सोमवार, 23 जून 2008

न मिले सुर मेरा तुम्हारा ! (हास्य-व्यंग्य)

संगीत प्रतिभाओं के अलावा इन दिनों इन कार्यक्रमों के जजों की भी काफी धूम है। जिस तरह ये लोग चिल्लाते पाए जाते हैं, हो सकता है एक पल के लिए आप ठिठक जायें....सोचने लगें...अरे! ऐसी आवाज़ मैंने कहां सुनी है और फिर याद आये बस अड्डे पर! अक्सर कन्डक्टर इसी अंदाज़ में चिल्ला-चिल्ला कर सवारियों को आवाज़ लगाते हैं। खैर, इस समानता का एक फायदा ये है कि कल को अगर इनके पास काम न भी रहे तो करियर के रूप में एक विकल्प और है।

बहरहाल, भला इंसान जो आंख बंद कर सुर साध रहा था गाना ख़त्म कर जैसे ही आंख खोलता है, जज चिल्लाता है, तुम्हारी हिम्मत कैसे पड़ी ये गाना गाना की ? ये कुछ ऐसे ही साउंड करता है जैसे होटल मालिक बैरे को डांट रहा हो कि तुम्हारी हिम्मत कैसे पड़ी ये खाना खाने की। लो नोट्स पर तुमने क्या गाया, कुछ साफ नहीं था और हाई नोट्स तो तुमने लगाये ही नहीं। गायक परेशान है। हे ईश्वर! ये नोट्स कब मेरा पीछा छोड़ेंगे। स्कूल में कभी नोट्स बनाए नहीं, कॉलेज में पढ़े नहीं, इन सबसे भाग कर गायक बनने चला तो ये महोदय बता रहे हैं कि तुम नोट्स का सत्यानाश कर रहे हो।

खैर, जैसे-तैसे लड़का खुद को सम्भालता है, शब्दों को तलाशता है और माफी मांगने ही लगता है कि दूसरा जज बीच में कूद पड़ता है, ‘नो स्माइल खबरदार जी, आप कैसे कह सकते हैं कि कानफाड़ू राम ने हाई नोट्स नहीं लगाये। अरे! मैं दावा करता हूं जितना अच्छा इसने गाया है उतना तो इस गाने के मूल गायक नगर निगम ने भी नहीं गाया।‘ नो स्माइल के अहम को ठेस लगती है। वो चिल्लाता है- हिमेश सुख-चैनलिया जी, तो आप कहना क्या चाहते हैं, मुझे गायकी की समझ नहीं? हिमेश सुख-चैनलिया चूंकि आदतन मुंहफट है, कह देता है, नो स्माइल' जी, अगर आपको कानफाड़ू राम का ये गाना समझ नहीं आया तो मुझे ये कहने में कोई हर्ज़ नहीं कि आपको गायकी की समझ नहीं है। नो स्माइल' का चेहरा जूम इन-जूम आउट, बीस सैकिंड तक नाटकीय संगीत।

नो स्माइल' आपा खोता है 'अबे' तू समझता क्या है अपने आप को ? सुभानल्लाह! इस 'अबे' के साथ ही बातचीत हाईवे से निकल कर पुरानी दिल्ली के गली में घुस गई है। माहौल काफी हद तक ढाबेनुमा हो गया है। जनरल डिब्बे में सफर करने वाला घर बैठा दर्शक ये सब देख रोमांचित है। उसे छह महीने पहले गोमती एक्सप्रेस में हुए एक झगड़े की याद आती है। बुल फाइट के अंदाज़ में लड़ने के लिए तैयार इन धुरंधरों के प्रति उसके मन में आस्था और गहराती है। वो रियलाइज़ करता है उसके जितने बदतमीज़ होने पर जब ये लोग इतने बड़े संगीतकार बन सकते हैं तो वो क्यों नहीं ? चैनल की प्रोजेक्टेडे लड़ाई में दर्शक को सार्थकता मिल जाती है।

4 टिप्‍पणियां:

jasvir saurana ने कहा…

vha maja aa gya.bhut accha.likhate rhe.

कुश एक खूबसूरत ख्याल ने कहा…

बहुत सही व्यंग्य

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सटीक-इस कैरियर ऑप्शन की तरफ ध्यान दिलाने का आभार. :)

seema gupta ने कहा…

'ha ha ha ha really its interesting , accha lga pdh kr"

Regards