सोमवार, 22 जून 2009

इस शहर में हम भी भेड़ें हैं!

ब्लूलाइन में घुसते ही मेरी नज़र जिस शख़्स पर पड़ी है, बस में उसका डेज़ीग्नेशन कन्डक्टर का है। पहली नज़र में जान गया हूं कि सफाई से इसका विद्रोह है और नहाने के सामन्ती विचार में इसकी कोई आस्था नहीं । सुर्ख होंठ उसके तम्बाकू प्रेम की गवाही दे रहे हैं और बढ़े हुए नाखून भ्रम पैदा करते हैं कि शायद इसे ‘नेलकटर’ के अविष्कार की जानकारी नहीं है।

इससे पहले कि मैं सीधा होऊं वो चिल्लाता है- टिकट। मुझे गुस्सा आता है। भइया, तमीज़ से तो बोलो। वो ऊखड़ता है, 'तमीज़ से ही तो बोल रहा हूं।' अब मुझे गुस्सा नहीं, तरस आता है। किसी ने तमीज़ के बारे में शायद उसे 'मिसइन्फार्म' किया है !

टिकिट ले बस में मैं अपने अक्षांश-देशांतर समझने की कोशिश कर ही रहा हूं कि वो फिर तमीज़ से चिल्लाता है-आगे चलो। मैं हैरान हूं ये कौन सा 'आगे' है, जो मुझे दिखाई नहीं दे रहा। आगे तो एक जनाब की गर्दन नज़र आ रही है। इतने में पीछे से ज़ोर का धक्का लगता है। मैं आंख बंद कर खुद को धक्के के हवाले कर देता हूं। आंख खोलता हूं तो वही गर्दन मेरे सामने है। लेकिन मुझे यकीन है कि मैं आगे आ गया हूं, क्योंकि कंडक्टर के चिल्लाने की आवाज़ अब पीछे से आ रही है!

कुछ ही पल में मैं जान जाता हूं कि सांस आती नहीं लेना पड़ती है....मैं सांस लेने की कोशिश कर रहा हूं मगर वो नहीं आ रही। शायद मुझे आक्सीज़न सिलेंडर घर से लाना चाहिये था। लेकिन यहां तो मेरे खड़े होने की जगह नहीं, सिलेंडर कहां रखता।

मैं देखता हूं लेडीज़ सीटों पर कई जेन्ट्स बैठे हैं। महिलाएं कहती हैं कि भाईसाहब खड़े हो जाओ, मगर वो खड़े नहीं होते। उन्होंने जान लिया है कि बेशर्मी से जीने के कई फायदे हैं। वैसे भी 'भाईसाहब' कहने के बाद तो वो बिल्कुल खड़े नहीं होंगे। खैर.. कुछ पुरुष महिलाओं से भी सटे खड़े हैं, और मन ही मन 'भारी भीड़' को धन्यवाद दे रहे हैं!

इस बीच ड्राइवर अचानक ब्रेक लगाता है। मेरा हाथ किसी के सिर पर लगता है। वो चिल्लाता है। ढंग से खड़े रहो। आशावाद की इस विकराल अपील से मैं सहम जाता हूं। पचास सीटों वाली बस में ढाई सौ लोग भरे हैं और ये जनाब मुझसे 'ढंग' की उम्मीद कर रहे हैं। मैं चिल्लाता हूं - जनाब आपको किसी ने गलत सूचना दी है। मैं सर्कस में रस्सी पर चलने का करतब नहीं दिखाता। वो चुप हो जाता है। बाकी के सफर में उसे इस बात की रीज़निंग करनी है।

बस की इस बेबसी में मेरे अंदर अध्यात्म जागने लगा है। सोच रहा हूं पुनर्जन्म की थ्योरी सही है। हो न हो पिछले जन्म के कुकर्मों की सज़ा इंसान को अगले जन्म में ज़रुर भुगतनी पड़ती है। लेकिन तभी लगता है कि इस धारणा का उजला पक्ष भी है। अगर मैं इस जन्म में भी पाप कर रहा हूं तो मुझे घबराना नहीं चाहिये.... ब्लूलाइन के सफर के बाद नर्क में मेरे लिए अब कोई सरप्राइज नहीं हो सकता !

