शनिवार, 31 मई 2008

बहस की भसड़! (हास्य-व्यंग्य)

परिचयः-

मैं बहस हूं। लोग कहते हैं मेरा कोई फायदा नहीं, फिर भी मैं हर भारतीय की पहली पसंद हूं। पनवाड़ी की दुकान से पेज थ्री पार्टियों, और चाय के खोखे से कॉफी हाउस तक हर तरफ जमकर सुनी जा सकती हूं। इस तरह फ्रीक्वेंसी मे मैं एफएम स्टेशनों को भी पीछे छोड़ती हूं। महिलाएं, स्त्रीलिंग के तौर पर मेरे इस्तेमाल पर आपत्ति कर सकती हैं, मगर इसमें किसी का कोई दोष नहीं है।

हर इंसान के लिए मैं अलग मायने रखती हूं। बच्चों के लिए मैं ज़िद्द हूं, तो बेरोज़गारों के लिए कुंठा। औरतों के लिए दाम कम करवाने का ज़रिया हूं, तो बुद्धिजीवियों के लिए पहाड़ के साइज़ का नारियल, जिसमें सभी घंटों स्ट्रॉ ड़ाले मज़ा लेते हैं।

फायदे:-

सच कहूं तो मेरे इतने फायदे हैं कि हल्दी को भी हीनता होती है। मैं हूं तो संसद हैं, मैं हूं तो टीवी सीरियल हैं। मैं न होती तो संसद में सांसद क्या करते? टीवी सीरियलों में सास-बहुएं क्या करतीं? देश के बेरोज़गार क्या करते? और अहिंसा में विश्वास रखने वाले सरकारी बाबू, जो झक नहीं मारते, वो क्या करते ?

काम से बचने का भी मैं बेहतरीन तरीका हूं। कोई काम कहे, और आप न करना चाहें तो बहस करें। जैसे-तैसे ये साबित कर दें कि इस काम से कोई फायदा नहीं।

खुद ग़लती करके इल्ज़ाम सामने वाले पर लगा देने पर भी मैं छिड़ सकती हूं, इस तरह मैं 'सेल्फ डिफेंस' का भी पुख्ता बंदोबस्त हूं।

सावधानियां:-

-बॉस से किये जाने पर मैं नौकरी ले सकती हूं।
-गुस्सैल पिता से किये जाने पर घर से निकलवा सकती हूं।
-बीवी से किये जाने पर मैं जान भी ले सकती हूं।
-अधूरी जानकारी होने पर बेइज़्जती करवा सकती हूं।
-शौक बनने पर मैं आदत बन सकती हूं।
-आधे घंटे तक मेरा मतलब रहता है। फिर मैं रास्ता भटक जाती हूं । उसके बाद मैं ईगो का सवाल बन जाती हूं।
-हां, एक बात और, पूरे मज़े के लिए मुझे हमअक्ल लोगों के बीच ही किया जाये, वरना मैं बोरियत देनी लगती हूं।


आपत्तियां:-

न चाहते हुए भी अक्सर मुझे फिज़ूल के मुद्दों में ही घसीटा जाता है। खली की कुश्ती असली या नकली, मूर्ति ने दूध क्यों पीया? राखी सावंत ज़्यादा सैक्सी या मल्लिका शेरावत?

मैं उन बच्चों पर क्यों नहीं की जाती, जिन्हें पीने के लिए साफ पानी नहीं मिलता, बुनियादी शिक्षा नहीं मिलती, अच्छा खाना नहीं मिलता, मैं उन लोगों पर क्यों नहीं की जाती, जिनके लिए खुशी अब भी एक अफवाह है!
यही बात एक टीवी प्रोड्यूसर से पूछी तो कहने लगे, 'इन मुद्दों में विरोधाभास नहीं, कोई टकराहट नहीं तो बहस किस बात की? विरोध ही तुम्हारा यौवन है, उसी में तुम निखर कर आती हो और उसी में तुम्हारी टीआरपी भी आती है।'
मैं तिलमिलायी, 'आप लोग नेताओं को नैतिकता के मुद्दे पर कोड़े मारते हैं, आपकी खुद की कोई नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं? वो बोले-तुम अभी बच्ची हो, नहीं जानती। नैतिकता, जवाबदेही होने पर ही ज़िम्मेदारी बनती है। हमारी जवाबदेही नैतिकता के प्रति नहीं, टीआरपी के प्रति है। और डियर हम तो लोकतंत्र के चौथे खम्भे हैं। सभी सीसीटीवी कैमरे इसी खम्भे पर ही लगे हैं। इसी से हम सब पर नज़र रखते हैं। मैं बोली- 'लेकिन....' 'लेकिन-वेकिन छोड़ों दफा हो जाओ यहां से। बहस मत करो।‘

5 टिप्‍पणियां:

कुश एक खूबसूरत ख्याल ने कहा…

बेचारी बहस.. अभी तो सिर्फ़ यही कह सकता हू..

क्या क्या झेलना पड़ता है इसको.. चलिए किसी ने तो इस अभागिन की पीड़ा समझी..

apurn ने कहा…

bahut khub :-)
to fir bahas jari rakhiye

बाल किशन ने कहा…

बहुत शानदार और जानदार लिखा आपने.
शैली भी बहुत अच्छी है.
बधाई.

Udan Tashtari ने कहा…

बुद्धिजीवियों के लिए पहाड़ के साइज़ का नारियल-बहुत बहस करते हो यार!! :)

अभिषेक ओझा ने कहा…

बहस के साथ-साथ सलाह/राय भी तो देना होता है :-)