शुक्रवार, 30 मई 2008

न आपकी, न मेरी! (हास्य-व्यंग्य)

इतिहासकार इस बारे में कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं है मोलभाव की शुरूआत भारत में आखिर कब हुई ? न किसी दरबारी कवि ने इस बारे में कोई संकेत दिया, न किसी शिलालेख में इसका सबूत मिला और न ही ऐसा किस्सा सुना कि किसी राजा ने दुकानदार को इसलिए हाथी के पैर के नीचे कुचलवा दिया क्योंकि उसने दो किलो कद्दू पांच रूपये फालतू में बेच दिये।

इतिहास मदद न करें फिर भी हर किसी ने बचपन से एक-एक रूपये के लिए 'जान दे भी सकता हूं और ले भी सकता हूं', टाइप बहसों के विहंगम दृश्य ज़रूर देखे हैं। इन बहसों से जु़ड़ी सबसे बड़ी खूबसूरती है दुकानदार और ग्राहक का ये विश्वास की सामने वाला मूर्ख है!

मोलभाव मेरे हिसाब से एक महान कला है जिसके लिए सबसे ज़रूरी गुण है बेशर्मी। दुकानदार के नाते सौ की चीज़ आठ सौ की बता रहे हैं तो एक पल के लिए भी माथे पर शिक़न नहीं आना चाहिये।

वहीं ग्राहक के नाते आपको दाम सुनते ही बिना कुछ बोले खड़े हो जाना है। दुकानदार प्रैशर में आ जायेगा। उसे लगने लगेगा कि उसने ज़्यादा होशियारी दिखा दी। गेंद अब उसके पाले में है। वो पूछेगा-क्या हुआ? आपको कुछ नहीं बोलना, वो फिर पूछेगा-बहनजी, कुछ तो बोलो। अब ऐसी जली बात करें कि उसकी आत्मा सड़ जाये। जली हुई बात सोचने के लिए दुकानदार में पति की सूरत देखें, बात खुद-ब-खुद सूझ जाएगी! इसी बहाने पति से ये शिकायत भी दूर हो जाएगी कि आपका इस्तेमाल क्या है ?

खैर, दुकानदार कहेगा बैठिये। आप बैठ जायें। हो सकता है इतनी देर में कोई लड़का ठंडा ले आए। मगर आप भूलकर भी इसे न पिएं। दस का ठंडा आपका तीन सौ का नुक़सान भी कर सकता है। दुकानदार के नाते कहिये बहनजी, हमारा उसूल नहीं कि दो सौ की चीज़ को आठ सौ का बता, पांच सौ में बेच दें, आप जानते हैं आप ऐसा ही करते हैं फिर भी एक्टिंग इतनी शानदार हो कि ऐल पचीनो भी शर्मा जाये!

ग्राहक के नाते बात काटते हुए बोले दो सौ लेने हैं। दुकानदार हैं तो लम्बी सांस खींच वही कहें, जो देश का हर दुकानदार दिन में तीन लाख तिहतर हज़ार बार चार सौ अड़सठ बार कहता है, वो ये कि 'इतनी तो हमें घर पर नहीं पड़ती'।

दुकानदार को टोके और कहिये फालतू बात मत करो। इसके बाद लम्बी बहस होगी। जिसमें बहस करने की आपकी मौलिक प्रतिभा के अलावा, आवाज़ का ऊंचा होना, दूसरी दुकान पर कम रेट का हवाला, पुराना ग्राहक होने की दुहाई, 'सारी कमाई हम से ही करोगे' जैसे घिसे हुए तर्क आप काम में ले सकते हैं। इसके बावजूद लगे दुकानदार नीचे नहीं आ रहा। तो आख़िर में मोलभाव विधा का ब्रह्मास्त्र 'न आपकी न मेरी' छोडें, पचास रूपये फालतू दें, चीज़ खरीदें और घर आ जायें।

7 टिप्‍पणियां:

कुश एक खूबसूरत ख्याल ने कहा…

हा हा हा बहुत खूब ला जवाब..
एक और बात शायद आप भूल गये.. पहली बार किसी दुकान में जाकर भी कहेंगे की हम तो हमेशा आप से ही लेते है उस पर दुकानदार भी डेढ़ शाना बनता है हा मैने आते ही आपको पहचान लिया था.. इसीलिए आपको सस्ता माल नही दिखाया ..

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

बहुत खूब...नीरज, आप लगातार बहुत बढ़िया लिख रहे हैं. बहुत प्रसन्नता होती है आपका लिखा हुआ पढ़कर.

Rajesh Roshan ने कहा…

Cool Stuff :)

अभिषेक ओझा ने कहा…

ये कला भगवान के यहाँ से आती हैं, और मजे हुए दूकानदार हम जैसों को तो देख के ही समझ जाते हैं की लल्लू आ गया... बोल दो जितना बोलना है, इससे कुछ नहीं होना :-)

शोभा ने कहा…

काफी मेहनत की है ऐतिहासिक तथ्य खोजने में। हास्य के छींटों से इसमें रंग आगया है। बधाई स्वीकारें।

Udan Tashtari ने कहा…

दुकानदार में पति की सूरत देखें, बात खुद-ब-खुद सूझ जाएगी! :)


आपकी न मेरी-बस एक टिप्पणी कर देते हैं. :)

बेहतरीन लेखन.

बाल किशन ने कहा…

हा हा हा
मेरे बरे मे लिखने से पहले पूछ लेना चाहिए था.
:) :) :)