नहीं तो मर जाएगा न!

वित्त मंत्री-उसकी फिक्र मत करें। हम आपको किसी क़ीमत मरने नहीं देंगे। देखिए, आप ही की रक्षा के लिए हमने रक्षा बजट भी बढ़ा दिया है। पहले यह एक लाख इक्तालीस हज़ार करोड़ था अब बढ़ाकर एक लाख सैंतालीस हज़ार करोड़ कर दिया गया है! पूरे आठ फीसदी की बढ़ोतरी की है!

4 टिप्‍पणियां:

सागर ने कहा…

यहाँ दिल्ली में एक सीधे सादे आदमी के लिए एक कहावत है "तरक्की करेगा नहीं, भूखा मरेगा नहीं".

मंत्री जी हमें मरने नहीं देंगे यह भी सच है.

अनिल कान्त : ने कहा…

:)
achchha vyangya hai

कुश ने कहा…

और मैं खामख्वाह वित्त मंत्री को कोस रहा था.. कितना बेवकूफ हु ना मैं..

मधुकर राजपूत ने कहा…

घर गृहस्थी वाले बचकर रहें। भाभियों का प्रकोप एक साल तक हावी रहेगा। बटुए का 40 फीसदी लो रियल और लक्मे जैसी कंपनियां खींच ले जाएंगी। इसके लिए हमारी सुकुमारी भाभियों को न कोसें, कंबख्त आम बजट के खट्टे आम जैसे स्वभाव को कोसें, जो साल दर साल दांत खट्टे करता आ रहा है।