गुरुवार, 1 मई 2008

आलसी जीवन का दर्शनशास्त्र! (हास्य-व्यंग्य)

आलसी जीवन का दर्शनशास्त्र! (हास्य-व्यंग्य)

तीन साल की उम्र तक मैंने चलना नहीं सीखा और पांच साल तक बोलना। मां-बाप घबरा गये। सोचा.. बच्चे में कुछ कमज़ोरी है। कई डॉक्टर्स के पास ले गये। लेकिन फायदा नहीं हुआ। फिर उन्हीं दिनों एक पहुंचे हुए बाबा हमारे शहर पहुंचे। मुझे उनके सामने पेश किया गया। बाबा ने आंखों में आखें डाली। मैं भोली सूरत बनाये बैठा रहा। और फिर वो चिल्लाये। कुछ नहीं है इस बच्चे को। ढोंग करता है ये। पांच साल का बच्चा और ‘ढोंग’ ,पिता जी हड़बड़ाये। 'सही कह रहा हूं। सिर्फ आलस का मारा कुछ नहीं करता। न बोलता है,न चलता है।'

बहरहाल, ज़िंदगी आगे बढ़ती गई और आलस के से चिपका मैं भी दो किलोमीटर प्रति हफ्ते की गति से आगे बढ़ता गया। उम्र बीतने के साथ-साथ आलस के कारण भी बदलते गये। पहले दुकान से सामान लाने में आलस करता था, बड़ा हुआ तो कॉम्पिटीशन के फार्म लाने में आलस करने लगा। इसी आलस के कारण 20 साल की उम्र में 20 बार भी उगता हुआ सूरज नहीं देख पाया। कोई भी काम को करने के लिए मैंने आज के बजाय कल पर ज़्यादा भरोसा किया। वर्तमान मुझे हमेशा मनहूस लगा। ऐसे मनहूस समय मैं बाहर नहीं निकला और 'पड़े रहना' ही बेहतर समझा। उम्मीदों के सारे द्वार मुझे भविष्य में ही खुलते दिखाई दिये। कल करूंगा, कल जाऊंगा, कल ला दूंगा, कल बता दूंगा। फ्यूचर इनडेफिनेट टेंस में ही मुझे वर्तमान के सभी काम ‘डेफिनेट’ होते दिखाई दिये।

कॉलेज पहुंचा तो आलस से मेरा रिश्ता 17 साल पुराना हो चुका था। इस बीच झगड़ा तो दूर एक बार भी हमारी कहा-सुनी तक नहीं हुई। दिन-ब-दिन रिश्ते की जड़ें गहराती जा रही थी। फिर बिना किसी बड़ी वजह के अचानक मुझे लगने लगा की मैं शक्ल सूरत से ठीक-ठाक हूं। पूछ-पड़ताल करने पर पता चला कि मैं ठीक न सही 'ठिक' तो ज़रूर हूं। मेरी हिम्मत बढ़ी। मैं दिन में बीस-पचास लड़कियों को देखने लगा। बदले में एक-दो लड़कियां मुझे भी देखने लगी। दोस्तों नें हौसला बढ़ाया (बाद में पता चला वो मेरे मज़े लेते थे)। हिम्मत करो, आगे बढ़ो, पीछा करो देखकर आओ कहां रहती है। मेरी भी हिम्मत बढ़ी। मैं भी ‘कुछ लड़कियों’ से सच्चा प्यार करने लगा। लेकिन 'पीछा करो और घर देखकर आओ' मुझे काफी मुश्किल लगा। कॉलेज ख़त्म होते ही दिल करता था घर जाऊं, खाना खाऊं और सो जाऊं। इस दोपहर में कौन जायेगा लड़की के पीछे। बहरहाल, 'घर जाकर सो जाने की इच्छा' ने 'पीछा कर घर देखने' की इच्छा को मात दे दी। नतीजा, कॉलेज के तीन सालों में मैं सभी फिल्में अपने पुरूष मित्रों के साथ ही देखता रहा।