बहरहाल....स्टैण्ड देखने के लिए गर्दन झुकाकर बाहर देखता हूं। बाहर काफी ट्रैफिक है... कुछ समझ नहीं पा रहा कहां हूं। तभी मेरी नज़र भेड़ों से भरे एक ट्रक पर पड़ती है। एक साथ कई भेड़ें बड़ी उत्सुकता से बस देख रही हैं। एक पल के लिए लगा.... शायद मन ही मन वो सोच रही हैं.....भेड़ें तो हम हैं!

11 टिप्‍पणियां:

Priyanka Singh Mann ने कहा…

dilli ki yaad dila di aapne..ab saal main ek-aadh baar jaati hun aur blue line main jana band sa ho gaya hai courtesy metro par abhi bhi college aur NCC ke vah din yaad hain jab aisi hi ek bas se main utar gai thi par dupatta rah gaya tha..bas uske baad kurton par aa gayi,duppate pahnane hi band kar diye..bahut khoob lika hai!

अजय कुमार झा ने कहा…

are neeraj bhai blue line mein itnee safal yaatraa to khud unke conductors kee bhee nahin hotee...iske liye aapko is baar kaa blue line sawaaree kaa nobel puruskaar diyaa jaayegaa..are mahaaraaj aap dilli mein hee hain to hamein darshan dene kee kripa karein..haan blue line kee jaroorat nahin..ajee ham apne hamara bajaj par aapko lene aayenge...

Mired Mirage ने कहा…

नीरज,आपने व्यंग्य लिखा है किन्तु यह हमारा और हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हम लोगों को सार्वजनिक यातायात के आरामदेह साधन नहीं दे सके। यदि यह उपलब्ध होता तो शायद सड़कें कारों व दुपहिया वाहनों से पटी न पड़ी होतीं। इतना प्रदूषण न होता और थका माँदा व्यक्ति अपने वाहन को चलाने में ध्यान केन्द्रित करने की बजाए आराम से सार्वजनिक यातायात का उपयोग करता हुआ ऊँघता या कुछ पढ़ता हुआ अपने घर पहुँचता।
घुघूती बासूती

Fighter Jet ने कहा…

kya khub likha hai..bhai waah....maan gaye...par jinke kano me juoon jana chahiye pata nahi wo kab sunenge

Udan Tashtari ने कहा…

एकदम सटीक और पैना वार!! वाह, बालक!!

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

पोस्ट बेहतरीन है.
हमसब भेंड़ हैं.

मधुकर राजपूत ने कहा…

भीड़ में एकरसता है। समतामूलक समाज का सपना संविधान के नियम भी साकार नहीं कर पाए। भीड़ कर देती है। जो छूने से भड़कते हैं सहारा लेकर खड़े होने को कब कंधा थाम लेते हैं पता नहीं चलता। भीड़ भारत के विविधतापूर्ण समाज में समरसता और सामंजस्य का स्रोत है। हाहाहाहाहाहाहाहा।

डॉ .अनुराग ने कहा…

ब्लू लाइन बसे दरअसल नर्क द्वारा एक साल के कोंटेक्ट पे है...उनका विज्ञापन जारी रखने के लिए ...सुना है ऐसे कई कंडक्टर ट्रेनिंग पे गए है...नए कोंत्रेक्त की डील जो पक्की होनी है......

Nirmla Kapila ने कहा…

सटीक और गहरा व्यंग बधाई --- अरे ये बधाई तो अपने अवतार को जान कर दी है ---भेडें --वाह वाह्

मधुकर राजपूत ने कहा…

kaha ho badhwar ji, dimag ko chugga fenko bhai.

राकेश जैन ने कहा…

tapak ka chanta jhataak ke sath,