मंगलवार, 24 जून 2008

सड़क पर लोकतंत्र! (व्यंग्य)

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में आम शिकायत है कि कहीं भी लोकतंत्र नहीं है। हर जगह ताकतवर और भ्रष्ट लोग भरे हैं। बात ठीक है। मगर मेरा मानना है कि इस देश में एक जगह ऐसी है जहां पूरी तरह लोकतंत्र है और वो है सड़क!

सड़क में जिस जगह मैं रूका हूं वहां मर्सिडीज़ के बगल में एक मोटरसाइकिल वाला, उसके बगल में साइकिल सवार, बीच में एक बैलगाड़ी, कुछ हाथ रिक्शा और आगे नगर निगम का कचरा ढोने वाला एक ऐसा ट्रक खड़ा है, जिसे देख लगता है कि उसका इस्तेमाल द्वितिय विश्व युद्ध के वक़्त से किया जा रहा है! बहरहाल, आसपास खड़े हम तमाम लोगों के लिए ये कुछ मीटर का दायरा इस मुल्क में इकलौता मंच है जिसे हम एक साथ शेयर कर पा रहे हैं!

ये मंच एक मायने में लोकतंत्र ही नहीं, खुला लोकतंत्र है, क्योंकि ये किसी भी तरह के लेन के बंधन से मुक्त है। आप जहां चाहे गाड़ी चला सकते हैं, जहां चाहे गाड़ी घुसा सकते हैं, और जहां चाहे गाड़ी चढ़ा भी सकते हैं! इसके अलावा जितनी फ्रस्टेशन हो, वो आप सड़क पर निकाल लें। मसलन, आप मोटरसाइकिल पर हैं और सोच रहे हैं कि स्साला, इतनी जगह अप्लाई कर दिया आज तक कहीं से कोई कॉल नहीं आया, ये कम्पनी वाले पता नहीं खुद को क्या सोचते हैं ? तभी आप देखते हैं सामने एक लम्बी काली गाड़ी चल रही है, अब सोचिये हो न हो उन्हीं कम्पनियों में से किसी एक का सीईओ इस गाड़ी में सवार है। अब उस गाड़ी के आगे से एक गंदा कट मारिये, फिर उस कार के आगे आ जाइये और उसे काफी देर तक साइड मत दीजिये। वो भले ही कितने हॉर्न दे, मगर नीचा दिखाने के इस मिशन से आपको पीछे नहीं हटना है। हो सकता है इस दौरान ये सोच शर्म भी आये कि ये सब करने के लिए तो भगवान ने मुझे धरती पर नहीं भेजा, मगर शर्मिंदा न हों। साहित्य की ज़बान में इसे भावानात्मक विस्फोट कहते हैं, और ऐसा कर आप कविता रच रहे हैं। लिहाज़ा, छंद पर यानि हैंडल पर ध्यान दें!

इसके अलावा आपको ये शिकायत भी रही है कि भ्रष्टाचार को लेकर हमारा लोकतंत्र समान अवसर नहीं देता। मगर, सड़क का लोकतंत्र ये शिकायत भी दूर करता है। सामने रेड लाइट है। चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस वाला भी नहीं। आप बिना सोचे समझे रेड लाइट तोड़ दें। अवसर के मामले में रेड लाइट तोड़ने के भ्रष्टाचार पर जितना हक़ एक कार वाले का है, उतना ही आपका भी।

कुल मिलाकर सड़क लोकतंत्र की इस हद तक सच्ची नुमाइंदगी करती है कि लोकतंत्र को चलाने वाले नेताओं ने आम आदमी को सड़क पर ला दिया है, और वो भी सिर्फ इसलिए ताकि वो उस लोकतंत्र का सही मज़ा ले पाए।

9 टिप्‍पणियां:

nav pravah ने कहा…

बहुत सलीके से अपनी बात कह गए भाई जी.बहुत खूब..
आलोक सिंह "साहिल"

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

शानदार 'लोकतांत्रिक' पोस्ट है...हमेशा की तरह धारदार..नीरज, कमाल का लिखते हैं आप.

कुश एक खूबसूरत ख्याल ने कहा…

नीरज भाई..
तगड़ा वार किया है इस बार आपने.. बहुत खूब

Advocate Rashmi saurana ने कहा…

aapne bilkul acche tarike se sahi bat kha di.bhut accha. likhate rhe.

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने कहा…

बहुत उम्दा, सटीक और तीक्ष्ण व्यंग्य के लिए बधाई लीजिए.
मैं आपको ई मेल करना चाह्ता हूं. कृपया सम्पर्क करें : dpagrawal24@gmail.com

अभिषेक ओझा ने कहा…

बहुत सही... चलिए कहीं तो लोकतंत्र मिला :-)

mamta ने कहा…

सटीक।
ये तो असली परिभाषा हो गई लोकतंत्र की।

Udan Tashtari ने कहा…

पढ़्कर ऐसा लग रहा था कि हमारे जबलपुर की सड़क का चित्रण कर रहे हैं खुला लोकतंत्र समझाने के लिए. बहुत बढ़िया.

Som ने कहा…

Very Interesting Article.