ग्रेजुएशन होते ही मैं बेरोज़गार हो गया। लेकिन एमए का फार्म भर मैंने अपनी बरोज़गारी को दो साल तक एक्सटैंड कर दिया। फिर मुझे क्लेक्टर और एसपी बनने के भी कुछ मौके मिले, लेकिन फॉर्म न भर पाने के कारण मैं मौका चूक गया। घर वालों ने इसके लिए मुझे दोषी बताया। पिता जी ने एक दिन पूछा-बेटा आख़िर चाहते क्या हो? किस फितूर में हो? क्यों नहीं किसी नौकरी के लिए कोशिश करते। तुम्हारे दोस्तों को देखो वो कितने अनुशासित हैं, कुछ बनने को लेकर कितने परेशान है।

प्लीज़, दोस्तों की बात मत करो। अनुशासन और 'ज़बरदस्ती की गम्भीरता' तो मूर्खों का गहना हैं। ये कथित अनुशासन और परेशानी उन्हें कलेक्टर तो क्या ग्रामसेवक भी नहीं बनवा पायेगी।

पिता जी का गुस्सा बढ़ा-उनकी छोड़ो तुम अपनी बताओ। चाय पी कर तुम गिलास तक रसोई में नहीं रखते। पढ़ कर किताबे टेबल पर नहीं रखते। जूते, कपड़े आज तक एक चीज़ तुमने सही जगह पर नहीं रखी। मैंने काटा-पिता जी, समझिये दुनिया में हर रचनात्मक इंसान ऐसा ही होता है। आप जिसे पड़े रहना कहते हैं, वो उस वक़्त सोच रहे होते हैं। उनके तार दूसरी दुनिया से जुड़े होते हैं। उन्हें कुछ साफ-साफ दिखाई दे रहा होता है। लेकिन मुझे अफसोस है कि आप बिखरे हुए सामान को तो देखते हैं उसके चेहरे पर जो तेज़ है उसे नहीं देखते।

पिताजी का चेहरा भावशून्य था। मुझे लगा वो गर्व से मुझे गले लगा लेंगे। लेकिन.... 'बकवास बंद करो। नहीं सुनना मुझे तुम्हारा आलसवाद। अभी घर से निकाल दूं तो दो मिनट में ये तेज़ भी निकल जायेगा और एक झटके में दूसरी दुनिया से पहली दुनिया में भी जाओगे।'

(पहली प्रकाशित रचना)

7 टिप्‍पणियां:

कुश एक खूबसूरत ख्याल ने कहा…

नीरज भाई माफ़ करना अभी टिप्पणी नही दे सकता.. अभी आलस आ रहा है.. कल दे दूँगा

lovely kumari ने कहा…

aap to hmare guru nikle hm to bas khud ko hi aalsi samjhte the :-)

हरिमोहन सिंह ने कहा…

अब तो आलसी नहीं लग रहे हो । अब तो आप हम सब आलसियों के पूज्‍यनीय आलसीबाबा श्री श्री 1008 हो गये हो

अभिषेक ओझा ने कहा…

इस व्यंग से थोड़ा कम ही आलसी हूँ मैं तो, पर ये लड़कियों के मामले भी आलस करने वाला चरित्र अगर आप ढूढने निकलें तो शायद लिस्ट में मेरा नाम सबसे ऊपर आ जाए :-)

apurn ने कहा…

are ab logo ko kaun samjhaye ki sare scientist aalsi he to hote hain paidal me taklif to cycle banayi usme bhi aalas to car ab hawaijahaz are bhaiya developed ka mtalab he aalsi hota hai.

Udan Tashtari ने कहा…

बालक

यहाँ चले आओ तो हम गर्व से तुम्हें गले लगा लें.

क्या गहन दर्शन है आलस्य में!! वाह!!

बहुत खूब. अब टिप्पणी पढ़्कर थक गये होगे. थोड़ा सो लो. :)

MAHENDRA SINGH ने कहा…

bahut khub niraj ji, mujhe lga mai apni hi kahani padh rha hu, kamal ka darsan or vyangya likha h alasya pr, or bahut kuch kehna chahut hu pr abi type nhi hota hath dard krne lg gye h so agle kuch salo me kuch lines or likh dunga apki tarif me...