शनिवार, 20 जून 2009

सरकारी लापरवाहियों का सौंदर्यशास्त्र!

कुछ दिन पहले मध्यप्रदेश के एक सरकारी स्कूल में मिड डे मील में मेंढक मिला जिस पर खूब हाय-तौबा मची। ज़िम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की बात की गई। स्कूल बंद करवाने की मांग तक उठी। इससे पहले कि मैं मेंढक की प्रजाति और मेन्यू में आई तब्दीली पर विचार करता, एक और धमाका हो गया। झारखंड के एक शासकीय स्कूल में मिड डे मील में सांप पाया गया और इंदौर के एक स्कूल में छिपकली। मैं सोचने लगा कि कैसा दिलचस्प नज़ारा है। बारहवीं में साइंस स्टूडेंट छाती पीट-पीट मर जाते हैं कि सर, प्रेक्टिल के लिए मेंढक दिलवा दो, मगर नहीं मिलता। देशभर के सपेरे जंगलों में सीसीटीवी कैमरे लगा डिजिटल बीन की धुन पर सांप खोजते हैं पर नहीं ढूंढ पाते। और इत्तेफाक देखिए कि वो मिड डे मील की थाली में मिल जाते हैं। साग की जगह सांप और मटर की जगह मेंढक। सरकार कहती है कि हम मुम्बई को शंघाई बना देंगे, विकास दर को चीन के बराबर ले आएंगे। मुझे लगता है और किसी मामले में हम चीन बनें न बनें, सांप और मेंढक डाल अपनी थाली को ज़रूर चीनी थाली बना देंगे। और ऐसा हुआ तो आने वाले दिनों में कछुआ और खरगोश बच्चों को कहानियों में ही नहीं, खाने की थाली में भी मिलेंगे।

दोस्तों, सवाल थाली और उस पर पड़ने वाली गाली का नहीं है बल्कि उससे आगे सरकारी लापरवाहियों के हुस्न का है। मैं देखता हूं कि इन लापरवाहियों में भी ख़ास तरह की सतर्कता बरती जाती है। मसलन, सांप की जगह खाने में मछली भी तो निकल सकती थी। चूंकि मछली हमारे यहां खाई जाती है, इसलिए नहीं निकली। उसी तरह मेंढक की जगह मुर्गा भी निकल सकता था। अब मुर्गा चूंकि बच्चों को बनाया जाता है, खिलाया नहीं इसलिए नहीं निकला।


हमारे मोहल्ले में एक दुकानदार हुआ करते थे। उनका नाम था बनवारी लाल। सौदा लेने के बाद अक्सर वो बकाया पैसों में हेरफेर करते थे। एक बार मैंने शिकायत की तो कहने लगे बेटा चूक हो जाती है। मैंने कहा-लाला जी, हमेशा कम की चूक क्यों होती है, ज़्यादा की तो नहीं होती। ग़लती से कभी चालीस की बजाए एक सौ चालीस तो नहीं लौटाए। खिंचाई के बाद लाला जी सतर्क हो गए। इसके बाद उन्होंने ऐसी बदमाशी नहीं की।

मगर सरकारी तंत्र में जो बनवारी लाल बैठे हैं, उनकी खाल थोड़ी मोटी है। अपनी अल्पसमझ से मैं कभी नहीं जान पाया कि बिजली के बिल हमेशा ग़लती से ज़्यादा ही क्यों आते हैं, ग़लती से कम भी तो आ सकते हैं। गरीब किसान को मुआवज़े का चैक कम क्यों मिलता है, ज़्यादा का भी तो मिल सकता है। ये किस ग्रह की बदमाशी है जो गरीब आदमी को राशन की दुकान से लाल गेंहू तो दिलवाती है मगर धरती के इस गरीब लाल को बासमती चावल नहीं दिलाती। ग़लती से भी इस तंत्र से ऐसी कोई ग़लती क्यों नहीं होती, जो जनता को फलती हो, मसलती न हो। इसलिए मैं चाहता हूं कि इस पूरे तंत्र का नारको टेस्ट करवा ये पता लगाया जाए कि इसके अवचेतन मन की आखिर कौन सी बुनावट है जो इसे भूलकर भी अपना नुकसान और जनता का भला नहीं करने देती।

मैं सरकार से गुज़ारिश करता हूं कि अब से हर ग़लती की सफाई में वो ‘भूलवश’ के बजाए ‘भूलवंश’ शब्द का इस्तेमाल करे क्योंकि यहां ग़लतियां व्यक्तिगत नहीं वंशवादी समस्या है। सरकारी तंत्र का लापरवाह वंश। और यह वंश सरकार गठन में हो या सरकारी तंत्र के चलन में, इस देश में हमेशा से रहा है।

9 टिप्‍पणियां:

रंजना ने कहा…

मैं सरकार से गुज़ारिश करता हूं कि अब से हर ग़लती की सफाई में वो ‘भूलवश’ के बजाए ‘भूलवंश’ शब्द का इस्तेमाल करे क्योंकि यहां ग़लतियां व्यक्तिगत नहीं वंशवादी समस्या है। सरकारी तंत्र का लापरवाह वंश। और यह वंश सरकार गठन में हो या सरकारी तंत्र के चलन में, इस देश में हमेशा से रहा है।

Ekdam sahi...iske aage kuchh kahne ki gunjaish hi nahi bachti....

मधुकर राजपूत ने कहा…

maja aa gyaq badhwar sahab....bahut badhiya hai tarike se sarkari laparwahi ke husn ko uthaya....bhoolvansh prabhavshali hai....ek anshwar or sab parivartit....hahahahahahahahah

Kajal Kumar ने कहा…

जब मास्टरी धंधा हो जाए तो यही होगा न...
पहले, पढाने वाले स्वेच्छा से इस कार्य को करते थे.

बी एस पाबला ने कहा…

काजल कुमार ठीक कहते हैं। मास्टरी धंधा हो गया है, यही होगा अब

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत सही . आवाज नेट पर बुलंद करने के लिए .

Fighter Jet ने कहा…

ham sub log aise hi...200 saal se aise hi apnni bajwaa rahe hai..aur aage bhi bajwate rahenge

Udan Tashtari ने कहा…

बालक, जिसमें भी जनता का भला हो जाये, उसे गलती की श्रेणी में रखा ही नहीं जाता इसीलिए ऐसा होता होगा.

अनूप शुक्ल ने कहा…

आपकी गुजारिश पर ध्यान दिया जायेगा।

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

ज़बरदस्त पोस्ट है.
अनूप जी ने आपकी गुजारिश पर ध्यान देने के लिए वचन दिया है. यह आपके लेखन की सार्थकता को दर्शाता है. मेरे लेखन में तो बस 'थकता' है. मुझे कभी कोई वचन नहीं मिला...:-)