मंगलवार, 13 मई 2008

लौट के फिर न आने वाले! (हास्य-व्यंग्य)

नाम-खाऊमल पचाऊ लाल, कद-पांच फीट पौने पांच इंच, मुंह-काला, दांत-काले, कान पर हल्के बाल, माथे पर चाकू का निशान, चेहरे पर होशियारीमिश्रित स्थायी मुस्कान!

ये जनाब पिछले ढाई साल से चुनाव जीतने के बाद से गायब हैं। आखिरी बार टीवी पर लोकसभा की कार्यवाही के दौरान एक मंत्री की पिछली सीट पर ऊंघते पाए गए थे। उसके बाद से इनका कोई पता नहीं।

इलाके के लोगों ने इन्हें ढूंढनें की हरसम्भव कोशिश की। बस अड्डे, रेलवे स्टेशन पर पोस्टर चिपकाये । थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई। गूगल में सर्च मारी .....मगर कोई फायदा नहीं हुआ।

फिर किसी ने सुझाव दिया कि अखबार में इनके नाम अपील की जाये। बात सब को जंची। 'जो बोला वो फंसा' के भारतीय सिद्धांत के चलते अपील का टैक्स्ट लिखने का ज़िम्मा सुझावदाता को ही दिया गया। इसके बाद खुले ख़त के रुप में जो अपील अख़बारों में छपी, वो इस तरह थी.....मुलाहिज़ा फरमाएं।

सांसद साहब,
ऐसा तो नहीं कहूंगा कि आपके भागने की हमें उम्मीद नहीं थी। मगर बेवफाई के सारे रिकार्ड आप इतनी जल्दी तोड़ देंगे ये हमने नहीं सोचा था। मुझे आज भी याद है 3 मई 2004 की वो गर्म दोपहर, जब भीड़ भरी सभा में आपने दावा किया था कि बस एक बार, बस एक बार मुझे चुन लें, मैं आपके इलाके का नक्शा बदल दूंगा। मगर..... सारा शहर गवाह है इन चार सालों में सिवाय आपके मकान के नक्शे के पूरे शहर में कुछ नहीं बदला। पहले वो एक मंज़िला था अब तीन मंज़िला हो गया।

सड़कों के लिए आपने कहा था कि इसे फिल्मी हीरोइन के गालों की तरह चिकना बना देंगे (इस फूहड़ तुलना पर तब खूब तालियां भी बजी थी।) लेकिन यकीन मानिये ये अब भी वैसी ही हैं जैसी कभी मौर्यकाल में रही होंगी। 18 घंटे बिजली का भी आप वायदा कर गये थे। लेकिन शायद विद्युत विभाग को बताना भूल गये कि 18 घंटे देनी है या काटनी!

पानी का भी कुछ ऐसा ही हाल है। वो नालियों में तो खूब है लेकिन टंकियों में कम। शहर में जब भी किसी का नहाने का दिल करता है तो वो शर्म से पानी-पानी हो जाता है और सोचता है नहा लिया।

खैर....आपको हमने ये सोचकर चुना था कि जब अपराधी ही सत्ता सम्भालेंगे... तो अपराध कौन करेगा। कुछ लोगों ने दलील भी दी कि स्कूलों में इस तर्क के चलते शरारती बच्चों को मॉनिटर बनाया जाता है। लेकिन हम भूल गये कि स्कूल की पाठशाला और राजनीति की पाठशाला में क्या फर्क है ? आप निश्चिंत रहे आज आप भले ही यहां नहीं है लेकिन, आपके गुर्गे आपका अपराधखाना उसी दक्षता से सम्भाले हैं, जिस दक्षता से संगीतघरानों में बेटे, बाप से ली दीक्षा को आत्मसात कर उसे दुनिया तक पहुंचाते हैं !

और अंत में आपसे पैर जोड़ कर गुज़ारिश है कि आप कहीं भी हों कुछ दिनों के लिए यहां ज़रुर आयें, हमारी धमनियों से रक्त निकल कर आपके होंठ छूने को बेकरार है। आखिर हर वोटर को अपने नेता से इतनी उम्मीद तो रहती है कि वो चुने जाने के बाद मुसलसल उसका खून चूसता रहे।

शेष कुशल है।

दर्शनेच्छु
आपका भावी वोटर !

3 टिप्‍पणियां:

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

बेहतरीन....बढ़िया चिट्ठी लिखते हैं ये सुझावदाता......
सुनते हैं मौर्य काल में सड़कें बिल्कुल वैसी रहती थीं जैसे......वैसे, मेरा मानना है कि अपील तो इस बात की करनी चाहिए थी कि आप कभी ना आयें. मुसीबत दूर ही अच्छी. उसे क्यों बुलाना. कोई नई मुसीबत ढूंढ लेंगे इलाके के वोटर.

अभिषेक ओझा ने कहा…

इरादा तो हिरोइन का गाल ही था, पर चुनाव जीतने के बाद उसमें मुहासे हो गए तो अब उनकी क्या गलती ? :-)

Udan Tashtari ने कहा…

इतनी भावुक चिट्ठी पढ़कर मंत्री जी की आँखें नम हो आई होंगी. कितना चाहते हैं आप सब उन्हें. कितना मिस कर रहे हैं. आप सबका प्यार देखकर वो भागे चले आते मगर क्या करें विदेश गये हुए हैं. आते ही चुनाव आ जायेंगे और वो भी आयेंगे-आखिर आप सब पैर जोड़ कर बुला जो रहे हैं.